Quantcast
Channel: पत्रकारिता / जनसंचार
Viewing all articles
Browse latest Browse all 3437

हंगेरियन जिप्सियों की शालीनता और संगीत से मोहित / त्रिलोकदीप

$
0
0




बुदापेश्त में किसी भी छोटे बड़े होटल में   खाना खाने के लिए चले जाइए आपकी  टेबल के पास आपका मनोरंजन करने के लिए कुछ साजिंदे अपनी वायलिन या गिटार या किसी और संगीत यंत्र के साथ पहुंच जाएंगे और कोई धुन सुनाने लगेंगे। वे आपसे आपकी फरमाइश भी पूछेंगे। आपके बताने पर उसकी तामील होगी। अपने हुनर में वे इतने सिद्धहस्त हैं कि किसी देश की देशी या विदेशी धुन को हूबहू आपके सामने पेश कर आपको चकित कर देंगे। मैंने भारतीय फिल्मों के कुछ गानों के नाम लिये, उन्होंने उस गाने की धुन बजा दी और कुछ  गाने गुनगुनाए भी जिन्हें उन्होंने तुरंत पकड़ लिया और मुझे उनकी धुनें सुना कर आश्चर्यचकित और रोमांचितकर दिया ।ये लोग बहुत ही हलीम और विनयशील होते हैं और मुस्कराते हुए सर झुकाकर आपका स्वागत करेंगे। इन्हीं होटलों की शान माना जाता है। ये लोग जिप्सी कहलाते हैं जो सारी दुनिया में फैले हुए हैं। हंगरी का सामान्य वर्ग हो या अभिजात्य वर्ग इनकी पूछ बराबर है। हंगरी की प्रसिद्ध पेंटर अमृता शेरगिल ने न केवल जिप्सी समाज की ही पेंटिंग्स बनाई हैं बल्कि किसानों और अभिजात्य समाज की भी। संवैधानिक तौर पर हंगेरी और जिप्सी को समान नागरिक अधिकार प्राप्त हैं लेकिन उन्हें'दोयम दर्जे'का नागरिक समझा जाता है।

जिप्सी एक ऐसी कौम है जो विश्व भर में विद्यमान है। मैं दावे के साथ इसलिए कह सकता हूं कि पूर्व औऱ पश्चिम यूरोप के देशों, अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ के  कुछ गणतंत्रों में इनकी उपस्थिति देखी है। मेरे मार्गदर्शक योसेफ साबो ने बताया था कि हमारे यहां के कुछ इतिहासकार मानते हैं कि जिप्सियों का आगमन भारत से हुआ था। पुराने समय में हिंदुस्तान पर अरबों के हमले होते रहते थे, नामुमकिन नहीं उन हमलावरों के साथ जिप्सी अरब के देशों में आ गए हों और वहां से यूरोप में फैलते चले गए हों। कुछ लोगों का यह भी दावा है कि सिकंदर महान के आक्रमण के पहले जिप्सीयों के कई कबीले हिंदुस्तान से भाग कर पशिचमी एशिया में आकर बस गए हों और वहां से धीरे धीरे यूरोप में आने लगे हों। कहीं कहीं यूरोप के लोग जिप्सयों को 'घुसपैठिया 'भी कहते हैं। बेशक़ जिप्सी कला के कुछ प्रशंसक भी हैं लेकिन उनके विरोधियों के स्वर ज़्यादा मुखर रहे हैं। 20वी सदी में हिटलर ने उनके खिलाफ जंग छेड़ करीब पांच लाख जिप्सयों को गैस चैंबर में बंद करके मार डाला था।शायद यही वजह है कि जिप्सी अपने बचाव के लिए एक जगह से दूसरी जगह भटकते रहे और खानाबदोश का जीवन बसर करते थे लेकिन उनकी संगीत कला की विरासत उनके साथ रही जो उनकी जीविका का आधार है। इसी विरासत के चलते ये जिप्सी अपनी संगीत और विनम्रता से लोगों को मंत्रमुग्ध भी कर देते हैं।

साबो बताते हैं कि कई वर्ष पहले श्रीनगर में जिप्सयों का एक सम्मेलन हुआ था। उस मे जिप्सी नेताओं ने इस तथ्य को स्वीकार किया था किउनके धर्म -कर्म, रीति- रिवाज, रहन -सहन, परम्पराएं और विचारधाराएं भारतीयों से खासा मेल खाती हैं। लिहाज़ा उनके संगीत के साथ साथ उनके खान -पान की शैली में भी समानता है।कुछ इतिहासकारों का यह भी मानना है कि जिप्सी बरास्ता मिस्र यूरोप में फैले। जब मैं हंगरी में था तब जिप्सियों के उद्भव औऱ विस्तार के बारे में अनुसंधानकार्य चल रहे थे। जिप्सी राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान के निदेशक गाबोर हवाश से मेरी इस बाबत लंबी चर्चा भी हुई। हवाश हंगेरियन हैं लेकिन हैं बहुत साफगो। अपने अनुसंधान कार्य के समय उन्हें जिप्सियों के बीच रहना पड़ा जिस के चलते वह उनकी आदतों, उनके खान- पान और उनके आचार -व्यवहार को बखूबी समझ गए थे। गाबोर यह तो साफ तौर पर नहीं बता पाये कि जिप्सियों ने भारत कब छोड़ा लेकिन उनका अपना अनुमान है कि वे ईरान से बाल्कन प्रायद्वीप होते हुए उत्तर तथा पश्चिमी यूरोप में फैलते चले गये। 1850 में पहला जिप्सी एक फ्रेंच के साथ लेओसंय पहुंचा था। कुछ जिप्सी अमेरिका।भी पहुंचे। एक अनुमान के अनुसार दो लाख से अधिक जिप्सी अमेरिका में रहते हैं, अकेले  न्यूयॉर्क में ही उनकी संख्या 20 हज़ार के करीब है। न्यूयॉर्क के  अलावा न्यू जेर्सी, न्यू मैक्सिको, कैलिफ़ोर्निया, फ्लोरिडा, ओरेगॉन तक जिप्सी फैले हुए हैं। कनाडा में भी जिप्सियों के होने के समाचार हैं।जहां तक यूरोप का संबंध है सर्बिया, बुल्गारिया,  हंगरी, रोमानिया, इंग्लैंड, जर्मनी, इटली और स्पेन में ये अच्छी खासी तादाद में हैं।हंगरी  में तो  यह चार लाख से कम नहीं होंगे। वक़्त गुज़रने के साथ कुछ देशों ने उन्हें अपना स्वाभाविक नागरिक मान लिया है, बावजूद इसके आज भी कुछ ऐसे देश हैं जो उन्हें   बेगानेपन का एहसास कराते रहते हैं। हंगरी में जिप्सी कुछ ऐसे हिलमिल गये हैं कि न केवल वे हंगेरी की भाषा ही बोलते हैं बल्कि जर्मन भाषा का ज्ञान भी  रखते हैं, वह इसलिए कि कभी हंगरी और ऑस्ट्रिया एक हुआ करते थे। ऑस्ट्रिया की राजभाषा जर्मन है, इस नाते हंगरी में भी उस भाषा का प्रभाव देखा जाता है। कुछ पुराने जिप्सी अपनी प्राचीन बोली भी बोलते हैं।

आज हंगरी के समाज में जिप्सी घुलमिल गये हैं।इसके कई कारण हैं। एक तो जिप्सी संगीत कर्णप्रिय है, दूसरे वे अच्छे घुड़सवार हैं और तीसरे वे धातु का काम और नक्काशी भी बहुत अच्छी करते हैं। उनके इन्हीं विरासती गुणों के कारण कोई भी ऐसा छोटा बड़ा रेस्तरां नहीं जहां जिप्सी संगीत मौजूद न हो।फर्क इतना है कि बड़े रेस्तरां का संगीतकार सम्पन्न होता है औऱ छोटे रेस्तरां का गरीब। आज2जिप्सी भोजन भी हंगरी भी लोकप्रिय होता जा रहा है। वह इसलिए कि जिप्सियों की तरह हंगरी के लोगों को भी मसालों का बहुत शौक है और वे भी अपनी सब्जियों में मसालों का छौंक लगवाना खूब पसंद करते हैं। हंगरी में आज हालत यह हो गयी है कि जिप्सी लोकगीत, लोककलाओं औऱ लोकसंगीत के प्रति लोगों की दिलचस्पी दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हंगरी में जैसा तरक्की का दौर शुरू हुआ है उसमें जिप्सी समुदाय की भूमिका की अवहेलना नहीं की जा सकती न ही उसे गौण ठहराया जा सकता है। इतना ही नहीं हंगरी में कुछ बेहतरीन जिप्सी लेखक औऱ कवि भी जन्मे हैं जिनका यहां के साहित्य में खासा महत्व है। कुछ प्रख्यात और महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित जिप्सी विदेशों में जाकर बस गए हैं  तो कुछ अपने समाज से इसलिए कट गये हैं कि उन्होंने स्थानीय लोगों से शादी कर ली है। आम तौर पर हंगेरी और जिप्सी की शादी को नहीं स्वीकारा जाता और कोई हंगेरी लड़की किसी जिप्सी से शादी कर भी लेती है तो उसे 'दुर्घटना'माना जाता है।गाबोर के अनुसार वह इसलिए कि 66 फीसदी जिप्सी  ऐसे हैं जो आम हंगेरी के निम्न स्तर से भी निम्न हैं। उनके पबों को देखकर लगता है कि क्या ये भी यूरोपवासी हैं। लेकिन जिस तरह से हंगेरी औऱ जिप्सी लोगों में जुड़ाव निरन्तर बढ़ रहा है , बहुत जल्द ये सामाजिक दूरियां भी सिकुड़ने लगेंगी। कोई भी देश जिप्सी जैसे गुणी  और हुनरमंद लोगों की उपेक्षा और अवहेलना अधिक समय तक नहीं कर सकता। बेशक़ जिप्सियों का भविष्य उज्ज्वल है।



....................................................................................



.... 

Viewing all articles
Browse latest Browse all 3437

Trending Articles



<script src="https://jsc.adskeeper.com/r/s/rssing.com.1596347.js" async> </script>