खोजी पत्रकारिता और उसका भविष्य
Submitted by admin on Wed, 2013-10-16 21:22

मीडिया और अर्थव्यवस्था एक-दूसरे से बेहद संवेदनशील तरीके से गूंथा हुआ है। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि गलत और गैर जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग किसी भी अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचा सकती है। इसके लिए बहुत ज्यादा स्पष्टीकरण की जरूरत भी नहीं है। लेकिन कैसे एक खराब अर्थव्यवस्था मीडिया को बर्बाद कर सकता है, यह अधिक जटिल है।
किसी देश की खराब अर्थव्यवस्था का पहला शिकार खोजी पत्रकारिता ही हुआ है, क्योंकि इसके लिए अत्यधिक दबाव, लोग और संसाधन की जरूरत होती है। जाहिर है, खोजी पत्रकारिता को बेहतर बनाने के लिए नवीन तकनीक के साथ-साथ अधिक सावधानी की जरूरत भी होती है। यह सांत्वना नहीं, बल्कि तथ्य पर आधारित है कि अमेरिका (जैसा कि भारत में भी) में जारी खराब अर्थव्यवस्था पत्रकारिता को प्रभावित कर रही है। खासकर इसका सबसे ज्यादा असर खोजी पत्रकारिता पर ही हुआ है।
अमेरिका के सबसे प्रमुख खोजी पत्रकार, सेमॉर हर्ष कहते हैं कि अमेरिका में खोजी पत्रकारिता तीन कारणों से धीरे-धीरे खत्म होने लगी है - संसाधनों की कमी, विश्वास का संकट और इस काम को लेकर देश की गुमराह धारणा। मैं मानता हूं कि ये सभी कारण भारत में भी मौजूद हैं, जो निश्चित रूप सें यहां खोजी पत्रकारिता को प्रभावित कर रही है।
संसाधनों की कमी के कारण टीवी चैनल खोजी पत्रकारिता की बजाय किसी खास मुद्दे को लेकर ‘बहस’ पर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं। लेकिन यह ‘बहस’ के दोनों पक्षों द्वारा किए गए दावों की सच्चाई को जांचने से रोकता है। अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बहस में कौन सही और कौन गलत है, यह बात दर्शकों को बताई जानी चाहिए।
हर्ष एक और पहलू को उजागर करते हैं। वे दावे के साथ कहते हैं कि जिस अखबार या टीवी चैनलों के पास संसाधनों की कमी नहीं है, उनके संपादक भी इन दिनों मैनेजमेंट को खुश करने की कोशिश में लगे रहते हैं, क्योंकि वे ‘आउटसाइडर’ होने से डरते हैं। उनका दावा है कि यह न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे ऐतिहासिक अखबारों में भी हो रहा है।
समाधान के बारे में पूछे जाने पर हर्ष कहते हैं कि आज के अधिकतर संपादक डरपोक हैं, सबसे पहले उन्हें ही निकाल दिया जाना चाहिए। उन्होंने ‘गार्डियन’ के साथ एक इंटरव्यू के दौरान समाधान के बारे में चर्चा करते हुए कहा, ‘मैंने देखा है, जो डेस्क पर बैठे लोग होते हैं, अगर वे एक बार प्रमोट हो जाते हैं, तो वे सहज ही प्रकाशकों के अधीन हो जाते हैं। लेकिन वरिष्ठ संपादक क्या चाहते हैं कि जो मुसीबत पैदा करे ऐसे लोगों को प्रमोट नहीं किया जाना चाहिए। वे कहते हैं कि अच्छे लोगों को प्रमोट किया जाना चाहिए, जो आपकी आंखों में देख सके। इस बात की परवाह बिल्कुल भी नहीं करनी चाहिए कि दूसरे क्या कहते हैं। हर्ष ‘स्नोडेन फाइल्स’ (स्नोडेन पर अमेरिका और दूसरे देशों की गोपनीय सूचनाओं को सार्वजनिक करने का आरोप है) को लेकर वाशिंगटन पोस्ट की आलोचना करते हैं। वे कहते हैं कि वाशिंगटन पोस्ट को सीखना है कि गार्डियन ने कैसे स्नोडेन की स्टोरी प्रकाशित की। वैसे, हर्ष अमेरिकी मीडिया इंक के प्रभारी होते, तो वे समाचार पत्रों को इसे प्रकाशित करने से नहीं रोकते।
वे कहते हैं कि मैं (टीवी) नेटवर्क से सभी न्यूज ब्यूरो को बंद कर देता और उसे सभी जगह शुरू करता... बड़ी कंपनियों, एनबीसी, एबीसी। वे इसे पसंद नहीं करते- बस कुछ अलग करना, कुछ ऐसा करना है कि लोग आपको लेकर पागल हो जायें। क्या वह यही है, जो हम करना चाहते हैं?
उन्होंने कहा कि अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी के मुखबिर, एडवर्ड स्नोडेन ने सर्विलेंस के बारे में पूरी बहस का स्वरूप ही बदल ही दिया है। हर्ष कहते हैं कि हम और दूसरे पत्रकार सर्विलेंस के बारे में केवल लिखते हैं, लेकिन स्नोडेन इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने अपनी स्टोरी के दावे को पुष्ट करने से लिए दस्तावेजी सबूत पेश किया।
यहां खोजी रिपोर्टिंग को एक उदाहरण के जरिए समझा जा सकता है कि इसके लिए कितनी मेहनत की जरूरत होती है? यह वियतनाम युद्ध के दौरान हर्ष द्वारा किया गया था...
बात 1969 की है। उन्हें 26 वर्षीय एक पल्टन नेता विलियम कैली के बारे में गुप्त सूचना मिली। उस पर सेना द्वारा सामूहिक हत्या का आरोप लगाया गया था। वे अपने प्रेस अधिकारी को फोन पर बताने की बजाय अपनी कार में बैठ कैली की तलाश में आर्मी कैंप जॉर्जिया के लिए निकल पड़े। उन्होंने सुना था कि कैली को यहीं पर हिरासत में लिया गया।
इसके लिए उन्होंने एक विशाल परिसर में डोर-टू-डोर तलाशी की। रिसेप्शन के चक्कर काटे, अंत में मेज पर हाथ मारते हुए कहा, ‘सार्जेंट, मैं कैली को बाहर देखना चाहता हूं।’
आखिरकार उनके प्रयासों को सराहनी मिली और पहली स्टोरी सेंट लुई पोस्ट - ‘डिस्पैच’ में प्रकाशित हुई। बाद में, उन्हें इसके लिए पुलित्जर पुरस्कार भी मिला। इसके बाद, प्रसिद्ध वाटरगेट कांड को फॉलोअप करने के लिए न्यूयॉर्क टाइम्स ने उन्हें हायर किया। लगभग 30 वर्ष बाद, हर्ष वैश्विक सुर्खियों में फिर तव आए, जब उन्होंने अबू गारेब में इराकी कैदियों पर हो रहे शोषण को उजागर किया।
भारत में प्रिंट मीडिया वर्षों से खोजी पत्रकारिता के क्षेत्र में आगे रहा है, लेकिन अब टीवी मीडिया ने भी इस पर पकड़ बना लिया है। कुछ चैनलों को खोजी रिपोर्टों को सनसनी के तौर पर दिखाए जाने में भी कोई हिचक नहीं है। लेकिन हम जानते हैं कि दुनियाभर में ज्यादातर टीवी चैनल आर्थिक मंदी की वजह से वित्तीय संकट का सामना कर रहे हैं। इसी वजह से उनकी गुणवत्तापूर्ण रिपोर्टिंग प्रभावित हो रही है।
मैं मानता हूं कि देश में मीडिया की विश्वसनीयता को बचा कर रखा जाना चाहिए। संपादकों और प्रकाशकों को चाहिए कि वे सभी समाचार कवर की बजाय प्राथमिकता के आधार पर अभिनव तरीके से कवरेज के लिए आगे आयें। अंत में, 24/7 टीवी समाचार चैनलों के बीच चल रही गलाकाट प्रतियोगिता के अंत के लिए हो सकता है कि निकट भविष्य में कुछ चैनलों का विलय भी हो जाए।
(लेखक/न्यूज एनालिस्ट रवि एम. खन्ना फिलहाल फ्रिलांसर के रूप में कार्य कर रहे हैं। इससे पहले वे 24 वर्षों तक व्यॉस ऑफ अमेरिका, वाशिंगटन डीसी में साउथ एशिया ब्यूरो चीफ के पद पर थे।)