कैनेडा ने तोड़े गर्मी के सारे रिकार्ड... / जब मैंने भी तोड़ा था दैनिक हिन्दुतान का रिकार्ड...
कैनेडा के इतिहास में कल का सोमवार का दिन सबसे गर्म दिन के तौर पर दर्ज हो गया जब ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत के लिट्टन शहर में पारा 47.5 डिग्री सेल्सियस को छू गया। हमारे शहर वैंकूवर में भी पारा 40 डिग्री के आस-पास रहा।
इसके साथ ही गर्मी के मौसम से जुड़ा भारत का ऐसा ही एक वाकया मुझे याद आ गया जब पत्रकारिता के इतिहास के कुछ रिकार्ड बने थे। 1998 में जेवीजी टाइम्स बंद होने के बाद कुछ समय के लिए मैं फ्रीलांसर था। दैनिक हिन्दुस्तान के लिए मैं विज्ञान से जुड़े लेख लिखा करता था। संपादक थे श्री आलोक मेहता।
एक बार जब उनसे मिलने गया तो उनसे मिलने सहायक संपादक विजय किशोर मानव जी आये। अखबार में मेरा नाम सबसे पहले उन्होंने ही छापा था। अप्रैल का महीना था। बेहद गर्मी। आते ही बोले- इस बार गर्मी को लेकर कुछ नया करना चाहता हूं। बहुत छाप लिया आइसक्रीम, कूलर, फ्रिज। कुछ नया होना चाहिए।
आदत के मुताबिक मेहता जी मुस्कुरा रहे थे। अचानक मानव जी की नजर मुझ पर पड़ी। वे बोले- अरे, विज्ञानी तो यहीं बैठा है! वे मुझे विज्ञानी नाम से बुलाते थे। बोले- कहो विज्ञानी, कुछ कर सकते हो? मैंने कहा- मैं तो फ्रीलांसर हूं। आप जो कहेंगे, करूंगा। उन्होंने पूछा- क्या कुछ लिख सकते हो गर्मी पर? मैंने कहा- बहुत कुछ।
बात लेख लिखने के बजाय कितना लिखने पर आ गयी। उन्होंने कहा- कितना कुछ? मैं तो ऐसी ही चुनौतियों का सामना करते पत्रकारिता करते बड़ा हुआ था। राष्टीय सहारा में आये दिन ऐसी चुनौतियों का मैंने सामना किया था। मैंने कहा- जितना आप छापना चाहें। उन्होंने कहा- कितना लिख सकते हो? मैंने कहा- 20 लेख लिख लाता हूं।
आलोक जी जानते थे कि मैं बड़े-बड़े लेख लिखने में महारत रखता हूं। 20 बड़े लेख का वो अंदाजा लगा सकते थे। मानव जी को वो अंदाजा नहीं था। उन्होंने यही सोचा कि मैं छोटे-छोटे 20 पीस लिख लाउंगाा उन्होंने कहा- कितने दिन में दे सकते हो? मैंने कहा- 20 लेख, 20 दिन में। अब आलोक जी ने हस्तक्षेप किया। बोले- नहीं, एक महीना में ले आओ।
एक महीने बाद मैं 20 लेखों के साथ आलोक जी से मिलने पहुंचा। साथ में लगभग 150 पन्नों का पुलंदा था। आलोक जी ने पूछा- ये क्या है? मैंने कहा- आपके 20 लेख। आलोक जी ने सिर पर हाथ मारा और बोले- राजीव, ये पहली बार है जब किसी फ्रीलांसर ने संपादक को संकट में डाल दिया कि वो इतने लेख कैसे छापे? आमतौर पर तो संपादक ही फ्रीलांसर को संकट में डालते हैं। खैर, उन्होंने मानव जी को बुलवाया। मानव जी जब कमरे में आये तो आलोक जी उनसे बोले- लीजिये, अब छाप कर दिखाइये।
मानव जी ने मेरा लाया पैकेट खोला। पैकेट में 21 लेख हैडिंग, इंटो और फोटो समेत रेडी-टू-प्रिंट रखे थे। वे असमंजस में थे। उन्होंने आलोक जी से पूछा- इतना सब कैसे छापेंगे? आलोक जी तो संपादक थे ही। यही उनका काम था। समस्याओं को निपटाना। उन्होंने 21 में से 8 लेख चुने और कहा कि हम इन 8 लेखों को छाप देंगे। चूंकि अभी गर्मी का समय चल रहा है इसलिए इन्हें अन्य अखबार भी हाथोंहाथ छाप देंगे। साथ ही उन्होंने आश्वासन दिया कि मेरी मेहनत का मेहनताना पूरा मिलेगा। खैर 31 मई 1998 को उन्होंने पांच लेख छापे। रविवारीय का पूरा फ्रंट और बैक मेरे नाम था।
कुछ दिन बाद आलोक जी के दफ्तर से फोन आया कि आलोक जी ने मिलने के लिए बुलाया है। आमतौर पर ऐसा होता नहीं था। आलोक जी का मुझ पर इतना स्नेह था कि उन्होंने कह रखा था कि मेरा जब मन हो, मैं उनसे मिलने जा सकता हूं। उनके पीए मेरे नाम की पर्ची उन तक पहुंचा देते थे और आम तौर पर वो मुझे जल्द ही बुला लिया करते थे। मुझे याद नहीं कि उन्होंने मुझे कभी लंबा इंतजार करवाया हो। खैर, जब मैं उनसे मिलने गया तो उनके हाथ में एक लिफाफा था। उन्होंने कहा- यह आपके लेखों का पारिश्रमिक है।
उन्होंने विशेष तौर पर मुझे इसलिए बुलाया था क्योंकि वह मुझे बताना चाहते थे कि हिन्दुस्तान के इतिहास में किसी फ्रीलांसर को एक दिन के लेख के लिए इतना बड़ा पारिश्रमिक कभी नहीं दिया गया था। इसीलिए वे यह चेक मुझे अपने हाथों से देना चाहते थे। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि एक ही फ्रीलांसर के एक साथ पांच लेख भी हिन्दुस्तान में पहली बार छापे गये हैं। आलोक जी ने शेष 3 लेखों को बाद में अलग-अलग दिनों पर प्रकाशित करवाया।
शेष कुछ लेखों को पत्रकृत के पुरोधा कमलेश्वर जी ने दैनिक भास्कर में समय-समय पर छापा। कमलेश्वर जी के साथ तो एकदम पारिवारिक संबंध से थे। कमलेश्वर जी के साथ जुड़ी यादों की दास्तां फिर कभी।