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विवेक सुन रहे है खब्बुओं की पीड़ा / विवेक शुक्ला

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 कौन सुनेगा खब्बू का दर्द/ विवेक शुक्ला 


यूं अल्पसंख्यकों के हक में बड़ी- बात होती हैं, पर इन अल्पफसंख्यकों के दर्द को सुनने वाला कोई नहीं है। बात हो रही है खब्बुओं की, जिन्हें वामहस्त भी कहते हैं। यानी लेफ्टहैंडरर्स की। इनका दर्द सुनने या समझने वाला कोई नहीं है। तो फिऱ इनके मन और सुविधानुसार घर कौन बनाएगा?

यकीन मानिए कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति पूर्व बराक ओबामा, अमिताभ बच्चन, राहुल बजाज, चार्ली चेपलिन जैसी प्रख्यात शख्सियतों को कभी अपने घरों में चैन से रहने का मौका नहीं मिला होगा। हम सच कह रहे हैं। हालांकि इऩके घरों में जाने का तो हमें कभी मौका नहीं मिला पर इनके घर चाहे व्हाइट हाउस हों या प्रतीक्षा, इनके हिसाब से तो नहीं बने होंगे।  वजह इनका खब्बू होना है।खब्बू अपने आप में एक वो मिनोरिटी समूह है,जो वोट बैंक नहीं है। महत्वपूर्ण है कि हर साल 13 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय खब्बू दिवस ( World Left handers day) के तौर पर मनाया जाता है। पहली बार यह 13 अगस्त 1992 को मनाया गया था| तब इसकी पहल इंग्लैंड के खब्बू क्लब ने की थी| 

 

सदियों से लोग उन्हें बाएँ हाथ के बजाए दाएँ हाथ से लिखने और दूसरे काम करना सिखाते आए हैं| लेकिन इस सब से ऐसे लोगों को मानसिक चोट पहुंचती है| इस समस्या की ओर ध्यान दिलाने के लिए ही अब यह दिन मनाया जाता है| इस दिन का एक दूसरा पहलू है रोज़मर्रा की ज़रूरत की चीजें बनाने वालों का ध्यान इधर खींचना ताकि वे ऐसी चीजें बनायें, जिन्हें इस्तेमाल करने में वामहस्त लोगों को कठिनाई न हो| माना जाता है कि वर्तमान  में संसार में लगभग 50 करोड़ खब्बू  हैं|

कौन-कौन खब्बू

इतिहास में जो जाने-माने वामहस्त हस्तियाँ हुई हैं उनमें जूलियस सीज़र, नेपोलियन, सिकंदर, लेओनार्दो दे विन्ची, माइकल एंजेलो,  मोज़ार्ट, आइंस्टीन और न्यूटन शामिल हैं| देश की आर्किटेक्ट बिरादरी भी खब्बुओं को लेकर संवेदनहीन है। उनके हितों का ख्याल नहीं रखती। रीयल एस्टेट कंपनियों को आर्किटेक्ट बिरादरी के साथ मिलकर खब्बुओं के पक्ष में सोचना चाहिए। कम से कम कुछ पहल तो हो। आर्किटेक्ट अपनी तरफ से कुछ नहीं कर सकते। उन्हें तो जो कहा जाता है अपने बिल्डर की तरफ से, वो उसी तरह से आवासीय और कमर्शियल इमारतों के डिजाइन तैयार कर देते हैं।

 

पुणे में एक संस्था खब्बुओं के हितों के लिए संघर्षशील है। उसके सदस्य पुणे और महाराष्ट्र के दूसरे बड़े शहरों में रीयलएस्टेटफर्म के शिखर लोगों से मिलते हैं। उनसे आग्रह करते हैं कि वो अपने खब्बू कस्टमर्स का ख्याल करें। कहते हैं कि  अगर बिल्डर बिरादरी खब्बुओं को लेकर थोड़ा बहुत सोचने लगे तो वे उनका जीवन बेहतर बना सकते हैं।  समाज उनके साथ जाने-अनजाने नाइंसाफी कर रहा है।


 इस बीच, पेशे से खब्बू बैंकर  सुरेखा भसीन ने एक रोचक किस्सा सुनाया। हुआ यूं कि वो  एक बिल्डर के दफ्तर में बैठकर एक फॉर्म भर रही थी। फॉर्म उसे बिल्डर के दफ्तर ने दिया था। सुरेखा ने एक फ्लैट को खरीदने का फैसला कर लिया था। चूंकि वो खब्बू है, तो  कि वो फॉर्म अपने बाएं हाथ से ही भर रही थी।  जब वोफॉर्म भर रही थीं तब उस कंपनी के एक आला अफसर ने उसे देखकर पूछा,  ‘चूंकि आप लेफ्टहैंडर हैं तो क्या आप अपने फ्लैट में कुछ अलग तरह की फीटिंग चाहेंगी ताकि आपको सुविधा हो ?’  उसने कहा कि मैंने इससे पहले कभी किसी कस्टमर को इस तरह की पेशकश नहीं की थी। शायद इसलिए कि मैंने कभी सोचा ही नहीं अपने लेफ्ट हैंडर कस्टमर्स के बारे में।

 तब सुरेखा ने कहा कि ‘अगर आप मेरे किचन में सिलेंडर रखने की जगह बायीं तरफ करें तो मुझे सुविधा होगी। उस स्थिति में मुझे सिलेंडर को रखने या हटाने में सुविधा होगी। किचन में मसाले रखने वाली बोतलों के लिए जगह भी बार्यी तरफ ही रखेँ। दीवार से सटी लकड़ी की अल्मारियों को इस तरह से बनाएं ताकि उन्हें बाएं हाथ से खोला जा सके।’ उसकी ये सब बातें मान ली गईं।


 दरअसल किसी खब्बू को अपने बायें हाथ से अल्मारी खोलने से लेकर घर का दरवाजा खोलने होता है। ये  कोई बहुत आसान नहीं होता। कारण ये है कि आमतौर पर ये सब दायें हाथ से काम करने वालों के हिसाब से बनाए जाते है। 20-25 साल पहले तो ज्यादातर इमारतें विकलांगों की सुविधा के अनुसार नहीं बनती थीं। जागृति आई तो आर्किटेक्ट भी विकलांगों के मन की इमारतों के डिजाइन तैयार करने लगे।इसलिए इमारतें और घर भी लेफ्टहैंडरफ्रैंडली बनने चाहिए। इसी तरह से वामहस्तों के घरों की किचन की सिंक को बायींतरफ बनाया जा सकता है। उन दरवाजों के हैंडिल भी बायींतरफ किए जा सकते हैं,जिन्हें घर की गृहिणि को बार-बार खोलना होता है। इन कदमों को उठाने से खब्बुओं को बहुत राहत दी जा सकती है।

आमतौर पर तो बिल्डर अपने लेफ्ट हैंडर कस्टमर के हितों को नहीं देखते। कुछ रीयल एस्टेट कंपनियों के आला अफसर कहते हैं था कि अगर उन्हें कोई कस्टमर अपने फ्लैट में कुछ अलग से बदलाव करने के लिए कहता है तो वे उसका ख्याल रखते हैं। आखिर हम बाजार में तब तक ही रह सकते हैं,जब तक अपने कस्टमर्स को लेकर सेंसटिव हों।

 

ये सच है कि  पूरी तरह से खब्बुओंके हिसाब से कोई बिल्डिंग का निर्माण करना नामुमकिन है। क्योंकि किसी भी इमारत का जब निर्माण होता है तो बहुसंख्यकों का ख्याल रखा जाता है।  पर अब वक्त आ गया है कि लेफ्टहैंडर्स और विकलांगों के हितों का ध्यान रखा जाए।अक्सर हम सुनते हैं , यह तो मेरे बाएं हाथ का खेल है। पर खब्बू होना आसान नहीं है खासकर खब्बू बच्चे घर और स्कूल में खब्बूपन के बारे में फैले मिथ्या प्रचार के कारण कई समस्याओं का सामना करते हैं।


खब्बू होना आनुवंशिक है इसलिए इसे बदला नहीं जा सकता। लेकिन अभिभावक तथा शिक्षक अक्सर बच्चों को दाहिने हाथ के इस्तेमाल के लिए दबाव डालते हैं जिससे बच्चे के स्वाभाविक विकास पर बुरा असर पड़ता है। खब्बू बच्चों पर दाहिने हाथ के इस्तेमाल के लिए दबाव डालने से उनमें हीनभावना पैदा होती है और उनकी प्रगति धीमी होती है। इससे उन्हें अंक कम मिलते हैं।

तो सवाल उठता है कि खब्बुओं के लिए कैसे बने घर? उनकी सुविधा के हिसाब से बने इमारतें?


   इंस्टीच्यूटआफटाउनप्लानिंग से जुड़े हुए प्रो. बी.एस.मेशराम कहते हैं कि खब्बुओं के लिए घर बनाने की सोच तो बहुत अच्छी है। पर ये सोच प्रेक्टिल नहीं मानी जा सकती। क्यों ? वे कहते हैं कि हरेक परिवार में बमुश्किल से एक खब्बू होता है। जाहिर है,इन हालातों में आप लेफ्टहैंडर के मन से किस तरह से घर बनाएंगे। हालांकि वो कहते हैं कि ये संभव है कि कोई इंसान अपने घर को जितना संभव हो लेफ्टहैंडरफ्रैडली बन ले।

कुल मिलाकर बात ये है कि हालांकि लेफ्टहैंडर घर या इमारतें बनना तो दूर की संभावना है, पर इस लिहाज से ठोस पहल होनी चाहिए।


ये लेख आज हरिभूमि में पब्लिश हुआ है ।


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