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पत्रकारिता का पतन है या पत्रकारों का ?

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2012.12.17
गैर सनसनीखेज आयोजनों का मीडिया नहीं करता कवरेज
शिवानी जोशी /मुंबई में ऐसे तो आए दिन एक से एक आयोजन होते हैं जिनके प्रचार प्रसार पर लाखों ही नहीं करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। पीआर और मार्केटिंग एजेंसियाँ इन आयोजनों का ठेका लेकर अमिताभ बच्चन से लेकर कैटरीना कैफ और राखी सावंत को लाकर इन आयोजनों को सुर्खियों में ला देती है। मीडिया की दुनिया से जुड़े लोग भी गुलामों की तरह इन आयोजनों में जाकर बाल की खाल की तरह पूरे आयोजन की फूहड़ता, बेशर्मी और नाटकीयता का पूरा बखान इस अंदाज़ में करते हैं कि टीवी पर खबरें देखकर और अखबारों में खबरें पढ़कर घिन आने लगती है। खबर बलात्कार की हो, या फिल्मी दुनिया से जुड़े किसी दो कौड़ी के हीरो- हीरोईन की, पत्रकारों की पूरी जमात आयोजन में ऐसे मौजूद होती है जैसे अपने रिश्तेदार की शादी में किसी रस्म को निभाने आए हैं।
इसी मुंबई में हर दिन ऐसे कई आयोजन होते हैं जिनमें देश की श्रेष्ठतम प्रतिभाएँ और विश्वपटल पर सम्मानित हो चुके लोग आते हैं अपनी बात कहते हैं और चले जाते हैं लेकिन मजाल है कि मुंबई के मीडिया वाले बार बार हर तरह से निवेदन करने पर भी इन आयोजनों में जाने की हिमाकत करे। जब बेचारे आयोजक, जो न तो मीडिया के इस बाजारु चेहरे से परिचित हैं न अपने आयोजन को सनसनीखेज बनाने के लिए किसी फूहड़ फिल्मी तारिका या अमिताभ बच्चन को बुला पाने में समर्थ हैं, मीडिया वालों से इस आयोजन के कवरेज के लिए आमंत्रण भेजते हैं तो उनका ये निवेदन रद्दी की टोकरी में चला जाता है।
टीवी पर आए दिन दो दो कौड़ी की खबरों पर घंटों बहस होती है और शु्द भारतीय मुहावरे की तर्ज पर कहें तो 'कुत्ता फजीती' को पूरी बेशर्मी से घंटों दिखाया जाता है, राजनेताओं, विश्लेषकों के वही घिनौने चेहरे जो कल कुछ कहते थे, आज कुछ कहते हैं, और कल फिर कुछ कहेंगे देश की हर समस्या पर चलती रेलगाड़ी में, मेले ठेले में साबुन, अगरबत्ती और खिलौने बेचने वाले की तर्ज पर अपने अपने तर्क ऐसे पेश करते हैं मानो देश की हर समस्या का हल इनके पास ही रखा है बस अफ़सोस यही है कि इन बेचारों को टीवी पर बोलने के अलावा और कुछ नहीं आता है। हमारा मानना है कि रेलों में और मेले ठेलों में सामान बेचने वाले इन तताकथित टीवी विश्लेषकों से कहीं ज्यादा ईमानदार हैं।
इस देश में ऐसे कई लोग हैं जिनके भाषण और विचार पूरी पीढ़ी को आंदोलित करते हैं, कई पीढ़ियों के लिए मिसाल बनते हैं और जिनकी बात सुनने को लोग अपनी तमाम व्यस्तताएँ ताक पर रखकर जाते हैं। लेकिन इतने सालों में देश के किसी टीवी चैनल पर ऐसे गंभीर चिंतकों, विचारकों और राजनेताओं को कभी मौका नहीं दिया गया।
सबसे ज्वलंत उदाहरण है-देश के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम, एक ऐसी शख्सियत जिनका एक एक शब्द बच्चों से लेकर युवाओं और बुज़ुर्गों तक को आंदोलित करता है, वे देश के किसी खबरिया चैनल पर कभी खबर नहीं बनते जबकि राष्ट्रपति पद से निवृत्त होने के बाद से ही डॉ. कलाम लगातार देश और दुनिया में घूम घूम कर पूरी पीढ़ी को आंदोलित कर रहे हैं। किसी भी आयोजन में जाने के पहले वे इससे जुड़े आयोजकों से लेकर कार्यक्रम की गंभीरता आदि पर पूरी खोजबीन कार्यक्रम में दिए जाने वाले अपने वक्तव्य को लेकर भी विस्तृत शोध और अध्ययन करते हैं। लेकिन इस देश के टीवी चैनलों पर उनके साथ अछूतों जैसा व्यवहार होता है, क्योंकि वे किसी राखी सावंत या कैटरीना कैफ की तरह या किसी सलमान खान या शाहरुख खान या अमिताभ बच्चन की तरह सनसनीखेज बयान नहीं देते।
मुंबई में रविवार 9 दिसंबर को एक ऐसा ही आयोजन बांद्रा के नेशनल कॉलेज में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम पूरे डेढ़ घंटे रहे। वे यहाँ पं. मदन मोहन मालवीय की 150वीं जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने आए थे। इस कार्यक्रम का आयोजन पं. महामना मालवीय मिशन द्वारा आयोजित किया गया था। इस आयोजन में पं. मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों (एलुमनी) द्वारा किया गया था। आयोजन की सफलता के लिए कॉर्पोरेट जगत के श्री दिनेश गुप्ता, मुंबई के हीरा बाजार के भीष्म पितामह कहे जाने वाले और वर्ष 1942 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के स्नातक पं. आनंद शंकर पंड्या, देश के जाने माने उद्योगपति व पवन उर्जा से देश में सबसे ज्यादा बिजली पैदा करने वाले श्री नरेंद्र कुमार बलडोटा, क्रॉंप्टन ग्रीव्ज़ के पूर्व एमडी श्री के के नूरिया, श्री एके रस्तोगी, श्री क्रांति कुमार, श्री पन्ना लाल जायसवाल, श्री आरपी रस्तोगी, श्री शरद चंद्र मिश्रा, श्री राकेश मेहता (वैश्य फेडरेशन के अखिल भारतीय अध्यक्ष), श्री दिनेश पंजवानी (प्राचार्य आरडी नेशनल कॉलेज), श्री एन के राय (डीआरडीओ के पूर्व सीईओ), श्री डीसी गुप्ता पूरे प्रण-प्राण से लगे थे।
ये इन सभी लोगों की मेहनत और संकल्प का ही प्रतिफल था कि नेशनल कॉलेज का पूरा सभागृह और उसकी बॉलकनी ठसाठस भरी थी और जहाँ भी खाली जगह थी वहाँ लोगों ने पूरे समय खड़े होकर कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। समारोह में पूर्व राष्ट्र पति. डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम, मालवीयजी के पौत्र व इलाहबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायमूर्ति पं. गिरिधर मालवीय, पूर्व केंद्रीय मंत्री व स्व. श्रीमती इन्दिरा गाँधी के निकटमत सहयोगी रहे व देश के पाँच राज्यों के राज्यपाल रहे श्री भीष्मनारायण सिंह जैसे मनीषियों ने संबोधित किया।
मुंबई में दूर-दूर से लोग मालवीयजी के प्रति अगाध श्रध्दा के चलते रविवार होने के बावजूद बड़ी संख्या में समारोह में आए और पूरे तीन घंटे तक कार्यक्रम में मौजूद रहे। स्थिति ये हो गई थी कि सभागृह से लेकर बॉलकनी तक ठसाठस भर जाने के बाद सैकड़ों लोगों को समारोह में प्रवेश नहीं दिया जा सका। इस आयोजन की शर्मनाक उपेक्षा यदि किसी ने की थी तो वो था मुंबई की मीडिया की दुनिया और हिन्दी के नाम पर कई संस्थाएँ चलाने वाले, हिन्दी अखबारों और हिन्दी पत्रिकाओं के संपादक, जिन्हें व्यक्तिगत रूप से निमंत्रण भेजे गए, मेल भेजे गए एसएमएस भेजे गए मगर हिन्दी के सम्मान के लिए आजीवन लड़ने वाले पं. मदन मोहन मालवीय के आयोजन में नहीं आए। ये वे लोग हैं जो मुंबई में हिन्दी के नाम से ही अपनी दाल-रोटी चला रहे हैं।

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