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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

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सोमवार, 19 नवम्बर 2012 10:21

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
बहुत से लोगों का मानना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, वर्तमान शताब्दी की आवश्यकताओं में से है और जिस समाज में अभिव्यक्ति और संचार माध्यमों की स्वतंत्रता न हो वह तानाशाही समाज होता है। यह बात स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ, अपमान, उपहास और अराजकता नहीं है बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ सदैव अपने तार्किक व यथार्थवाद व्यवहार से हटकर सामने आता है। प्रश्न यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संबंध में विश्व जनमत को किन साक्ष्यों पर भरोसा करना चाहिए? क्या आज की दुनिया में प्रचलित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, उन व्यवहारों से विरोधाभास नहीं रखती जो कुछ पश्चिमी देशों की ओर से थोपे जा रहे हैं?
ईश्वरीय दूतों विशेषकर पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम और उनके पवित्र परिजनों का अपमान, राष्ट्रों और उनकी संस्कृति व सभ्यता का अनादर, घृणा व जातीवाद का प्रचार, उन कार्यवाहियों में है जो पश्चिमी संचार माध्यमों की ओर से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर खुलकर की जा रही हैं और विश्व, थोड़े थोड़े समय पर इस प्रकार की अनैतिक व घृणित कार्यवाही का साक्षी रहा है। इस आधार पर पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि इस प्रकार के प्रोपेगैंडे, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बजाए अधिकतर घृणा के प्रचार और स्वतंत्रता के अपमान से समन्वित हैं। हाडवर्ड विश्व विद्यालय के शोधकर्ता और उत्तरी कैलीफ़ोर्निया विश्व विद्यालय में धार्मिक शोध के ईरानी प्रोफ़ेसर उम्मीद सफ़ी का भी मानना है कि अपमान जनक फ़िल्मों और कार्टूनों को बनाकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का औचित्य पेश नहीं किया जा सकता और इस प्रकार के फ़िल्म निर्माता व कार्टूनिस्ट खुलकर घृणा को हवा दे रहे हैं।
अमरीका में अपमान जनक और इस्लाम विरोधी फ़िल्म इनोसेन्स आफ़ मुस्लिम के निर्माण और यू ट्यूब पर इसके कुछ भाग के अपलोड किए जाने के बाद इस फ़िल्म का विरोध मुस्लिम समाज के अतिरिक्त स्वतंत्र विचार वाले ग़ैर मुस्लिम लोगों ने भी किया। खेद की बात यह है कि उस समय पश्चिमी संचार माध्यमों और अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जैसी हस्तियों ने इन विरोधों की निंदा की और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बहाने इस प्रकार के फ़िल्म निर्माताओं का खुलकर समर्थन किया। इस घटना के कुछ ही समय के बाद यूरोपीय संघ ने प्रतिबंधों के बहाने ईरान के कुछ टीवी चैनलों के प्रसारण को यू टेल और एनटेल उपग्रह से बंद कर दिया और अपनी तुच्छ समझ में विश्व के बहुत अधिक संबोधकों को आकर्षित करने वाली स्वतंत्रता प्रेमी आवाज़ को दबाने की चेष्टा की किन्तु यह हथकंडे इन सरकारों और इनके प्रोपेगैंडों के हित में लाभदायक सिद्ध न हो सके। यह कार्यवाहियां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संबंध में पश्चिमी देशों के दावों की पोल खोलने के अतिरिक्त विश्व के लोगों पर ईरानी टीवी चैनलों और स्वतंत्र चैलनों की वास्तविकता स्पष्ट होने के साथ साथ ईरानी राष्ट्र की सत्यप्रेमी आवाज़ के अन्य लोगों तक पहुंचने का भी कारण बनी है।
वर्तमान समय में जब यह प्रयास किया जा रहा है कि लोगों को ईरानी चैनलों से दूर कर दिया जाए, हम इस बात के साक्षी है कि स्वयं अमरीका और यूरोपीय देशों के बहुत से खुले विचार वाले लोग संचार माध्यमों के इस एकाधिकार और वर्चस्व को एकपक्षीय समझते हैं और इसकी कड़े शब्दों में निंदा करते हैं।
ब्रिटिश रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स के सदस्य अब्दुल्लाह हमूदा ने कहा कि सैटेलाइट से ईरानी टीवी चैनलों के प्रसारण को बंद करने का मुख्य कारण विश्व के राष्ट्रों के मध्य ईरान की दिन प्रतिदिन बढ़ती लोकप्रियता को रोकना है। उनका कहना था कि यह कार्यवाही ईरान के साथ एकपक्षीय रूप से मामले को तोड़ लेने के लिए यूरोपीय संघ का एक साधारण निर्णय नहीं है बल्कि यह कार्यवाही ईरान पर नये प्रतिबंध थोपने के साथ की गयी एक पूर्वनियोजित कार्यवाही है।
इसी प्रकार ईटली, स्वीट्ज़रलैंड, अमरीका, आस्ट्रिया जैसे देशों के स्वतंत्र पत्रकारों और संचार माध्यमों ने ईरानी टीवी चैनलों के प्रसारण को सैटेलाइट से बंद करने को राजनीति से प्रेरित बताया और इस कार्यवाही की कड़ाई से निंदा की। राष्ट्रीय इतालवी प्रेस एसोसिएशन के सदस्य ने कहा कि संचार माध्यमों का सेन्सर और उनके लिए दायित्व निर्धारण करना सही कार्य नही है और इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इस घटना के पीछे राजनैतिक उद्देश्य हैं। इस पत्रकार का मानना है कि ईटली के संचार माध्यमों द्वारा इस समाचार को कवरेज न देने का मुख्य कारण यह है कि मूल रूप से वह अंतर्राष्ट्रीय समाचारों पर सतही नज़र डालते हैं। लोपीओनियन समाचार पत्र के प्रबंधक आर्थर डियाकोनाला ने भी इस निर्णय को राजनीति से प्रेरित बताया और कहा कि इसका मुख्य कारण ईरान, अमरीका और यूरोपीय संघ के दृष्टिकोणों में मतभेद का पाया जाना है किन्तु मुख्य रूप से यह निर्णय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध है।
इसी परिप्रेक्ष्य में मानवाधिकार कार्यकर्ता एन्डी शार्ट का कहना है कि जब भी अमरीका में इस्लाम के विरुद्ध अपमानजनक फ़िल्म या दूसरी अनैतिक चीज़ें इन्टरनेट पर प्रकाशित होती हैं तो उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नाम दिया जाता है किन्तु जब ईरानी टीवी चैनल सही और सच्चे समाचारों को प्रकाशित करते हैं जो विश्व के विभिन्न दृष्टिकोणों को बयान करने वाले होते हैं तो पश्चिम त्वरित प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसके प्रसारण पर रोक लगा देता है।
अभी कुछ ही दिन पूर्व ईरानी फ़िल्म निर्माता व निर्देशक मजीद मजीदी ने तुर्की के इस्तांबोल नगर में समानता और न्याय शीर्षक के अंतर्गत आयोजित होने वाले अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में सिनेमा जगत में न्याय के विषय पर भाषण दिया। उन्होंने अपने संबोधन में इस बात पर खेद प्रकट करते हुए कि अत्याचारी और अपराधी लोग विदित रूप से लोगों को धोखा देकर मोक्षदाताओं, पवित्र लोगों और ईश्वरीय दूतों की छवियों को तोड़ मरोड़ कर पेश करते हैं, कहा कि अतिग्रहण और अतिक्रमण को स्वतंत्रता का नाम देते हैं और हत्या और हिंसा को मुक्ति व सफलता के रूप में पेश करते हैं और प्रतिबंध और दबाव का अर्थ न्याय बना दिया गया है और यह सब कार्य वर्तमान संचार माध्यमों की अद्वीतीय शक्ति और कला की सहायता और समन्वय से संभव हुआ है। यह संचार माध्यम ही हैं जो बुराई को बहुत सुन्दर रूप में पेश करते हैं और अपराध को न्याय बताते हैं।
मजीद मजीदी उन वर्तमान फ़िल्म निर्माताओं, निर्देशकों और कलाकारों में से हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन लोगों के दुखों और दर्दों को बयान करने में बिताया और उनकी फ़िल्में मनुष्य के जीवन में अध्यात्म की आवश्यकता पर बल देती हैं और इसी को वर्तमान कष्टों से स्वतंत्रता का एक मात्र मार्ग बताती हैं। उन्होंने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि कला और संचार माध्यमों के क्षेत्र में दो विशेषताएं कष्टदायक बन गयी हैं, एक झूठ है और दूसरा अन्याय व भेदभाव। वर्तमान समय में संचार माध्यम और कलाकार झूठ के सहारे राजनेताओं के आने अपराधों की भूमिका प्रशस्त करते हैं। हम यह जानते हैं कि नाज़ी जर्मन और रक्त पिपासू हिटलर के शासन को वर्षों बीत चुके हैं किन्तु अभी तक हिटलर के प्रचार मंत्री गोब्लज़ की शैली जारी है और उसकी प्रचार शैली विश्व के सभी स्थानों पर क्रियान्वित हो रही है। उन्होंने एक स्थान पर बहुत ही बुरे किन्तु बहुत ही प्रभावी हथकंडे की ओर संकेत किया कि आज के संचार माध्यमों में जिसके बहुत अधिक समर्थक हैं, वह यह है कि छोटी सी बात को बहुत बड़े झूठ के साथ मिलाकर लोगों के सामने पेश करो। आज इस हथकंडे को संचार माध्यमों में प्रयोग किया जा रहा है और इसके उदाहरण भी बहुत अधिक हैं। तालेबान और अलक़ायदा को किसने बनाया और उन्हें किसने अस्तित्व प्रदान किया और उनका किस ने समर्थन किया? किन पश्चिमी सरकारों और क्षेत्र की उनकी मित्र सरकारों ने उनकी वित्तीय सहायताएं कीं और उनको हथियार दिए और किन लोगों ने लाखों अफ़ग़ान जनता की जान व माल पर उनको थोपा?
श्री मजीद मजीदी ने कहा कि भेदभाव और दोहरी नीतियां वह दो विशेषताएं हैं जिसने संचार माध्यमों के न्याय को बहुत अधिक हानि पहुंचाई है। उनका कहना था कि यदि अत्याचार बुरा है तो इसे पूरे विश्व में अत्याचार समझा जाना चाहिए यदि निर्दोष लोगों को जेल में डालना बुरा है जो पूरी दुनिया में इसकी निंदा की जानी चाहिए। शांतिपूर्ण लक्ष्यों के लिए परमाणु तकनीक की प्राप्ति के ईरान के मूल अधिकार का विरोध किया जाता है और ज़ायोनी शासन तीन सौ से अधिक परमाणु वारहेड्स अपने शस्त्रागारों में छिपाए हुए है और वह किसी भी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को किसी भी प्रकार के निरिक्षण की अनुमति नहीं देता? ऐसा क्यो है? अफ़ग़ानिस्तान के बामियान क्षेत्र में गौतम बुद्ध की मूर्तियों को तोड़े जाने से पूरे विश्व में हंगामा मचाया जाता है और इराक़ के सामर्रा में धार्मिक और ऐतिहासिक रौज़े को ध्वस्त किए जाने पर किसी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई, ऐसा क्यों है।
पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के पवित्र जीवन और उनके जीवन की अंतिम घटनाओं के बारे में फ़िल्म बनाने वाले मजीद मजीदी का कहना था कि आज के संसार में यदि नास्तिकों की आस्थाओं और समलैंगिकों का सम्मान आवश्यक है, तो किस प्रकार अंतिम ईश्वरीय दूत हज़रत मुहम्मद सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम के अपमान जैसी महत्त्वपूर्ण बात की अनदेखी की जाती है जिनके करोड़ों अनुयाई हैं और विश्व जनमत को एक दिशा की ओर मोड़ा जा रहा है। आज की दुनिया में न्याय की केवल बात ही होती है इसे व्यवहारिक नहीं बनाया जाता है।
उन्होंने अंत में इस बात पर बल देते हुए कहा कि जिस काल में लोगों के मार्ग दर्शन और उनको भलाई और न्याय की ओर निमंत्रण देने के लिए ईश्वरीय दूत न हों तो कलाकारों और संचार माध्यमों के स्वामियों को न्याय और भलाई का संदेश वाहक होना चाहिए इस शर्त के साथ कि झूठ, भेदभाव और बुराई से बचें।
प्रत्येक दशा में हम यह देखते हैं कि पश्चिम और उसके समर्थक संचार माध्यम न केवल यह कि विश्व के स्वतंत्रता प्रेमियों, धर्मों और राष्ट्रों में अपने विषैले प्रचारों को फैलाने और झूठ गढ़ने में व्यस्त हैं बल्कि अपने विरोधियों की आवाज़ को दबाने का भरसक प्रयास भी कर रहे हैं। इन सारे झूठ, भेदभाव और अन्याय के बावजूद विश्व में जो कुछ हो रहा है क्या उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नाम दिया जा सकता है और क्या संचार माध्यमों की शब्दावली में मानवाधिकार को एक भूला बिसरा सिद्धांत न कहा जाए? इसका निर्णय आप स्वयं ही कीजिए।

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