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अंडमान निकोबार और हिंदी

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अण्डमान-निकोबार में समृद्ध होती हिन्दी

प्रकाशन :मंगलवार, 1 जून 2010
कृष्ण कुमार यादव


प्रस्तुति - डॉ. ममता शरण 


भारत की भाषायी विविधता हमारी सांस्कृतिक विविधता का मूलाधार है और हिन्दी इस सांस्कृतिक सामासिकता की संवाहक है। यही कारण है कि भारत के हर अंचल में हिन्दी का बख़ूबी प्रयोग होता है। भारत के सुदूर दक्षिण में बंगाल की खाड़ी में अवस्थित अंडमान-निकोबार द्वीप समूह भी इससे अछूता नहीं है। यही वह जगह है जहाँ अँगरेज़ी हुक़ूमत ने काला पानी के नाम पर तमाम क्रांतिकारियों का निर्वासन किया। ये क्रांतिकारी देश के तमाम कोनों से आये थे और भिन्न-भिन्न भाषायें बोलते थे। आपस में संपर्क और आज़ादी के ज़ज़्बातों को धार देने के लिए उन्हें एक ऐसी भाषा की ज़रूरत महसूस हुई, जिसे सभी लोग समझ बोल सकते थे और इस प्रकार एक संपर्क भाषा के रुप में यहाँ हिन्दी का तेज़ी से विकास हुआ।

अँगरेज़ी हुक़ूमत के विरूद्ध लिखने के कारण तमाम लेखकों-संपादकों-कवियों-शायरों को अंडमान में निर्वासित किया गया। इन लोगों ने यहाँ हिन्दी के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सेल्युलर जेल की दीवारों पर तमाम क्रांतिकारियों ने हिन्दी में अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया। वीर सावरकर ने सेल्युलर जेल में कारावास के दौरान न सिर्फ़ अन्य क्रांतिकारी कैदियों को पढ़ाना आरम्भ किया बल्कि एक हिन्दी वाचनालय भी शुरू किया। जेल की दीवारों पर ही वीर सावरकर ने 11,... पँक्तियों की अप्रतिम रचना ‘कमला काव्य‘ की रचना की। लेखनी के अभाव में उन्हें जेल की कोठरी की दीवारों पर कीलों और काँटों से उत्कीर्णित कर कंठस्थ करने की चेष्टा की। मशहूर ‘स्वराज्य‘ पत्र के संपादक होतीलाल वर्मा, स्वराज्य के ही संपादक लद्दाराम, युगांतर के संपादक रामचरण लाल सहित तमाम लोगों ने यहाँ क्रांतिकारी साहित्य को प्रोत्साहित किया। उर्दू शायर मिर्जा गालिब के परम मित्र अल्मा फ़ज़लूल हक्क (खैराबादी) व मौलाना लियाक़त अली भी यहाँ कैद रहे। कामागाटामारू कांड से जुड़े पं. परमानन्द, डी.ए.वी. कानपुर के छात्र एवं भगत सिंह व आजाद के सहयोगी महावीर सिंह, अरविंद घोष के भाई वारीन्द्र कुमार घोष, बटुकेश्वर दत्त, अनुशीलन से जुड़े शचीन्द्रनाथ सान्याल सहित तमाम ऐसे लोग यहाँ कैद थे, जिन्होंने निर्वासन के बावजूद यहाँ क्रांतिकारी साहित्य को प्रोत्साहित किया। स्वराज्य के संपादक होतीलाल वर्मा ने अपनी बुद्धिमत्ता से सेल्युलर जेल की भयंकर यातनाओं पर एक पत्र जेल से बाहर भेजा, जिसे सुरेंद्रनाथ बनर्जी तक पहुँचाया गया और उन्होंने उसे प्रकाशित कर अँगरेज़ी हुक़ूमत को बाध्य किया कि सेल्युलर जेल का अवलोकन कर जेल अधिकारियों के अत्याचार को रोका जाय। अंडमान-निकोबार में जापानी-आधिपत्य के दौरान स्थानीय ‘सत्संग-मण्डली’ के मंच मास्टर केसरदास ने देशभक्ति गीतों की रचना करके हिन्दी को समृद्ध करने का प्रयास किया।

आज़ादी के बाद भी अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में हिन्दी का बोलबाला बना रहा। द्वीप समूह ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके बिना आज़ादी का इतिहास अधूरा है। इतिहास का यह ‘काला पानी’ आज ‘मुक्ति तीर्थ’ के रूप में जाना जाता है। देश के तमाम साहित्यकारों ने काला पानी की यातनाओं को केंद्रबिंदु में रखकर कविताएँ लिखीं। ये काव्य रचनाएँ द्वीप समूह के हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। बानगी के रूप में कुछ पँक्तियाँ गौरतलब हैं-

जो वर्षों तक लड़े जेल में/उनकी याद करें
जो फाँसी पर चढे खेल में/उनकी याद करें
याद करें काला पानी को/अँगरेज़ों की मनमानी को
कोल्हू में जुट तेल पेरते/सावरकर की बलिदानी को। 
(उनको याद करें: अटल बिहारी वाजपेयी)
.......
दिन भर कोल्हू को खींच-खींच/मेरे कंधे कट जाते हैं
रजनी में इन हत्यारों के/अभिशाप बहुत बढ़ जाते हैं
दीवारों पर नाखूनों से/लिख रहा मुक्ति के गीत बंधु
मुर्गे ने दो दी बाँग कहीं/सो सका न सारी रात बंधु। 
(विजगीषु: जगदीश नारायण राय)
......
सड़ा आटा, सूखी जली रोटियाँ/सड़ी रेतीली साग-सब्जियाँ
दाल में कीड़े, पानी न मिलता/ऐसी थी जेलों की प्राण लेवा दुर्गति।
(गौरव गान: जंगबहादुर सिंह ‘भ्रमर‘)
........
जिसकी कोठरी नं. 113/वीर सावरकर के
वर्षों एकांतवास की/कहानी कहती है। 
(किसको नमन करुँ: डॉ. गोविंद सिंह पवार)

वक़्त बीतने के साथ-साथ, जैसे-जैसे बाहरी लोगों का पदार्पण अंडमान-निकोबार में हुआ, काला पानी का दाग छूटता गया। यहाँ का सुन्दर प्राकृतिक परिवेश, लहराता समुद्र, चारों तरफ़ बिखरी हरियाली, चहचहाती चिड़िया से लेकर यहाँ के आदिवासी व आज का अंडमान-निकोबार प्रस्फुटित होने लगा। ऐसे में यहाँ के साहित्यकारों-रचनाधर्मियों ने इन द्वीपों के गौरवपूर्ण इतिहास, अनूठी संस्कृति से लेकर इसके अप्रतिम सौंदर्य और सौहार्दपूर्ण वातावरण को सुन्दर शब्दों में गूँथकर अभिव्यक्त किया है। द्वीपों की सामासिकता व सद्भाव किसी के लिए भी आकर्षण का केद्रबिंदु हो सकती है- 

गीता, गुरुग्रंथ, बाइबिल, कुरान/सब ग्रंथों का यहाँ सार होगा
कलियुग में चलकर नाम इसी का/अण्डमान-निकोबार होगा।
(द्वीपों की उत्पत्ति: राम प्रसाद ‘निर्दोष’)
अंडमान का सौंदर्य कवियों को अपनी ओर अनायास ही खींचता है-
प्रिये/तुम द्वीप-समूह हो/सौंदर्य की अपूर्व प्रतिमा
नीले वस्त्रों में लिपटी/लहरों-सी अकुलाती तुम
माउंट हैरियट के विशाल माथे पर/नार्थ बे की हरियाली की टिकुली।
(द्वीप-एक रेखचित्र: राजेश कुमार ‘निराश’)
अंडमान की स्थानीयता तुलनात्मक रुप में भी उभर कर सामने आती है-
अंडमान में रखे डाब को छोड़कर/कश्मीर के बादाम की न सोचिये
वो डल-झील में नौका विहार करते हैं/तो आप समुद्र में कीजिए।
(हमारा प्यारा अंडमान: सुमन सिंह)

आज अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह जहाँ पर्यटकों के आकर्षण का केद्र-बिन्दु है, वहीं तमाम मानव-वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और साहित्यकारों को भी गवेषणा, अनुसंधान और साहित्य सृजन के लिए अपनी ओर खींचता है। स्वतंत्रता सेनानियों के पदरज से पावन इस पुण्यभूमि की शहीदी गाथाओं, त्यागों और बलिदानियों की कहानियाँ सुनने के लिए भी लोग निरंतर आ रहे है। वे यहाँ का भौगोलिक परिवेश, सागर-तटों, झरना-पहाड़ों का सौदर्य, लता-गुल्मों, वृक्षों की हरीतिमा, कालेपानी की यातना, आदिमानवों की सांस्कृतिक विरासत आदि को अपनी आँखों में बसाकर ले जाना नहीं भूलते। उनमें से कुछ अपने अनुभवों को बाँटने और उन्हें स्थायी बनाने के उद्देश्य से पुस्तकों की रचना तक कर डालते हैं। स्वतंत्रता सेनानियों की यातनाओं से द्रवीभूत हिमांशु जोशी ‘यातना शिविर] लिखने से नहीं चूकते तो चर्चित साहित्यकार लीलाधर मंडलोई ने ‘काला पानी’ नामक पुस्तक रच डाली। ‘काला पानी’ से ही उनकी पहचान पहले एक कवि और फिर फ़ीचर लेखक के रूप में हुई। अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह की दुर्लभतम् नेग्रिटो और मंगोल मूल की जनजातियों तथा समुद्र और वन्य जीवन पर फ़ीचर श्रृंखला और कविताएँ देने वाले वे पहले ऐसे लेखक हैं जिन्हें ‘जनसत्ता’ और ‘नवभारत टाइम्स’ सरीखे अख़बारों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया। ग्रेट अंडमानी, ओंगी, निकोबारी तथा शोम्पेन जनजातियों को लोक-कथाओं को भी हिन्दी में लाने वाले वे पहले रचनाकार हैं। डॉ. ब्रह्मस्वरूप शर्मा की पुस्तक ‘आँखों देखा अण्डमान’ यहाँ की जीवन-शैली, रीति-नीति, आचार-विचार, मान्यता-सिद्धांत, सुन्दरता-कुरूपता, स्नेह-सौहार्द्र को बड़ी सहजता और स्वाभाविकता के साथ प्रस्तुत करती है। वस्तुतः जिन व्यक्तियों ने अपने जीवन का महत्वपूर्ण भाग यहाँ बिताया हो, पेड़-पौधों से बातें की हो, नदी-झरनों का संगीत सुना हो, सेल्युलर जेल की भयावहता को रोज़ निहारा हो, आदिमानवों के जीवन को क़रीब से देखा हो, ऐसे में अगर वह इन पर पुस्तक लिखे तो निश्चित रूप से अन्य की अपेक्षा उसके अनुभवों में अधिक गहराई और प्रामाणिकता होगी।

अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह में एक लघु भारत बसता है। यहाँ हर जाति, धर्म, भाषा व प्रान्त के लोग मिलेंगे। दक्षिणी राज्यों में भले ही हिन्दी का विरोध होता हो, पर यहाँ तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, केरल के लोग जन-व्यवहार में हिन्दी ही बोलते नज़र आएँगे। जब भी हिन्दी की बात होती है तो उत्तर-दक्षिण की बात आरंभ हो जाती है। ऐसा माना जाता है कि दक्षिण भारत में हिन्दी का विरोध होता है। पर उस अंडमान-निकोबार की बात कोई नहीं करता, जहाँ हिन्दी सर्वव्यापी है। यहाँ यह बताना ज़रूरी है कि अंडमान-निकोबार द्वीप समूह भारत का सबसे दक्षिणी क्षोर पर स्थित संघ शासित प्रदेश है। यहाँ स्थित इंदिरा प्वाइंट को भारत का सबसे दक्षिणतम क्षोर माना जाता है। जहाँ तमाम प्रमुख संस्थाओं में अँगरेज़ी में भाषणबाज़ी/वक्तव्य देना आम बात है, वहीं यहाँ पर आधिकाधिक हिन्दी भाषा का ही प्रयोग किया जाता है। हिन्दी यहाँ की सर्वप्रमुख भाषा है, यहाँ तक कि निकोबारी और ग्रेट अण्डमानी आदिवासी और कुछ हद तक जारवा आदिवासी भी भलीभांति हिन्दी समझ-बोल लेते हैं। इसके अलावा यहाँ निकोबारी, तमिल, बंगला, मलयालम और तेलुगु भी बोली जाती है। निश्चित रूप से एकता की भावना की यह धरोहर अनुपम और अनमोल है।

अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह में हिन्दी सिर्फ़ भाषा/बोली के रूप में नहीं बल्कि साहित्य के रूप में भी दिनो-ब-दिन समृद्ध हो रही है। यहाँ कविता, कहानी, नाटक, गीत, संस्मरण, लेख व निबंध, लघुकथाएँ, व्यंग्य, उपन्यास, बाल साहित्य, संस्मरण जैसी साहित्य की सभी विधाएँ यहाँ प्रस्फुटित हो रही हैं। एक तरफ़ इन रचनाओं में स्थानीय सामाजिक परिवेश परिलक्षित होता है तो नई पीढ़ी के रचनाकार अपनी रचनाओं से समाज में चेतना की अलख जगा रहे हैं। अण्डमान में हिन्दी साहित्य की एक दीर्घजीवी परंपरा है, जो काला पानी के दिनों से आरंभ होकर नित्य प्रवाहमान है। अण्डमान की धरती को सौभाग्य प्राप्त है कि काला पानी के ही बहाने तमाम प्रखर पत्रकारों, संपादकों, लेखकों, कवियों ने इस धरा पर साँस ली और कुछ-न-कुछ रचा। कहते हैं वार्तायें-चर्चायें, गीत-संगीत, नाटक और कवितायें-कहानियाँ मुखरित होती हैं और अनंत में विलीन हो जाती हैं, किंतु छपी हुई पठनीय सामग्री विचारों तथा भावनाओं को कालातीत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अण्डमान-निकोबार की आदि-संस्कृति को सभ्य समाज के समक्ष लाने के लिए तमाम प्रयास किए जा रहे हैं। डॉ. राम कृपाल तिवारी ने अण्डमान-निकोबार की जनजातीय बोलियों का भाषिक अध्ययन पुस्तक द्वारा इनसे न सिर्फ़ हिन्दी पाठकों को जोड़ा बल्कि इससे जनजातीय संस्कृति और सरोकारों की पहुँच भी दूरगामी हुई। डॉ. तिवारी ने शोम्पेन हिन्दी शब्दावली का भी निर्माण किया है। डॉ. व्यासमणि त्रिपाठी की अण्डमान तथा निकोबार के आदिवासी और उनकी बोलियाँ एवं अण्डमान-निकोबार की लोक कथाएँ भी इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण पुस्तक हैं। यहाँ के तमाम साहित्यकार देश की मुख्य धारा की पत्र-पत्रिकाओं में प्रतिष्ठापरक रूप में निरंतर प्रकाशित हो रहे हैं। श्री पुष्पोत्तम लाल वशिष्ठ एवं डा. जयदेव सिंह ने स्थानीय बोली के भाषा वैज्ञानिक पहलू से संबंधित तमाम शोध-लेख रचे हैं। वर्तमान में हिन्दी साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षरों में यहाँ डॉ. राम कृपाल तिवारी, गोविंद राजू, डॉ. व्यासमणि त्रिपाठी, कृष्ण कुमार यादव, गोविद सिंह पवार जय बहादुर शर्मा, जगदीश नारायण राय, डॉ. संत प्रसाद राय, मदन मोहन सिंह, राम प्रसाद निर्दोष, विजय कुमार शर्मा, स्वपन कुमार नाग, अनिरूद्ध त्रिपाठी, अशोक कुमार श्रीवास्तव, वासु कुमार, हरिश्चंद्र राय, आर.एन. रथ इत्यादि के नाम लिए जा सकते हैं तो महिला रचनाकारों में डी.एम. सावित्री, रशीदा इकबाल, डॉ. रोशन आरा दिलबर सुमन सिंह, आकांक्षा यादव इत्यादि नाम प्रमुख हैं।

अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह में तमाम संस्थाएँ भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार एवं उत्तरोत्तर वृद्धि में संलग्न हैं। इन संस्थाओं के तत्वाधान में यहाँ कवि सम्मेलन, मुशायरा, साहित्यकार-अभिनन्दन, गोष्ठियाँ इत्यादि कार्यक्रम चलते रहते हैं, जिससे हिन्दी को एक भाषा एवं साहित्य दोनों रूपों में ऊर्जा प्राप्त होती है। इन संस्थाओं में हिन्दी साहित्य कला परिषद, राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी, चेतना सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था, नव-परिमल इत्यादि के नाम लिए जा सकते हैं। हिन्दी साहित्य कला परिषद, पोर्टब्लेयर को तमाम स्तरीय हिन्दी पुस्तकों के प्रकाशन का भी श्रेय जाता है। परिषद ने अण्डमान की हिन्दी कविता, अण्डमान की हिन्दी कहानियाँ, अण्डमान के हिन्दी कहानीकार इत्यादि पुस्तकों के माध्यम से यहाँ के साहित्यकारों की रचनाओं के सुन्दर संकलन प्रकाशित किए हैं। कुछ अन्य प्रमुख पुस्तकें हैं- रामचंद्रिका में नाट्यतत्व, महादेवी वर्मा - व्यक्तित्व और कृतित्व, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी - व्यक्तित्व और कृतित्व, सृजन और समीक्षा, द्वीपायन, माटी की महक इत्यादि। अण्डमान-निकोबार का युवा कार्य खेल एवं संस्कृति निदेशालय भी विभिन्न साहित्यक-सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देता है। इनमें गालिब के जन्म द्विशताब्दी अवसर पर उर्दू शायरों की रचनाओं का संकलन एवं वर्ष 2001 में अण्डमान-निकोबार के कवि-कवयित्रियों की रचनाओं का संकलन दीपांजलि (सं.: मदन मोहन सिंह) का प्रकाशन प्रमुख है।

हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता एक सिक्के के दो पहलू हैं। अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह के राजभाषा विभाग की ओर से ष्दीप प्रभाअँगरेज़ी त्रैमासिक का प्रकाशन आरंभ किया गया था, परंतु बाद में इसका प्रकाशन बंद हो गया। फिलहाल अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह से एकमात्र हिन्दी साहित्यक पत्रिका द्वीप-लहरी;संपादक-डॉ. व्यासमणि त्रिपाठीद्ध का अर्द्धवार्षिक प्रकाशन होता है, जो हिन्दी साहित्य कला परिषद, पोर्टब्लेयर द्वारा प्रकाशित की जाती है। यह पत्रिका मुख्यभूमि एवं द्वीपसमूह के बीच साहित्य-सेतु की भूमिका बख़ूबी निभा रही है। इसके अलावा विभिन्न भाषाओं में यहाँ से लगभग 35 अख़बार निकलते हैं, जिनमें अधिकतर टेबलायड आकार में साप्ताहिक या पाक्षिक हैं। पोर्टब्लेयर से प्रकाशित प्रमुख हिन्दी समाचार पत्र हैं- द्वीप समाचार, द्वीप मंथन, अण्डमान एक्सप्रेस, संपूर्ण आवाज, सागर, साहिल की ओर। इनमें सरकारी प्रेस द्वारा प्रकाशित ष्द्वीप समाचारअँगरेज़ी प्रमुख है। गौरतलब है कि अण्डमान-निकोबार में सरकारी प्रेस द्वारा प्रकाशित अँगरेज़ी दैनिक द डेली टेलीग्राम्स और हिन्दी दैनिक द्वीप समाचार समाचारों व सूचनाओं के प्रमुख श्रोत हैं। राजधानी पोर्टब्लेयर से प्रकाशित हिन्दी अख़बारों के अलावा जनसत्ता का कोलकात्ता संस्करण, दैनिक जागरण का दिल्ली संस्करण, नवभारत टाइम्स्, दैनिक विश्वमित्र इत्यादि हिन्दी अख़बार भी यहाँ उपलब्ध हो जाते है। हिन्दी पत्रिकाओं में बाज़ार में यहाँ इण्डिया टुडे, आउटलुक, कादम्बिनी, सरिता, वनिता, गृहलक्ष्मी, गृहशोभा इत्यादि और चंपक, बाल भारती जैसी कुछेक बाल पत्रिकाएँ उपलब्ध हैं। मुख्य-भूमि से आने के कारण प्रायरू सभी पत्र-पत्रिकाएँ यहाँ दुगुने-तिगुने मूल्यों पर उपलब्ध होती हैं। ऐसे में तमाम पत्र-पत्रिकाओं से यहाँ के लोगों को वंचित रह जाना पड़ता है। फिर भी हिन्दी साहित्य में अभिरूचि रखने वाले लोग तमाम पत्र-पत्रिकाओं से डाक-माध्यम द्वारा जुड़ ही जाते हैं। पोर्टब्लेयर में स्थित स्टेट लाइब्रेरी में भी हिन्दी एक अन्य भाषाओं की पुस्तकें एवं पत्र-पत्रिकायें पढ़ने को मिलती हैं।

हिन्दी रंगमंच ने भी अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह में हिन्दी को पल्लवित-पुष्पित किया है। द्वीप समूह में हिन्दी रंगमंच संबंधी गतिविधियाँ साल भर चलती रहती हैं। अण्डमान पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन अँगरेज़ी; आप्टा के संस्थापक निदेशक नरेश चद्र लाल अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली के एक मात्र स्नातक हैं एवं वर्तमान में संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली के भी यहाँ से एक मात्र सदस्य हैं। नरेश चद्र लाल ने चर्चित हिन्दी फ़िल्म- चमत्कार, आशिक अवारा एवं कालापानी में सहायक निदेशक, तो बोनी कपूर की प्रेम अँगरेज़ी फ़िल्म में प्रोडक्शन मैनेज़र के रूप में कार्य किया है। आप्टा के अलावा आशा गुप्ता के संचालन में अँगरेज़ी आयाम अँगरेज़ी संस्था भी हिन्दी रंगमंच को बख़ूबी बढ़ावा दे रही है। रंगमंच से जुड़े नामों में गीतांजलि आचार्या, कुलदीप कौर, राजेश कुमार निराश, वासु कुमार, कृष्ण कुमार विश्वेन्द्र, अनिरूद्ध कुमार पांडेय इत्यादि प्रमुख हैं। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन ने भी यहाँ हिन्दी को समृद्ध किया है। आकाशवाणी पर अक्सर साहित्यक गतिविधियों से लेकर तमाम विषयों पर चर्चा-परिचर्चा होती रहती हैं। लगभग सभी हिन्दी चैनल्स यहाँ देखे जा सकते हैं। फ़िल्म-थिएटर न होने के कारण हिन्दी फ़िल्में मात्र टी.वी. चैनल्स पर उपलब्ध हो पाती हैं। भारतीय साहित्य अकादमी के तत्वाधान में साहित्यक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रायरू हर वर्ष यहाँ कार्यक्रम होते हैं। तमाम दिग्गज हिन्दी साहित्यकार अण्डमान-निकोबार का भ्रमण कर हिन्दी साहित्य के प्रति अभिरूचि पैदा करने में सहायक सिद्ध हुए हैं। हिन्दी के प्रचार प्रसार में सिर्फ़ साहित्य ही नहीं बल्कि रामलीला, नौटंकी, मानस पाठ, भजन कीर्तन का भी महत्वपूर्ण स्थान हैं। ये विधायें एक तरफ़ लोक को संरक्षित रखती हैं वहीं इनके माध्यम से लोगों का अपनी ज़मीन से जुड़ाव बना रहता है। उत्तर भारत से आकर अण्डमान में रह रहे तमाम लोग इन विधाओं को रस लेकर देखते-सुनते हैं। निश्चितः अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह में हिन्दी के विकास को लेकर अभी भी अनंत संभावनाएँ हैं।


  कृष्ण कुमार यादव
कृष्ण कुमार यादव,
निदेशक डाक सेवा,
अंडमान व निकोबार द्वीप समूह, पोर्टब्लेयर-7441.1
kkyadav.y@rediffmail.com
 
     
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