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मोदीजी की पंजाब यात्रा का संदेश / शिशिर सोनी

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 खरी खरी / शिशिर सोनी 

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लालकृष्ण आडवाणी जब अपने पूरे शबाब में थे। उनकी रथ यात्रा को सफल बनाने के लिये नरेंद्र मोदी का चुनाव किया गया। प्रबन्धन कौशल में मोदी की बाजीगरी का लोहा अडवाणी सहित भाजपा के सभी शीर्ष नेता मानते थे। तब मोदी ने देश की वीपी सिंह सरकार समेत सभी राज्य सरकारों को अडवाणी जी को गिरफ्तार करने की खुली चुनौती दी थी। मोदी का प्रबंधन धरा रह गया। अडवाणी जी की गिरफ्तारी तब बिहार के सीएम रहे लालू यादव ने समस्तीपुर में कराई। वो भी तब जब लालू यादव का प्लान लीक हो गया था। धनबाद में अडवाणी जी की गिरफ्तारी पर उनके प्रशासनिक अधिकारियों में मतभेद हो गया था। उसके बाद भी मोदी का प्रबंधन कौशल धरा रह गया। लालू ने गिरफ्तारी की। 


तो अब जब प्रबंधन कौशल के महारथी माने जाने वाले नरेंद्र मोदी खुद पीएम हों तो वो खुद कैसे चूके? क्या फिर वो गफलत में रहे? फिरोजपुर वो आखिर कैसे नहीं जा पाए? लोग सड़क पर जमा होने की तैयारी में हैं उसकी सूचना समय राज्य सरकार के खुफिया तंत्र को नहीं लगी तो केंद्रीय एजेंसियों को भी ऐसी सूचना क्यों नहीं मिली? कोरोना का समय एक जगह पर इतने लोग आखिर अचानक तो इकट्ठा हुए नहीं होंगे? 

जब पीएम मूव करते हैं तब Multi Layer Security System काम करता है। उसमें State Govt के अधिकारियों का उतना ही रोल होता है जितना केंद्रीय एजेंसियों का! कानून व्यवस्था चूंकि राज्य की जिम्मेदारी है इसलिए ज्यादा जिम्मेदारी उनकी बनती है। ये बात ठीक है। मगर केंद्रीय एजेंसियों की कोई जिम्मेदारी नहीं है, ऐसा भी नहीं है। अगर सब कुछ वैसा ही जैसा दिख रहा है तो जिम्मेदारी फिक्स होनी ही चाहिए। 


कल से मैं सोच रहा हूँ कि देश के किस पीएम ने इससे पहले दो घंटे का सड़क मार्ग किसी रैली को संबोधित करने के लिए लिया? मुझे याद नहीं आया। सड़क यातायात रोक कर दो घंटे पीएम की सड़क यात्रा तय करने की योजना ही मेरी राय में गलत थी। मौसम की खराबी से हेलिकॉप्टर उड़ने में बाधा आई तो High Tech BJP और उनके प्रबंधकों ने फोन से रैली संबोधित करा दिया होता। वीडियो पर कार्यक्रम हो सकता था। ऐसा होता भी आया है। ऐसा करने से न पीएम को न तो लंबी सड़क यात्रा करनी पड़ती और न ही इतनी लंबी रूट लगानी पड़ती! लगातार हो रही बारिश से रैली फीकी होती ये भी तयशुदा बात थी। लेकिन पीएम का कार्यक्रम हो जाता। बहरहाल, कितने लोग रैली में आये थे इस बहस में मैं नहीं जाता। 


कुछ भी हो ये अराजक स्थिति है। देश का पीएम कहीं मूव न कर सके। प्रदेश का सीएम कहीं मूव न कर सके! याद है न छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को लखनऊ एयरपोर्ट पर ही रोक लिया गया था! किसी आम आदमी ने नहीं केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने! वो भी अनुचित था। पीएम के काफिले को आम आदमी द्वारा रोकना भी अनुचित। लेकिन पीएम का ये कहना मैं जिंदा वापिस आ गया... ये तो और भी ज्यादा अनुचित और गैर जरूरी वक्तव्य लगा। 


आखिर ऐसी स्थिति बनी क्यों? जब भी संवैधानिक ओहदों पर बैठा व्यक्ति दलगत नीति से हर काम करेगा। दल से ऊपर नहीं उठेगा, ऐसी ही परिस्थिति पैदा होगी। क्या इससे पहले किसी पीएम को प्रधानमंत्री रहते हुए किसी दूसरे दल के नेताओं को खुलेआम भला बुरा कहते सुना था? क्या किसी पीएम के कहे का ये आभास देश को हुआ था कि जो मेरे साथ है, मेरे दल के साथ है, वो सब गंगा नहाये शुद्ध, बाकी सब चोर? देश का पीएम, प्रदेश का सीएम पूरे देश का होता है, समूचे प्रदेश का होता है। चाहे कोई किसी भी दल विशेष का नेता ही क्यों न हो पीएम उसका भी पीएम होता है। पीएम सब का पीएम होता है। सीएम सब का सीएम होता है। जब राजनीति Below the Belt होगी तो तय मानिये, ऐसी राजनीति करने वाले खुद उसकी चपेट में आने से नहीं बचेंगे। अराजकता फैलेगी। 


भाजपा के नेता पंजाब में हुई इस घटना की जितनी बार जिम्मेदारी पंजाब के सीएम चन्नी पर थोपेगे ये भी तय मानिये चुनाव में चन्नी को उतना फ़ायदा पहुंचायेंगे। वैसे ही जैसे अडवाणी जी की गिरफ्तारी के बाद लालू यादव को हुई थी। भाजपा से पंजाब के किसानो की नाराजी कतई दूर नहीं हुई है। उसमें भी आग में घी का काम कर रहा है राज्यपाल सत्यपाल मालिक का हालिया Viral Interview... सो ज्यादा उछलने के बजाए Political Corrections करने का वक़्त है। जितनी जल्दी इस पे काम होगा सब के लिए अच्छा होगा।


सबसे ज्यादा मुश्किल में हैं केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, जिन्हें पहली बार पंजाब जैसे चुनावी राज्य का प्रभारी बनाया गया। पहली बार उनकी देखरेख में पीएम की रैली आयोजित की गई। उस पे मौसम की मार पड़ी। पीएम लौटे। सब फेल। 


फ्रेश मंत्रियों में शेखावत का कोई सानी नहीं। संसद में सबसे ज्यादा तैयारी के साथ वे आते हैं। विषयों की गहरी जानकारी रखते हैं। पर सांगठनिक कसौटी और प्रबंधन कौशल में रणनीतिक तौर पर उन्हें अब राजस्थान के उनके ही साथी फिसड्डी बताने भीतरखाने जुट गए हैं। आपदा में वे सब अपने लिए अवसर की तलाश में जुट गए हैं।


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