दिल्ली के 10 सबसे मशहूर बंगाली कौन ? / विवेक शुक्ला
दिल्ली में गैर-हिन्दी प्रदेशों से सबसे पहले यहां आया बंगाली समाज। दिल्ली के देश की राजधानी बनने के करीब 30-40 साल पहले यहां बंगाली भद्रलोक कामकाज के सिलसिले में आने लगे थे। इन्होंने दिल्ली को हर स्तर पर समृद् भी किया।
आइये आज जब दुर्गा पूजा शरू हो रही है, तो दिल्ली के दस सबसे मशहूर बंगालियों की बात करें। इस सूची की शुरूआत ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के प्रोड्यूसर सिद्धार्थ बसु से हो सकती हैं।
फ्रेंक एंथनी स्कूल और हिन्दू कॉलेज में पढ़े क्विज मास्टर बसु ईस्ट ऑफ कैलाश में रहते हैं। वे आपको साउथ एक्सटेंशन मार्किट में घूमते हुए मिल सकते हैं।
अब बात डा.पलाश सेन की।
पेशे से डाक्टर पलाश सेन ने ही देश के मशहूर बैंड युफ़ोरीया को शुरू किया था। सेंट कोलम्बस स्कूल और यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज ( यूसीएमएस) के स्टुंडेंट रहें सेन ने कुछ फिल्मों में गाया भी है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विश्वसनीय बनने से पहले ही अर्थशास्त्री डा.बिबेक देबरॉय यहां खासे लोकप्रिय थे। दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स के छात्र रहे देबरॉय नीति आयोग में भी सलाहकार रहे। वे भारतीय विदेशी व्यापार संस्थान,वित्त मंत्रालय से भी जुडे रहे हैं। उन्होंने महाभारत का गहन अध्ययन किया है। वे महा भारत पर घंटों बोल सकते हैं ।
कनॉट प्लेस से सटे राजा बाजार पर स्थित यूनियन एकाडमी स्कूल की प्रिंसिपल सुश्री मंजू मजूमदार मैडम का दिल से सम्मान करता है।
उन्हीं की जुझारू कोशिशों के चलते इस स्कूल में बांग्ला कक्षाएं फिर लगने लगीं। पिछले दसेक सालों तक यहां पर बांग्ला की कक्षाएं बंद हो गई थीं क्योंकि उसके लिए पर्याप्त छात्र नहीं मिलते थे। ये स्कूल 1934 से दिल्ली में है । पहले शिमला में था। इसे वहां बसे बंगाली समाज ने शुरू किया था।
मंजू मैडम ने स्कूल के आसपास के बहुत से बांग्लाभाषी परिवारों से मिलकर उनके बच्चों को अपने यहां दाखिला दिलवाने का आग्रह किया।
शर्मिष्ठा मुखर्जी तो दिल्ली का बेहद जाना पहचाना नाम है। लेडी इरविन स्कूल से पढ़ीं शर्मिष्ठा कथक की डांसर हैं। सुशिक्षित और सुसंस्कृत शर्मिष्ठा मुखर्जी राजनीति में भी सक्रिय रहती हैं। स्मृतिशेष राष्ट्रपति प्रणव कुमार मुखर्जी की पुत्री होने के बावजूद वो जनता से जुड़े सवालों पर सड़कों पर आंदोलन करने से पीछे नहीं रहतीं।
दिल्ली हो या बंगाल, बंगालियों की जान है फुटबॉल। दिल्ली से एक बढ़कर एक बंगाली फुटबॉलर खेले हैं। पर अनादि बरूआ जैसी बुलंदियों को किसी ने नहीं छुआ।
वे 1986 के सिओल एशियन गेंम्स में भाग लेने वाली भारतीय टीम में थे। लंबे समय तक प्रेसिडेंट एस्टेट में रहे अनादि बरूआ भारत की महिला फुटबॉल टीम के कोच भी रहे हैं। वे दिल्ली से संतोष ट्रॉफी में 7 बार खेले हैं।
अब बात कुछ उन बंगाली हस्तियों की जो दिल्ली से हैं, पर अब यहां पर स्थायी रूप से नहीं रहती। इस लिहाज से 1994 की पूर्व मिस यूनिवर्स और मैं हूं ना,दस्तक, बीवी नंबर वन, फिजा की हिरोइन सुष्मिता सेन का नाम लेना होगा।
वसंत कुंज की दुर्गा पूजा में गीत-संगीत के कार्यक्रमों से जुड़ी रहीं सुष्मिता सेन का परिवार दिल्ली में ही रहता है। दिबाकर बनर्जी खाटी दिल्ली वाले हैं।
करोल बाग में जन्में- बढ़े हुए और बाल भारती स्कूल में पढ़े दिबाकर बनर्जी ने ही बनाई थीं खोसला का घोसला, ओए लक्की, लक्की ओए, लव सेक्स और धोखा जैसी श्रेष्ठ फिल्में। संगीत निर्देशक शांतनु मोइत्रा तो अपने सीआर पार्क के ए ब्लॉक वाले हैं।
उनके मम्मी- पापा अब भी वहीं रहते हैं। पूसा रोड स्थित स्प्रिंगडेल स्कूल तथा देशबन्धु कॉलेज के स्टुडेंट रहे शांतनु ने हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी
जैसी उम्दा फिल्म का संगीत दिया था। और अंत में बात व्यक्ति की नहीं बल्कि चांदनी चौक की एक मिठाई की दूकान की। इसका नाम है अन्नपूर्णा भंडार। बंगाली मिष्ठान की इस दुकान को मोहिनी मोहन मुखर्जी ने 1922 में खोला था। वे लाहौर में रेलवे के मुलाजिम थे।
उन्होंने 1920 में नौकरी छोड़कर दिल्ली का रुख किया था। दो साल के बादअन्नपूर्णा भंडार चालू किया। इधर का संदेश,चमचम,रसगुल्ला का स्वाद दिव्य होता है। दिल्ली इस पर जान निसार करती है।
चित्र डॉक्टर पलाश सेन और सुष्मिता सेन
ये लेख आज नवभारत टाइम्स में छपा है ।