शनिवार, 2 फरवरी 2013
दलित साहित्य की हो रही है क्लोनिंग –प्रो. तुलसीराम
हिंदी विश्वविद्यालय में दलित अभिव्यक्ति पर विमर्श
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में हिंदी समय के दूसरे दिन `दलित अभिव्यक्ति`सत्र में सुविख्यात चिंतक प्रो. तुलसीराम ने कहा कि दलित साहित्य में नेतृत्व का प्रश्न खड़ा हो गया है। भारतीय साहित्य में दलित साहित्य के प्रभाव को देखते हुए कुछ लोग दलित साहित्य की क्लोनिंग कर रहे हैं।
प्रो. तुलसीराम ने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और दलित साहित्य को अपने भाषण के केंद्र में रखते हुए कहा कि शिक्षित समाज की ही अभिव्यक्ति हो सकती है। ऐसा समाज अपना दुख, दर्द विभिन्न मंचों से व्यक्त कर सकता है। मजदूर और गरीबों पर कोई ध्यान नहीं देता क्योंकि वह अपने आपको अभिव्यक्त नहीं कर सकता। समाज में स्थापित कुछ संगठन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आघात पहुंचा रहे हैं। इसे कल्चरल पोलिस की संज्ञा देते हुए उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल हमारे सामने बड़ी चुनौती के रूप में उभर रहा है। आशीष नंदी प्रकरण का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि नंदी का बयान एकदम गलत है परंतु मुकदमें चलाकर ऐसे सवाल हल नहीं हो सकते। अच्छे साहित्य के लिए स्पर्धात्मक अभिव्यक्त्िा की जरूरत है। आत्मकथा और दलित साहित्य के संबंध को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि दलित आत्मकथा केवल दलित ही लिख सकता है। उन्होंने अपने वक्तव्य में आर्यों का भारत आना, गांधी आंबेडकर संबंध, आंबेडकर कालमार्क्स विमर्श आदि पर अपनी बात रखी। उन्होंने आंबेडकर साहित्य के अनुवादक चांगदेव खैरमोडे की पुस्तकों का उल्लेख करते हुए मेनिफेस्टो ऑफ शेडयुल कास्ट,लैंड नेशनलाईजेशन, लेबर पार्टी आदि की भी चर्चा की।
कृष्णा किरवले ने महाराष्ट्र और दलित साहित्य का उल्लेख करते हुए कहा कि महाराष्ट्र में दलित साहित्य की चौथी पीढ़ी चल रही है। इन तमाम पीढ़ियों के लेखन में दलित साहित्य ही मुखर है। वर्तमान समय में दलित साहित्य को सम्यक साहित्य, आंबेडकरी सम्मेलन, विद्रोही सम्मेलन, समतावादी सम्मेलन जैसे नाम दिये जा रहे हैं। यह साहित्य एक जाति का नहीं अपितु सभी जातियों का एक संयुक्त समूह है। उन्होंने कहा कि दलित लेखन को नकारना पूरे आंदोलन को नकारने जैसा है। लिखने वालों की प्रेरणा आंबेडकर रहे हैं और यह साहित्य तलवार की बजाय लेखनी को हथियार मानता है। स्वामी सहजानंद सरस्वती संग्रहालय में दलित अभिव्यक्ति पर हुई बहस में जे. वी. पवार, जयप्रकाश कर्दम, कृष्णा किरवले, जयनंदन, प्रो. हेमलता माहेश्वर, डॉ. निशा शेंडे आदि वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे। सत्र का संचालन सहायक प्रोफेसर संदीप सपकाले ने किया।
स्त्री विमर्श भारत की ही देन – प्रो. के. एम. मालती
स्त्री विमर्श की शुरूआत पश्चिम से नहीं बल्कि भारत में ही हुई है। यह विमर्श अब किसी प्रदेश विशेष में ही सीमित न रह कर देश के सुदूर क्षेत्र में पहुंच गया है। उक्त विचार प्रो. के. एम. मालती ने व्यक्त किये। वह महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में चल रहे हिंदी का दूसरा समयके दूसरे दिन शनिवार को स्त्री अस्मितापर महादेवी वर्मा कक्ष में आयोजित चर्चा में सत्र की अध्यक्षता कर रही थी।
चर्चा में सहभागिता करते हुए विश्वविद्यालय के स्त्री अध्ययन की सहायक प्रोफेसर वासंती रमन ने कहा कि स्त्री की पहचान दूसरें की पहचान के साथ जुड़ी होती है चाहे वह जाति से हों या धर्म से। स्त्री-अध्ययन और महिला आंदोलन को जोड़ कर देखे तो उसके रास्ते और भी निकलेंगे। उन्होंने कहा कि महिला प्रश्नमहिला आंदोलनस्त्री अध्ययन समाज के जनमानवीयकरण के लिए जरुरी है। इसी से हिंदी भाषाएंसमाज एवं देश का विकास होगा। उन्होंने नामवर सिंह द्वारा स्त्री और दलितों के विषय में दिये गये विचार का समर्थन किया।
सुधा सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन में महिलाओं के लेखन की चर्चा नहीं है। इसमें हमें यह भी याद रखना होगा कि गांधीजी के अहिंसा और सत्याग्रह आंदोलन में स्त्रियों का योगदान एक औजार की तरह था लेकिन 1950 के बाद स्त्रियों ने दंगों का दंश भी झेला फिर आगे स्त्रियांघर की चारदीवारी में बंध कर रह गई। स्त्रियों को पूरी तरह सशक्त होने के लिए जनदबाव की आवश्यकता है। साथ ही उसे राजनीतिक संगठनों से जुड़ने की भी आवश्यकता है।
“शिकंजे का दर्द” की लेखिका सुशीला टाकभौरे ने कहा कि स्त्रियों का संरक्षण उसके लिए एक नियंत्रण की तरह है। दलित साहित्य के अस्तित्व पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह साहित्य सबसे पहले महाराष्ट्रमें मराठी भाषामें आया। दलित स्त्री लेखन में चेतना और उत्पीड़न की बात होती है। वह पूरी तरह से जागृत रहती है,जबकि गैर-दलित महिला लेखन में ऐसा नहीं है। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि जिस धर्म में स्त्री की विड़ंबना होती है उस असमानता के लेखन में परिवर्तन होना चाहिए,साथ ही विरोध भी जरुरी है। समाज की मानसिकता जातिवाद से नहीं बदली जा सकती बल्कि उन्हें खुद को बदलना होगा। अतंमें उन्होंने अपने व्याख्यान में कहा कि ‘स्त्री स्वयं एक व्यक्ति है और वह जब स्वयं निर्णय ले तभी वह सबल हो सकती है।’
सुप्रिया पाठक कहा कि स्त्री अध्ययन पाठयक्रम महिलाओं को एक स्थान प्रदान करता है। जब तक सारे समाज को मिलाकर विचार नहीं करेंगे तब तक कोई भी विमर्शसत्यापित नहीं हो सकता। जैसे हिंदी के बीच से बोलियों को यदि निकाल दिया जाए भाषा ही नहीं बचेगी। उसी तरह स्त्री समाज की हर हिस्से से जुड़ी हुई है।
सर्वेशजैन ने दलित महिला के न्याय की बात कहीं। उन्होंने कहा कि स्त्रियों के सशक्तीकरण के लिए पुरुषोंकी मानकिसता बदलने की जरुरत है।
इस दौरान छात्रों द्वारा उपस्थित किये गए प्रश्नों का उत्तर मंचास्थ वक्ताओं ने दिया। कार्यक्रम का संचालन तथा धन्यवाद ज्ञापन स्त्री अध्ययन विभाग के सहायक प्रोफेसर शरद जायसवाल ने किया।
चेतना से कलम का सिपाही बनना है- वरवर राव
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में आयोजित हिंदी के समय के दूसरे दिन अन्य जनांदोलन सत्र में विचारोत्तेजक बहस हुई। प्रख्यात चिंतक वरवर राव ने कहा कि समाज और व्यवस्था को बदलने के लिए आंदोलन होने चाहिए। उन्होंने कहा कि देश में महिला,आदिवासी और विस्थापितों के आंदोलन चल रहे हैं। देश के कई हिस्सों में व्याप्त असमानता को भी बातचीत का विषय बनाया जाना चाहिए। आंध्र और महाराष्ट्र के कई हिस्सों में काफी असमानता है। उन्होंने कहा कि आज हम नंदीग्राम,सिंगुर,या छत्तीसगढ़ में हो रहे विस्थापन पर बात नहीं करते। आज भी अस्पृश्यता और अछूत का दौर महाराष्ट्र में चल रहा है। राव ने लेखकों की भूमिका याद दिलाते हुए कहा कि हमारा ध्यान इस पर होना चाहिए कि हमें पूंजी का दास बनना है या चेतना से कलम का सिपाही बनना है। प्रगतिशील लेखक संघ की भूमिका आज समाप्त हो रही है जो कि चिंतनीय है। जनांदोलन से जुडे अरविंद अंजुम ने अपनी बात झारखंड के संदर्भ में रखी। उन्होंने कहा कि पहले हमारी धारणा थी कि विकास के लिए बलिदान जरूरी है। उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात कही कि जनांदोलन में विचारधारा का अभाव है और मुद्दे हावी हैं इसलिए जरूरी है कि इसका वैचारिक आधार पुख्ता किया जाए। नंदीग्राम डायरी के लेखक पुष्पराज ने कहा कि आज पूरे मीडिया में कहीं से भी एक संपादक नहीं कहता कि आप जनांदोलन पर लिखिए। उन्होंने बताया कि पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में संघर्षरत लोग कहते थे- ‘जान देबो जमीन देबो ना’मैं ऐसे लोगों की बात लिखने वाला पत्रकार हूं। आप राजसत्ता के साथ रहना चाहते हैं या आम जनता के साथ यह खुद आपको तय करना होगा। उन्होंने कहा कि जन आंदोलन की पत्रकारिता होनी चाहिए और कलम के सिपाहियों की फौज खड़ी होनी चाहिए। युवा कथाकार सत्यानारायण पटेल ने कुछ अधिक तल्ख अंदाज में अपनी बात मध्य प्रदेश में हो रहे जन आंदोलनों के संदर्भ में रखी। उन्होंने कहा कि चकाचौंध दुनिया को एक अंधेरे भरी आबादी के गटर में धकेल रही है। इक्कीसवीं सदी का संघर्ष मनुष्यों और पशुओं के बीच है। प्रो. रमेश दीक्षित ने कहा कि अभिव्यक्ति की जो आजादी भारत में है वह किसी दूसरे देश में नहीं है। उन्होंने कहा कि परिवर्तन की संभावना संसदीय लोकतंत्र सबसे अधिक है और हमें उसका भरसक इस्तेमाल करना चाहिए। आज बाजारवादी शक्तियों का प्रतिरोध नहीं हो रहा है,जिसका प्रतिरोध किये जाने की ज्यादा जरूरत है। उन्होंने कहा कि भारत अमेरिकी पूंजीवाद का एजेंट नहीं है। कथाकार औऱ चिंतक प्रेमपाल शर्मा ने संक्षेप में कहा कि भारत में पिछले दो वर्षों में जन आंदोलनों के लिए कुछ जमीन तैयार हुई है और संभावना है कि यह सिलसिला आगे भी चलता रहेगा। आम जनता के लिए हरियाणा में साहित्य उपक्रम प्रकाशन के माध्यम से साहित्य के लिए माहौल बनाने वाले विकास नारायण राय ने कहा कि भाषा और साहित्य दो अलग-अलग चीजें हैं। उन्होंने कहा कि आज अच्छा साहित्य लिखा जा रहा लेकिन वह वह लाखों पाठकों तक नहीं पहुंच पा रहा है। उन्होंने कहा कि साहित्य में बहुत ताकत है बस जरूरत है उसको आम जनता तक पहुंचाने की। आलोचक खगेंद्र ठाकुर ने सत्र में हुई बहस पर अपनी टिप्पणी की। सभागार में कुलपति विभूति नारायण राय,कथाकार से.रा. यात्री,गंगा प्रसाद विमल, संजीव,शिवमूर्ति,जयप्रकाश धूमकेतु,अशोक मिश्र,प्रकाश त्रिपाठी, स्वाधीन,मनोज मोहन,प्रो.के के सिंह,अमरेंद्र कुमार शर्मा,सहित विश्वविद्यालय के शोधार्थी व छात्र बड़ी संख्या में उपस्थित थे। कायर्क्रम का सफल संचालन वरिष्ठ पत्रकार व चिंतक रामशरण जोशी ने किया।
शुक्रवार, 1 फरवरी 2013
आलोचना की प्रवृत्ति भी विकसित करनी होगी – नामवर सिंह
हम लोग आज कल हिसाब चुकता करने में लगे हैं। समालोचक आज अपना दायित्व भूल चुका है। वह किसी रचना की समालोचना ह्रदय से नहीं कर पा रहा है। समालोचक को खुद अपनी आलोचना भी करने की प्रवृत्ति विकसित करनी होगी। शुक्रवार को हिंदी के विख्यात आलोचक प्रो नामवर सिंह ने हिंदी का दूसरा समय के हिंदी आलोचना कार्यक्रम में संबोधन के दौरान ये बातें कहीं। हिंदी आलोचना के इस कार्यक्रम में देश भर के कई समालोचक जमा हुए थे।
समता भवन के रामचंद्र शुक्ल सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में प्रख्यात आलोचक प्रो. निर्मला जैन ने कहा कि आलोचक आज आतंक का पर्याय हो गया है। कोई रचनाकार भी अपनी रचना की आलोचना सुनना नहीं चाहता। यह आलोचना वह है, जो मंच से कृति की प्रशंसा करता है। उन्होंने कहा कि आलोचकों से सैद्धांतिकी के निर्माण की अपेक्षा करना गलत है। आलोचना को यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन यूजीसी के मानदंडों में भी नहीं बांधा जा सकता है। इसके नियमों का पालन करना आलोचकों का काम नहीं है। प्रो. जैन ने कहा कि देशी तत्व को छोड़कर आलोचना नहीं की जा सकती। पाठकों में रचना के प्रति जागृति पैदा करना भी आलोचकों का ही दायित्व है। रचना और आलोचना के बीच समय अंतराल जरूरी है।
आलोचक खगेंद्र ठाकुकर ने कहा कि समाज में जनतंत्र के विकास के साथ लोकतंत्र का विकास जुड़ा है। किसी भी रचना का यथार्थ बाहर होता है। उसका सत्यापन आलोचक के लिए जरूरी है। आज की आलोचना कमजोर पड़ रही है। क्योंकि आलोचक सत्ता उन्मुख हो गए है। श्री ठाकुर ने कहा कि आलोचना और सत्ता एक साथ नहीं चल सकती। उन्होंने प्रेमचंद की रचना को सामने रखते हुए कहा कि उनकी तमाम रचनाओं के सामाजिक यथार्थ हैं। समाज की विसंगतियां उनकी रचनाओं में दिखती हैं।
कवि श्याम कश्यप ने अपने वक्तव्य में कहा कि आज संकट आलोचना का नहीं है, बल्कि आलोचकों का है। आलोचक अपने संकट को आलोचना का संकट बता देते हैं। जाने माने आलोचक एवं हिंदी विद्यापीठ के प्रो. सूरज पालीवाल ने इस बात को लेकर चिंता जताई कि आज हिंदी समालोचना का स्वरूप नहीं बन पा रहा है। कविता के नए प्रतिमान के बाद हिंदी आलोचना में घालमेल की स्थिति बन गई है। इस मौके पर राहूल सिंह, भारत भारद्वाज, अवधेश मिश्र, गौतम सान्याल और अखिलेश ने भी आलोचना को लेकर अपने-अपने विचार रखे। हिंदी आलोचना का संचालन प्रो शंभु गुप्त ने किया। विश्वविद्यालय के कई शोधार्थियों ने भी इसमें हिस्सा लिया।
साहित्य जीवन से कट चुका है- रवींद्र कालिया
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के हिंदी का दूसरा समय कार्यक्रम के पहले दिन सआदत हसन मंटो कक्ष में हिंदी कथा साहित्य पर हुई बहस पर अध्यक्षीय टिप्पणी करते हुए प्रख्यात कथाशिल्पी और नया ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया ने कहा कि हमारा समय को समझने का दावा खोखला है। साहित्य जीवन से कट चुका है। स्त्री की स्थिति आज भी दारुण है। हमारे लेखक किसानों की स्थिति से बेखबर हैं। समाज तेजी से बदला है। देखा जा रहा है कि समाज की गति साहित्य से तेज है। पहले साहित्य समाज का दर्पण हुआ करता था,आज ऐसा नहीं है। साहित्य आज समाज के पीछे लंगड़ाता हुआ चल रहा है। उन्होंने कहा कि भाषा समय के साथ बदलती है। हमें आज प्रेमचंद,फैज,गालिब की भाषा प्रासंगिक लगती है। आज के कई रचनाकारों की भाषा खोखली हो चुकी है। उन्होंने कहा कि चर्चा नई पीढ़ी के द्वारा लिखी जा रही रचनाओं पर केंद्रित होनी चाहिए थी। अंत में उन्होंने कहा कि चीजें,वहीं चमकाई जाती हैं,जहां जंग लग जाता है।
प्रख्यात कथाकार और विश्वविद्यालय में रायटर इन रजिडेंस संजीव ने नई पीढ़ी के लेखकों द्वारा उपन्यास न लिखे जाने का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि पिछले दिनों हिंदी के एक बड़े प्रकाशक द्वारा युवा लेखकों के लिए हिंदी उपन्यास प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था,जिसमें उनको पुरस्कार देने लायक उपन्यास नहीं मिले। उन्होंने कहा कि उपन्यास विधा नये लेखकों को आकर्षित नहीं कर पा रही है। उन्होंने कहा कि आज युवा लेखकों के पास सरोकार नहीं हैं और उनका पूरा ध्यान करिअर की ओर है।
कथाकार अखिलेश ने कहा कि यह एक साथ निर्माण और ध्वंस का समय है। यह ऊपर से जितना चमकदार है,अंदर से वह उतना धूसर,कालिख भरा है। आज से पहले सरल यथार्थ का समय था। उन्होंने कहा कि आज बहुत बड़ा मध्यवर्ग तैयार हुआ है। आज के कहानीकारों ने कहानी की भाषा और शिल्प को बदला है।
युवा लेखिका हुस्न तबस्सुम निहां ने मुस्लिम समाज की महिला लेखकों को होने वाली पारिवारिक दिक्कतों का उल्लेख किया। उन्होंने शिकायत के अंदाज में कहा कि साहित्यिक जगत मुस्लिम लेखिकाओं को नकार रहा है। कथाकार जयनंदन ने कहा कि आज हिंदी में अच्छी कहानियां लिखी जा रही हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि हिंदी में लिखकर रोटी नहीं कमाई जा सकती जबकि अंग्रेजी में ऐसा संभव है।
वरिष्ठ कथाकार ममता कालिया ने कहा कि कथा साहित्य का अगला समय वही है जो कहानियां हमें याद रह जाएं। प्रियदर्शन मालवीय ने कहा कि हिंदी के कहानीकार जोखिम उठाना नहीं चाहते और बच-बचाकर चलते हैं। सच्चाई यह है कि जोखिम न उठाना ही हिंदी कहानी की मुख्य समस्या है। हम जटिल प्रश्नों से टकराना नहीं चाहते। चंदन पांडे ने अपने वक्तव्य में कहा कि जातिवाद के जहर पर हिंदी में नगण्य लेखन मिलता है। भष्टाचार के नाम पर आज तक हमारे पास श्रीलाल शुक्ल का रागदरबारी,विभूति नारायण राय का तबादला ही है। आज हिंदी कथा साहित्य की पाठकों तक पहुंच बहुत चिंतनीय है जबकि हिंदी पट्टी में 10-15 करोड़ की आबादी वाला मध्यवर्ग है।
सत्र के दौरान साठोत्तरी कहानी के प्रतिनिधि कथाकार काशीनाथ सिंह मंच पर उपस्थित थे। कथा साहित्य पर हुई बहस में कथाकार जयनंदन,मोहम्मद आरिफ,कैलाश वनवासी,मनोज रूपड़ा,रमणिका गुप्ता,सृंजय,शिवमूर्ति ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर सभागार में वरिष्ठ कथाकार से.रा. यात्री,राजकिशोर,मनोज मोहन सहित सैकड़ों रचनाकार,शिक्षक,शोधार्थी और छात्र उपस्थित थे। दलित अब मुखर नायक : नामवर सिंह
हिंदी का दूसरा समय कार्यक्रम का उदघाटन
प्रख्यात आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने कहा कि जहां तक हिंदी के दूसरे समय का सवाल है समय को मैं एक वृहतर संदर्भ में देख रहा हूं। एक समय पहले था, जब वर्ष 2009में हिंदी समय का वृहद आयोजन किया गया था और अब 2013में यह हिंदी का दूसरा समय है।
विश्वविद्यालय के कुलाधिपति प्रो. नामवर सिंह ने यह बात आज यहां महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के हजारी प्रसाद द्विवेदी सभागार में पांच दिनों तक चलने वाले हिंदी के साहित्यिक महाकुंभ ‘हिंदी का दूसरा समय’ के उद्घाटन अवसर पर कही। उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य की शुरुआत 1000 ईस्वी में हुई। यह समय आधुनिक भारतीय भाषाओं के निर्माण का समय रहा है। यह विश्वविद्यालय हिंदी की दूसरी परंपरा का निर्माण कर रहा है। दूसरी सहस्राब्दी की शुरुआत लोक भाषाओं के उदय और लोकसाहित्य के उदय के साथ हुई। उस समय के साहित्य के मूल में भक्ति की भावना प्रधान थी। स्त्री को पहली बार वाणी साहित्य में मिली। उन्होंने कहा कि मीरा ने राजघराना तक छोड़ दिया था। सिंह ने विशेष जोर देकर कहा कि दुनिया आबादी दलित और स्त्री ने बड़ी संख्या में साहित्य की रचना की। यह दूसरा समय था जिसकी एक सहस्राब्दी पार हुई। भारतीय इतिहास में यह दूसरी परंपरा कही जाएगी। आज स्थिति यह है कि स्त्री लेखन को लेकर धड़ाधड़ पत्र-पत्रिकाओं के विशेषांक निकल रहे है। अब कई विश्वविद्यालयों में स्त्री विमर्श के पाठयक्रम बन गए है। भीमराव आंबेडकर दलित को मूक नायक कहते थे वह अब मुखर नायक हो गया है। दलितों में अभी पुरुष ही लिख रहे है। आने वाले समय में यह सवाल भी उठने वाला है कि दलित अपनी स्त्रियों को कितनी आजादी देते है। उन्होंने अपनी बात का समापन करते हुए कहा हिंदी के तीसरा समय का आयोजन मुझे उम्मीद है कि विभूति नारायण राय ही करेंगे। भविष्य के कार्यक्रम के लिए यहां से एक नई दिशा तय होगी। यह आयोजन वागविलास के लिए नहीं होगा।
वरिष्ठ आलोचक प्रो. निर्मला जैन ने कहा कि यह आयोजन साहित्य और भाषा के महाकुंभ की तरह है। उन्होंने कहा कि हिंदी की अवधारणा सिर्फ साहित्य के रूप में नहीं है, हिंदी को सब की भाषा बनना है। उन्होंने उम्मीद जताई की इस आयोजन के माध्यम से हम अपनी परंपरा, इतिहास, ताकत, कमजोरियों और भविष्य की चुनौतियों पर बात करेंगे। हिंदी का दूसरा समय की अभिनव कल्पना करने वाले कथाकार और विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने अपनी अध्यक्षीय टिप्पणी में कहा कि हिंदी का दूसरा समय का आशय दूसरी परंपरा की खोज है। हिंदी का दूसरा समय कार्यक्रम के संयोजक राकेश मिश्र ने संक्षेप में आयोजन की रूपरेखा पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पहले हिंदी समय के आयोजन से लेकर पिछले साढ़े चार वर्षों के दौरान हिंदी साहित्य और विभिन्न अनुशासनों में आए बदलाव को हम यहां अलग-अलग विषयों पर आयोजित सत्रों में समझने की कोशिश करेंगे। इस अवसर पर जयप्रकाश धूमकेतु के संपादन में प्रकाशित अभिनव कदम के नए अंक लोकार्पण मंच द्वारा किया गया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में हिंदी के कवि, कथाकार, आलोचक और विश्वविद्यालय के कर्मचारी उपस्थित थे।हाशिए का समाज बने कविता का केन्द्र : बद्रीनारायण
वरिष्ठ कवि और विचारक बद्रीनरायण ने कहा कि हाशिए का समाज ही कविता का केन्द्र है। अपने उत्स से कटकर कोई भी कविता जीवित नहीं रह सकती। भूमंडलीकरण के दबावों के बीच लालचहीन हाशिए के समाज से आने वाले लोग ही कविता को उसकी अपनी वाजिब जगह दिलाएंगे। वे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,वर्धा द्वारा आयोजित हिंदी का दूसरा समय कार्यक्रम के अतंर्गत शुक्रवार को महादेवी वर्मा कक्ष में आयोजित कविता का दूसरा समय और सामर्थ्य नामक समानांतर सत्र में बीज वक्तव्य दे रहे थे। इस अवसर पर नई दिल्ली से आए वरिष्ठ कवि उपेन्द्र कुमार ने कहा कि कविता से पाठक दूर नहीं हुई है। यह भ्रम प्रकाशकों के द्वारा फैलाया जा रहा है। हर अच्छी कविता सुनने वाले के मन में एक कविता पैदा करतीहै। यह शाश्वत मानवीय संवेदनाओं की वाहक है। कोलकाता विश्वविद्यालय में हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. रामअहृलाद चौधरी ने कहा कि कविता परंपरा का पानी है।जिस तरह दरिया को नहीं बांटा जा सकता उसी तरह कविता भी नहीं बंट सकती। बंटवारे के बाद फैज अहमद फैज पाकिस्तान चले गए पर उनकी कविता का बंटवारा नहीं हो सका । कविता जख्मी लोगों को ताकत देती है। इस अवसर पर वरिष्ठ कवि विजय किशोर मानव ने कहा कि कविता समय के साथ बदलती है। हर युग की कविता अपने समय के साथ संवाद करती है। कवि मिथिलेश श्रीवास्तव ने काव्य छवियों के माध्यम से वर्तमान जीवन यथार्थ को बहुत ही संवेदनात्मक ठंग से प्रस्तुत किया। वरिष्ठ कवि प्रतापराव कदम ने कहा कि कविता को उसके युगीन परिवेश में देखने की जरूरत है। इस अवसर पर रवीन्द्र स्वपनिल प्रजापति ,श्रीमती बृजबाला शर्मा और कुमार वीरेन्द्र ने भी अपने वक्तव्य रखे। अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए शेरजंग गर्ग ने कहा कि संवेदना और मानवीय सरोकारों से युक्त कविता ही शाश्वत रहती है। यह मनुष्य को नष्ट होने से बचाती है। यह मानवता की रक्षा के लिए बनी है। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,वर्धा में हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. के. के. सिंह ने कार्यक्रम का संचालन किया।