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श्याम बिहारी श्यामल / यादों का कोना.....

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■■■■  संस्मरण 🌺 © श्‍याम बिहारी श्‍यामल  ■■■■
■■  वे दिन जो कभी ढले नहीं- 38  ■■
■■ जाने-अनजाने, एक से एक दीवाने ■■
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विज्ञान चीख-चीख कर कब का निढाल हो चुका है! त्वचा के फूटे-सूखे फोड़े-ज़ख्मों जैसी सतहों वाली तस्वीरें 24 घंटे गूगल पर हाज़िर हैं! दिमाग़ समझ भी सब रहा लेकिन दिल कहां कुछ ऐसा-वैसा मानने को तैयार है!

गज़ल आज भी चांदनी में लहालोट है, आशिक़-शायर सब बदस्तूर उसी तरह फ़िदा! धरती का खुला आदिम ऐलान मद्धिम पड़ने का नाम नहीं ले रहा : चांद इस सरजमीं पर आज भी चांद है, कल भी चांद रहेगा!

दुनिया ऑन लाइन है तो हुआ करे. नगर-महानगरों के चंद घिरे-बंद औंसाए-बसाते कॉलोनी-अपार्टमेंटों की क्या बिसात! यहां छोटे-छोटे ज़िले तक हज़ार-हज़ार गांवों से अंटे पड़े हैं, जहां अब भी पलकें सोहर के समवेत में झपकना सीखती हैं और कान सुनना. पराती भोर और सांझा शाम का सिंगार करती है!

रोपनी, कटनी, ओसौनी से लेकर कुटाई-पिसाई तक, हर दैनंदिन क्रिया-कलाप भी संस्कारों की तरह अपने-अपने आलापों से सम्पन्न हैं!

तुलसी की चौपाई और कबीर-रहीम के दोहे यहां स्कूल जाना शुरू करने से पहले कानों में घर कर चुके होते हैं!

तमसा-तट पर आदिच्छन्द के जन्म की कथा बांचती यह धरती संसार की मौलिक काव्य-भूमि है, 'जन'को कविता का मर्म समझाने के लिए यहां भला किसी जले-कूढ़े धुआंते-गंधाते आलोचक-समालोचक नामधारी किसी 'जीव'की क्या आवश्यकता!

वेदों से लेकर गीत-गोविंद, गीतांजलि, और कामायनी तक की विराट गीति-परंपरा को विच्छिन्न होने से बचा ले जाने वाले महाकवि आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री की काव्य-साधना पर मतिभ्रम आलोचक आगे भी चाहे जब तक बोलने से कतराते रहें, जीवन-जगत में उनके प्रति आम दीवानगी के दृश्य देखने वालों ने खूब देखे हैं!

ज़िले में दाख़िल होने के बाद क्या डीएम क्या एसपी अथवा बड़े से बड़ा नेता-मंत्री तक, साहित्य का चाहे 'क'भी न पसंद करता हो तब भी सबसे पहले कहां पहुंच कर शिष्यवत उपस्थिति दर्ज़ कराता था! कोई चाहे तो आज भी किसी जागरूक-जानकार मुज़फ्फरपुर-वासी से बात करके तस्दीक़ कर ले!

उस पर तुर्रा यह कि महाकवि आगंतुक का स्वागत-सत्कार जैसे उमड़ कर करते वैसे ही राजनीति से लेकर प्रशासन तक की ख़बर भी जमकर लेते. लाल-लाल शब्द-वाक्य जैसे धीपे चिमटों में तब्दील हो जाते और वह 'श्रीमान'का गतर-गतर दाग कर ही वापस भेजते!

यह शक्ति जानकीवल्लभ जी ने किसी 'पुरस्कार'से उत्पन्न प्रभाव से नहीं बल्कि सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने काव्य-व्यवहार के बूते अर्जित की थी!

अपने यहां तो छोड़िए, और कहीं भी ऐसा कोई दूसरा उदाहरण हो तो जानकारी आमंत्रित है!

कागज़ पर आग उगलने वाले एक से एक 'शब्द-वीरों'को तो इन्हीं पंक्तियों के लेखक ने सत्ता के गलियारों में वेश बदल कर घूमते पकड़ा है और कई 'शाब्दिक महामनाओं'को सत्ताधीशों के पास पहुंच उनसे प्राप्त 'च्यवनप्राश'चाभते दुनिया ने भी देखा है!

काश! कोई जो और ऐसा मिला होता, जिसमें आम साहित्य-प्रेमी से लेकर कड़क नेता-मंत्री और आला अफ़सर तक के लिए आकर्षण का केंद्र बनने और किसी पर भी प्रत्यक्ष शब्द-बाण चलाने की क्षमता दिखी होती! तब हम भी यह मान लेते कि यह जानकीवल्लभ जी का अलगपन नहीं, रचना-प्रभाव की सामान्य परिणति है!

वाह रे शहर मुज़फ्फरपुर! अपने कविर्मनीषी को सदा सिर-आंखों पर ही उठाए रखा!

जन्मदिन पर हर वर्ष कैसे नगर अपने महाकवि का अभिषेक करता था, यह जिन्होंने देखा है, वही जानते हैं! मूर्ति की तरह फूल-मालाओं से लदे बैठे बीच में विराजमान जानकीवल्लभ जी और टूटने का नाम न लेती माला पहनाने वालों की मुदित उद्धत कतारें!

ऐसा नज़ारा किस भाषा-देश के प्रांगण में कहीं कभी और देखा गया है! मिसाल यह कि तिरोधान के बाद अब भी मुजफ्फरपुर नगर जानकीवल्लभ जी की स्मृतियों को सजाते नहीं थक रहा!

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निंदकों का क्या! उन्हें राजा श्रीरामचंद्र के समय भी ऐन रामराज के भीतर घुसकर ग़ुल खिलाने से ही कौन रोक सका! जानकीवल्लभ शास्त्री के भी रहे लेकिन इसके विपरीत ऐसों की फेहरिश्त काफी बड़ी है जो उन्हें सदा सिर पर ही उठाने के अवसर ढूंढते रहे.

निःसन्देह ऐसे लोग साहित्य के अधिसंख्य 'अबोध'श्रद्धालु ही रहे,  'अति प्रबुद्ध'कोई नामी नुक़्ताचीं तो कदापि नहीं!

नई पीढ़ियों के रचनाकार उनके दीवाने हुआ करते. उन्हें देखने और उनसे मिलने की लालसा लेकर दूर-दूर से मुज़फ्फरपुर पहुंचते! दूसरी तरफ़, साहित्येतर प्राणियों में ऐसे-ऐसे लोग होते कि इनके नाम देख आज भी आश्चर्य होना लाज़िमी है!

उदाहरण के लिए कर्पूरी ठाकुर और किशोर कुणाल!

कहना न होगा कि बिहार के कई दफा मुख्यमंत्री रह चुके कर्पूरी ठाकुर हमारी राजनीति की उस लोहियावादी समाजवादी परंपरा की कड़ी थे जिसकी जन्मघूंटी में ही हिन्दी भाषा को लेकर कुछ दृढ़ संकल्प-भाव हमेशा विद्यमान रहे. काफी पहले जब शास्त्री जी अपने ही परिसर में किसी बछड़े की कुलांच से गंभीर रूप से आहत हो गये थे तो इलाज के क्रम में कर्पूरी जी उनके साथ साये की तरह पटना (पीएमसीएच ) से लेकर दिल्ली (एम्स) तक डोलते रहे. उन्होंने अपने चिकित्सक-पुत्र को भी साथ ले रखा था ताकि शास्त्री जी को हर क्षण हर संभव चिकित्सकीय मदद पहुंचती रह सके.

कहा जाता है, एम्स में शास्त्री जी ने हड्डी के ऑपरेशन के दौरान स्वयं को बेहोश न करने का अनुरोध किया था. उन्हीं दिनों उसी अवस्था में लिया गया उनका इंटरव्यू अखबारों में आया था जिसमें उन्होंने कहा था कि अभी वे दुःख का आनंद ले रहे हैं! सुनने में यह बात आज भी अटपटी लग सकती है किंतु इससे किसी को भी यह अनुभूति हो सकती है कि जीवन के प्रति वह ऐसे ही अपना कुछ खास नजरिया अवश्य रखते थे.

उसी तरह, किशोर कुणाल सामान्य आईपीएस नहीं रहे. पुलिस कप्तान के रूप में कमोवेश तत्कालीन अविभाजित बिहार के विभिन्न जिलों में उनकी पहचान एक कठोर और सिद्धांतनिष्ठ अधिकारी की कायम हुई थी. ऐसा एसपी जिसके पहुंचते ही वहां के राजनेता असुविधा से भरकर कराहने- दहाड़ने लगते, जबकि कई बार उनके असमय स्थानांतरण पर सीधे जनता को ही उनके पक्ष में मुखर हो उबलते देखा गया. बाद में यही किशोर कुणाल पटना के विख्यात महावीर मंदिर को विराट आकार और ख्याति दिलाने वाले व्यक्ति के रूप में भी जाने गये. यों तो उनकी इतिहास-विषय में गहरी रुचि रही है लेकिन उन्होंने समय आने पर अपना साहित्य-विवेक या भाषा-प्रेम भी साबित किया.

एक बार शास्त्री जी को अस्वस्थता के दौरान पटना में उन्होंने अपनी श्रद्धा-भावना में ऐसा बांध लिया कि वह अपने स्वभाव के विपरीत उनके आवास पर जाने को राजी हो गये और कई दिनों तक वहीं रहकर स्वास्थ्य-लाभ करते रहे. मुजफ्फरपुर में तो इन पंक्तियों के लेखक ने स्वयं अपनी आंखों देखा है कि साहित्य-प्रेमी ही नहीं सामान्य ज्ञान-विवेक रखने वाला हर आम-ओ-खास उन्हें लगभग पूजता ही रहा. इसके विपरीत हमारे साहित्य के व्याख्याकार-ठेकेदार उनके प्रति एकदम उदासीन बने रहे. यह बाकायदा हिन्दी साहित्य का एक शर्मनाक अध्याय है.

विगत कई दशकों से भी अधिक समय से साहित्य का आम पाठक भी यह महसूस करता रहा कि शास्त्री जी जैसे रचनाकार को आलोचना-समालोचना के तंत्र ने कठोर अनदेखी का शिकार बनाये रखा. शास्त्री जी ने जो लिखा है उसे अनदेखा तो कोई कर सकता है लेकिन बेशक मिटा नहीं सकता. इसलिए इतिहास में उनकी जो जगह है वह है और रहेगी, लेकिन उनके साहित्य को बगैर पढ़े अचर्चा के वार से खारिज करने का प्रयास चलाने वाले जिम्मेवार आलोचक बेशक आज समय के कठघरे में खड़े हैं. उजाले में अथाह ऊर्जाशून्यता और अपरिमित उल्टा लटकान-सुख पाने अथवा अंधेरे में अपार सुविधा तथा मनमाना उड़ान- उल्लास से भर जाने वाली हमारी समकालीन आलोचना का चमगादड़-युग आज न कल नियतिवश भी तो ढलेगा ही, तब भावी आलोचक भी बेशक अपने अग्रजों की नीयत और औकात का सही-सही अंदाजा लगा सकेगा.
■ ज़ारी ■
Bhagwati Prasad Dwivedi RamRaksha Mishra Vimal Gopeshwar Singh Sanjay Pankaj Binay Kumar Sharma

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