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*पत्रकारिता के शिक्षक के रूप में पारी की शुरुआत*
भाषण कला, स्वतंत्र पत्रकारिता, पत्रिका संपादन,
लेखक के रूप में सम्मान,
शोधकर्ता, दैनिक समाचारपत्र का सम्पादन, विज्ञापन कंपनी में अनुभव, आकाशवाणी और दूरदर्शन के प्रसारणों के अनुभव के बाद ईश्वर ने मेरे लिए पत्रकारिता तथा जन संचार में शिक्षक की भूमिका तय कर रखी थी। 26 जून 1979 को दैनिक 'हिन्दुस्तान'में ही भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली का विज्ञापन छपा। 'संस्थान को
हिन्दी पत्रकारिता के लिए रीडर की जरूरत है।'
अनिवार्य योग्यता स्नातकोत्तर उपाधि के साथ हिन्दी पत्रकारिता का दस वर्षों का अनुभव। वांछनीय योग्यता प्रकाशित कार्य। मेरे पास पी. एच. डी. की उपाधि और स्वतंत्र (फ्रीलांस) पत्रकार, पत्रिका सम्पादक, दैनिक समाचारपत्र के सम्पादन का बारह वर्षों का अनुभव मिलाकर हिन्दी पत्रकार के रूप में लगभग 22 वर्षों का अनुभव हो गया था। इसलिए मैंने ग्यारह सौ रूपये से सोलह सौ रू. के वेतनक्रम में चार वेतन वृद्धियां मांगते हुए 19 जुलाई 1979 को
अपना विवरण भेज दिया।
07 नवम्बर 1979 को तत्कालीन निदेशक स्वर्गीय
श्री एच. वाई. शारदा प्रसाद जी ने मुझे मिलने के लिए बुला लिया। इस संस्थान का निदेशक बनने के पहले वह प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के सूचना सलाहकार थे। वह विश्व भर में पत्रकारिता और जन
संचार के प्रभावशाली विशेषज्ञ के रूप में नाम कमा चुके थे। वह बहुत ही नम्र, अंग्रेजी भाषा पर गहरी पकड़ रखने वाले और अद्भुत वक्ता थे। हर कक्षा में तैयारी के साथ जाते थे। सदा खादी का बुशशर्ट और पैंट पहनते थे। सादा जीवन उच्च विचार के जीते जागते उदाहरण थे। प्रोफेसर से ले कर जमादार तक को सम्मान देना उनकी आदत थी। उन्होंने एक सरकारी कार्यालय की लालफीता शाही खत्म करके संस्थान को संयुक्त राष्ट्र संघ से 'एशिया में पत्रकारिता और जन संचार की शिक्षा का उत्कृष्ट केंद्र'घोषित करा दिया। संस्थान ने 19 नवम्बर 1979 को मुझे नियुक्ति पत्र भेज दिया। मुझे 12 दिसम्बर 1979 तक पद ग्रहण करने की राय दी गई। अब मुझे हिन्दुस्तान टाइम्स लिमिटेड से 23 दिनों में पद मुक्त होना था।
अगली किस्त में इसकी जद्दोजहद दूंगा।