सवाल दर सवाल
रवि अरोड़ा
मेरी उम्र उन दिनों बाईस-चौबीस साल रही होगी जब पहली बार अपने गुरु डाक्टर वीके राय साहब के साथ नेपाल गया । दरअसल हम लोग एक नाटक के मंचन के सिलसिले में गोरखपुर गए थे और राय साहब बोले कि यहाँ तक आया हूँ तो अपने छोटे भाई से भी मिल लूँ । राय साहब के भाई पड़ौस के क़स्बे नौतनवा में रहते थे । हम लोग दो दिन नौतनवा रुके थे । इसी बीच राय साहब ने भाई कहा कि सुना है यहाँ कम्बल अच्छे मिलते हैं । इस पर भाई ने कहा कि यहाँ नहीं नेपाल में मिलते हैं और शाम को चल कर ले आएँगे । यह बात सुन कर बड़ी हैरानी भी हुई और हँसी भी आई कि कह तो एसे रहे हैं जैसे नेपाल इनकी बग़ल में रखा है । इसपर राय साहब ने बताया कि हम जहाँ ठहरे हुए हैं वहाँ से मात्र दो सौ मीटर आगे नेपाल की सीमा शुरू हो जाती है । उन्होंने यह भी बताया कि दोनो देशों में आवाजाही पर कोई रोकटोक भी नहीं है ।
शाम हुई और हम लोग पैदल ही नेपाल चले गये । बेशक दोनो देशों के बीच नो मैंस लैंड की लकीर खिंची हुई थी मगर उसका महत्व इतना ही दिखा जितना सड़क के बीच से गुज़र रही रेल की पटरियों का होता है । सीमा पार करते ही बाज़ार शुरू हो गया और तमाम दुकानदार हमारे गली मोहल्ले के दुकानदारों की तरह भोजपुरी-अवधी मिश्रित हिंदी में हमें अपनी ओर आकर्षित करने लगे । ग्राहक भी भारतीय अधिक दिखाई दिए । इन सभी दुकानों पर नेपाली करेंसी से अधिक भारतीय रुपयों में लेनदेन हो रहा था । दुकानों पर वहाँ के राजा रानी की तस्वीरों के साथ इन सभी देवी देवताओं की तस्वीरें और मूर्तियाँ भी सुशोभित थीं जिन्हें बचपन से ही मैं अपने घर में देखता आया था । कुछ साल पहले बनबसा के एतिहासिक रीठा साहब गुरुद्वारे भी जाना हुआ । पता चला कि यहाँ से थोड़ी सी दूरी पर नेपाल है और वहाँ के बाज़ार महेंद्र नगर में बहुत सस्ता सामान मिलता है । बस फिर क्या था , मुँह उठाया और ख़रीदारी करने नेपाल चले गये । चौड़ी सड़क पर दोनो ओर से गाड़ियाँ बेधड़क आ जा रही थीं । इसके अतिरिक्त भी जब कभी नेपाल जाना हुआ मुझे वह अपने ही देश का कोई हिस्सा लगा । नौतनवा और बनबसा ही क्यों बिहार, उत्तर प्रदेश , पश्चिमी बंगाल, उत्तराखंड और सिक्किम तक फैली भारत-नेपाल की 1850 किलोमीटर लम्बी सीमा से सटे सैकड़ों एसे इलाक़े हैं जो हमें अनुभव कराते हैं कि सदियों के हमारे राजनीतिक, धार्मिक , राजनीतिक और व्यापारिक सम्बंधों की नींव यूँ ही इतनी गहरी नहीं है । इसकी जड़ों में करोड़ों लोगों ने सदियों तक प्यार और विश्वास उड़ेला है । मगर अब एसा क्या हुआ है कि यह प्यार खटास में बदलता दिख रहा है ?
माना कि नेपाल की अंदरूनी राजनीति इसकी जड़ में है और वहाँ के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली भी हमारे नेताओं की तरह अपनी जनता को झूठा देशप्रेम बेच रहे हैं मगर एसे में हम क्या कर रहे हैं ? हो सकता है कि चीन के इशारे पर नेपाल की संसद ने भारत के लिपुलेख, कालापानी व लिंपियाधुरा इलाक़े को अपना बताने वाले नक़्शे पर अपनी मोहर लगा दी हो मगर विवाद के इतना बढ़ने पर भी नई दिल्ली ने क्या किया ? नेपाल में चीन अपना पंजा फैला रहा है और तिब्बत तक रेल व सड़क मार्ग विकसित करने के साथ अरबों रुपयों का वहाँ निवेश कर रहा है , एसे में हमारी शिथिलता का क्या कारण है ? चीन अब नेपाल को अपने बंदरगाह इस्तेमाल करने के लिए तैयार कर रहा है मगर फिर भी हमारे प्रधानमंत्री वहाँ के समकक्ष से बातचीत क्यों नहीं कर रहे ? माना कि उत्तराखंड में हमारे द्वारा धारचुला और लिपुलेख दर्रे को जोड़ने वाली सड़क बनाने से नेपाल नाराज़ है तो हमें उससे बात करनी चाहिये । आख़िर क्या वजह है कि हमारा हर पड़ौसी से सीमा विवाद है ? पहले पाकिस्तान फिर चीन और अब नेपाल ? आख़िर कब तक हम अपनी सारी समस्याओं के लिए पंडित नेहरु को ज़िम्मेदार ठहराते रहेंगे ? छः वर्ष का समय कम था क्या इन सभी ग़लतियों को सुधारने के लिये ? आख़िर पता तो चले कि यह कौन सी विदेश नीति है जिसमें नेपाल जैसा पिद्दी भी अब हमारे आदमियों को मार रहा है ?