सोमवार, 11 फ़रवरी, 2013 को 16:53 IST तक के समाचार

पूरी दुनिया में फाँसी की सज़ा को लेकर विवाद है.
क्या दिसंबर 2001 में संसद पर हुआ हमला महात्मा गाँधी की हत्या से ज़्यादा संगीन अपराध था?
संसद पर हमले की साज़िश के दोषी पाए गए अफ़ज़ल गुरू के वकील एनडी पंचोली ऐसा नहीं मानते.उनका कहना है कि महात्मा गाँधी की हत्या संसद पर हमले से बड़ा अपराध था पर उसकी साज़िश में शामिल कई लोगों को फाँसी की बजाए उम्र क़ैद की सज़ा हुई थी. लेकिन अफ़ज़ल गुरू को परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर लटका दिया गया.
महात्मा गाँधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को की थी, जिसके लिए उन्हें और साज़िशकर्ता नारायण आप्टे को फाँसी दी गई. पर नाथूराम गोडसे के साथ साज़िश में शामिल विष्णु कड़कड़े, गोपाल गोडसे आदि लोगों को मृत्युदंड नहीं दिया गया.
हालांकि सरकार का कहना है कि अफज़ल गुरु को फांसी दिए जाने की में प्रक्रिया में कानूनी कार्रवाई का पालन हुआ है.
ये हैं वो चार मुद्दे जिन्हें लेकर अफ़ज़ल गुरू की फाँसी पर सवाल उठाए जा रहे हैं:
जुर्म का इक़बाल
अफ़ज़ल गुरू को पुलिस ने मीडिया के सामने पेश किया जहाँ उन्होंने अपने जुर्म का इकबाल कर लिया. एनडी पंचोली कहते हैं कि पुलिस ने उनसे जबरन ये बयान दिलवाया जबकि ऐसा करना ग़लत था. पुलिस को दिए गए इक़बालिया बयान को बाद में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी ख़ारिज कर दिया. लेकिन मीडिया में अफ़ज़ल गुरू के जुर्म क़बूलने के बाद ख़ुद उनके रिश्तेदार और की वकील ये सोचते हुए पीछे हट गए कि जो आदमी ख़ुद जुर्म क़बूल कर रहा है उसका बचाव करने का क्या फ़ायदा.गवाहों से जिरह
अदालत में अभियोजन पक्ष ने जिन 80 गवाहों को पेश किया था उनमें से 60 से ज़्यादा गवाहों से अफ़ज़ल गुरू के वकील ने सवाल-जवाब ही नहीं किए. पंचोली की कहना है कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वकील और मुवक्किल को एक दूसरे पर भरोसा ही नहीं था. उन्होंने कहा कि जब इन गवाहों से सवाल-जवाब ही नहीं किए गए तो अदालत ने इनकी बातों को सबूत के तौर पर स्वीकार कर लिया. किसी गवाह के बयान पर ऐतराज़ न किया जाए तो उसे स्वीकार ही माना जाता है.क़ानूनी मदद
"अभी तक रवायत रही है -- एक मामले को छोड़कर -- परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर फाँसी नहीं होती. फाँसी उन लोगों को दी जाती है जो सीधे हत्या में शामिल होते हैं."
एन डी पंचोली, वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता
परिस्थितिजन्य साक्ष्य
भारतीय क़ानून में कहा गया है कि हत्या के जुर्म की सज़ा अधिकतम मृत्युदंड तक हो सकती है. लेकिन मौत की सज़ा देने में बहुत एहतियात बरतने की रवायत है और मृत्युदंड सिर्फ़ दुर्लभतम मामलों में ही दिया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने संसद पर हमले को दुर्लभतम मामलों में गिना, साथ ही कहा कि इस काम को अंजाम देने वाले को मृत्युदंड देने से ही राष्ट्र की “सामूहिक भावना” संतुष्ट हो सकती है.वकील एनडी पंचोली कहते हैं कि अफ़ज़ल गुरू हमलावरों में शामिल नहीं था. गुरू ने स्वीकार किया था कि हमलावरों को उसने मदद की. “अभी तक रवायत रही है -- एक मामले को छोड़कर -- परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर फाँसी नहीं होती. फाँसी उन लोगों को दी जाती है जो सीधे हत्या में शामिल होते हैं.”
उन्होंने कहा कि संसद पर हमले से भी भयानक मामला गाँधी जी की हत्या का था. पर उसमें भी नाथूराम गोडसे को मदद देने वाले उसके सहयोगी विष्णु कड़कड़े, जिन्होंने पिस्तौल का इंतज़ाम किया, उन्हें फाँसी नहीं दी गई. क्योंकि ये नहीं कहा जा सकता कि अपराध के बारे में अपराधियों को मदद देने वाले को मालूम है या नहीं. ऐसे मामले में फाँसी नहीं दी जानी चाहिए.