ये कैसा लोकतंत्र ?
संजय त्रिपाठी
क्या हम लोकतांत्रिक देश में हैं ? आखिर आजादी के बाद भारत को एक लोकतंaaत्रिक देश ही बनाने का निर्णय क्यों लिया गया ? गुलामी से मुक्ति पाकर लोकतांत्रिक गणराज्य का खाका ही देशभक्तों ने क्यों बुना ? आजादी सबके संधर्ष, लग्न और मेहनत का परिणाम था। लाखों लोगों के कुर्बानी का परिणाम था। 1857 की क्रांति से उपजा आजादी का यह जज्बा 1947 में भारी त्याग और बलिदान के बाद मूर्त रूप ले पाया और आज हम गर्व से कहते हैं कि आजाद भारत में सांस ले रहे हैं। किसी की धौंस, बंदिश व चैधराहट आज नहीं है। क्या यह सत्य है ? क्या आज हमारे देश में वहीं लोकतंत्र हैं जिसकी सपना सरदार -ए- आजम भगत सिंह, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, चन्द्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खां, रामप्रसाद बिस्मिल जैसे देशभक्तों ने देखा था। क्या आज का यह लोकतंत्र और आजाद भारत उनके सपनों का भारत है ? आज ऐसे तमाम प्रश्न है जो काल के कपाल पर बार - बार चोट कर रहे हैं। आज का भारत देख कर मन व्यथित हो रहा, अन्र्तआत्मा बार - बार खूद को ही झकझोर रही है। मन में एक ही प्रश्न उठ रहा है कि अपने लोकतांत्रिक देश भारत में गलत को गलत नहीं कहा जा सकता ? लेकिन आज लोकतंत्र को मजबूत बनाने वाला, लोगों में लोकतंत्र के प्रति अस्था पैदा करने वाला हर वह संस्था निसहाय महसूस कर रहा जो सरकार से सवाल पूछता है। चाहे वह देश का चैथा स्तम्भ पत्रकारिता हो या विपक्ष व अन्य विपक्षी पार्टिंयां । आज जो भी सरकार व सत्ता से सवाल कर रहा वही देशद्रोही घोषित किया जा रहा है। क्या यह लोकतंत्र में जायज है ? क्या आज पहली बार सरकार के किसी फैसला का आलोचना किया जा रहा, सरकार के किसी मंत्री के बयानों पर सवाल पूछा जा रहा, मुझे तो ऐसा नहीं लग रहा। आजादी के बाद भारत में जितने भी प्रधानमंत्री रहे, जो भी सरकार सत्ता में रही हर बार पत्रकारों ने तीखे सवाल पूछे, हर बार उसके फैसले की आलोचना की गई। लेकिन जिस तरह आज सवाल पूछने आलोचना करने पर बंदिश लगाया जा रहा, मानसिक रूप से परेशान किया जा रहा, टार्चर किया जा रहा एफआईआर दर्ज कराई जा रही वैसा पहले कभी नहीं देखने - सुनने में आया। आज वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कराया गया है क्या इससे अन्य पत्रकारों के मनोबल पर प्रभाव नहीं पड़ेगा ? दिल्ली में कुछ दिन पहले तथा हिमाचल प्रदेश के भाजपा के महासू इकाई अध्यक्ष अजय श्याम की शिकायत पर उनके खिलाफ धारा 124 ए (देशद्रोह), 268 (सार्वजनिक गड़बड़ी), 501 (ऐसी सामग्री प्रकाशित करना जिससे मानहानि हो) और 505 (सार्वजनिक अव्यवस्था फैलाने वाले बयान देना) के तहत मामला दर्ज किया गया। आज इस मामले में छुट्टी के दिन भी सुप्रीम कोर्ट ने विशेष सुनवाई करते हुए पत्रकार विनोद दुआ के खिलाफ दर्ज देशद्रोह के मामले को रद्द करने की मांग वाली उनकी याचिका पर केंद्र, हिमाचल प्रदेश सरकार को नोटिस भेजा। अदालत ने उनकी गिरफ्तारी पर 6 जुलाई तक रोक लगाई है। हालांकि आज के समय में पत्रकार ऐसी घटनाओं से पूरी तरह डरे व सहमें हुए है। कहा जाता है कि आपातकाल के दौरान इदिरा गांधी ने इसी तरह कुछ सवाल पूछने वाले पत्रकारों को जेल भेजी थी और कुछ सरकार के जी - हुजूरी करनेवालों को भरपूर सहयोग दिया था। मेरे नजर में आज तो आपातकाल नहीं है। याद करे राजीव गांधी, नरसिंहा राव, चन्द्रशेखर सिंह, गुजराल साहब, वी पी सिंह, अटलबिहारी वाजपेयी इन सभी सत्ताधारियों की खूब आलोचना हुई। याद करे यूपीए 2 के काल को जब चैनल व पत्रकारों के प्रश्नों से मंत्री व कांग्रेस पार्टी के बड़े पदाधिकारी बचने लगे थे। जिस तरह गलत - सही नये - नये घोटाले सामने आ रहे थे वैसे ही सरकार के खिलाफ पत्रकार दहाड़ रहे थे। अन्ना का रामलीला मैदान का आंदोलन तो आप सभी को याद होगा जहां सभी सामाजिक कार्यकर्ता व पत्रकार पानी पी - पी कर सरकार को कोस रहे थे। क्या उस समय के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह या उनके मंत्रीमंडल का कोई भी मंत्री, पार्टी का कार्यकर्ता पत्रकारों के खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज कराया ? आज यह कैसा लोकतंत्र है जिसमें सोचने व बोलने पर बंदिश लगाया जा रहा। 1997 से 2011 तक दिल्ली सरकार और उसके बाद केंद्र सरकार पर हमेशा लिखता रहा, लेकिन कभी इस तरह का डर नहीं लगा जिस तरह 2017 के बाद डर लग रहा। अब कुछ भी लिखने से पहले दस बार सोचना पड़ रहा। अगर यही हालात रहा तो लोकतंत्र सिर्फ संविधान के पन्ने में ही दब कर रह जायेगा। और अंत में यही कहूंगा -
‘‘ उस पथ की पथिक कुशलता क्या, जिस राह में बिखरे शूल न हो।
उस मांझी की कार्य कुशलता क्या, अगर धाराएं प्रतिकूल न हो।। ’’