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जनसत्ता और श्रीश जी की बातें

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 *जनसत्ता के राज़दार श्रीशजी*


श्रीश मिश्रा जी नहीं रहे, यह कहकर आज बात पूरी नहीं होगी। जब-जब जनसत्ता की बात होगी, श्रीशजी याद किए जाएंगे। अखबारी दुनिया से वाकिफ ज्यादातर लोग यही मानते आए हैं कि प्रभाष जोशी, बनवारी, राहुल देव और ओम थानवी ही जनसत्ता की धमकदार, शानदार साख के शिल्पकार रहे। उन्हें कौन बताता कि हमारे बीच एक ऐसा अथक नायक भी था, जो खामोशी से शब्दकर्म करते हुए अखबार की दैनंदिन यात्रा का इंतजाम करता था। 

आज उनके निधन की खबर वाट्स ग्रुप से मिली तो दिमाग झन्ना गया। मित्रों से एक तस्वीर मांगी। पर किसी के पास नहीं मिली। वजह साफ थी कि वे तो अपनी धुन में मगन रहने वाले होलटाइमर खबरजीवड़े  सरीखे जीव थे। सिर्फ अखबार वक्त पर निकालने का नशा। बाकी चीजें तरजीही नहीं थीं उनके लिए। दुनिया भर का बोझ अपने ऊपर लेने वाले। इस चक्कर में अगर कभी गुणवत्ता की ऐसी- तैसी हो जाती तो उनका तर्क होता कि पहलवान, अखबार पाठक के घर तक ना पहुंचे तो क्या इसका अचार धरेंगे। अपनी आलोचना से बेपरवाह होकर वे अक्सर कहते-मुन्ना यह अखबार है, गीताप्रेस की रामायण नहीं...। पर ऊर्जा के इस भरपूर उपयोग के बीच भी उनका लिक्खाड़पना सरगर्म रहता। जनसत्ता रविवारी के लिए दो-चार ऐसे मौके आए, जब कवर स्टोरी का संकट पड़ा। हम उनकी शरण में गए। खेल और फिल्म उनके पसंदीदा विषय थे। वे मुंह में पान दबाए इतना ही कहते, टेंशन मत लो मुन्ना, एक दिन का समय दो। चौबीस घंटे में उनकी चील बिलउव्वा राइटिंग में बीस-पच्चीस पन्ने मिल जाते। हमें राहत मिल जाती। कम ही लोग जानते होंगे कि जनसत्ता में राज़दार के नाम से 'परदे के पार'नामक जो फिल्मी कालम छपता था, वह श्रीशजी ही लिखते थे।तब्बू से लेकर रेखा तक, सबके रसीले राज़ उनके पास होते थे। खेल की जानकारी ऐसी कि खेल संपादक सुरेश कौशिक भी गाड़ी अटकने पर उन्हें याद फरमाते।

एक पिनहा शौक उनका और था-पुराने गाने सुनने का। कुछ गाने मैंने उन्हें भेंट किए थे। एक बार कहने लगे, राजकपूर के गाने उन्हें बहुत पसंद हैं। मैंने पूछा, कोई खास? वे मुस्कुराए,  वही मुकेश वाला-'सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी'...

इस बात में दम था। हम अपने इर्द-गिर्द होशियारों की दुनिया में यह हकीकत देख ही रहे हैं।

श्रीशजी, जब तक जनसत्ता है, आप याद किए जाते रहेंगे।


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