महान साहित्यकार, पत्रकार एवं युगविधायक #महावीर_प्रसाद_द्विवेदी
"मुझसे अगर कोई पूंछे कि द्विवेदी जी ने क्या किया, तो मैं समग्र आधुनिक हिन्दी साहित्य दिखाकर कह सकता हूँ, यह सब उन्हीं की सेवा का फल है।"
पदुमलाल पन्नालाल बख्शी जी ने ये पंक्तियां द्विवेदीजी के लिए लिए लिखी थी.
हिन्दी साहित्य के वह महान युग प्रवर्तक साहित्यकार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदीहिन्दी को न केवल ऊंगली पकड़ कर चलना सिखाया अपितु अनुशासन की छड़ी से शुद्ध एवं व्याकरण सम्मत बनाया.
महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के दौलतपुर गाँव में 15 मई 1864कोहुआथा. इनके पिता का नाम पं॰ रामसहाय दुबे था.इन्हें जी आई पी रेलवे में नौकरी मिल गई.25 वर्ष की आयु में रेल विभाग अजमेर में 1 वर्ष का प्रवास.नौकरी छोड़कर पिता के पास मुंबई प्रस्थान एवं टेलीग्राफ का काम सीखकर इंडियन मिडलैंड रेलवे में तार बाबू के रूप में नियुक्ति. अपने उच्चाधिकारी से न पटने और स्वाभिमानी स्वभाव के कारण 1904 में झाँसी में रेल विभागकी 200 रुपये मासिक वेतन की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया.
सन् 1903 में द्विवेदी जी ने सरस्वती मासिक पत्रिका के संपादन का कार्यभार सँभाला और उसे सत्रह वर्ष तक कुशलतापूर्वक निभाया.उन्होंने पचास से अधिक ग्रंथों व सैकड़ों निबंधों की रचना की. इनमें ‘अद्भुत आलाप’, ‘विचार-विमर्श’, ‘रसज्ञ-रंजन’, ‘संकलन’, ‘साहित्य-सीकर’, ‘कालिदास की निरंकुशता’, ‘कालिदास और उनकी कविता’, ‘हिंदी भाषा की उत्पत्ति’, ‘अतीत-स्मृति’ और ‘वाग्विलास’, ‘सुमन’ आदि महत्वपूर्ण है. उन्होंने कई ग्रंथों का अनुवाद भी किया| संस्कृत से अनूदित ग्रंथों में रघुवंश, महाभारत, कुमारसंभव, और किरातार्जुनीयम शामिल हैं, जबकि अंग्रेजी से अनूदित ग्रंथों में बेकन विचारमाला, शिक्षा व स्वाधीनता शामिल हैं. इनके मौलिक और अनूदित पद्य और गद्य ग्रन्थों की कुल संख्या अस्सी से भी ज्यादा है.
महावीरप्रसाद द्विवेदी कविता, कहानी,आलोचना, पुस्तक समीक्षा, अनुवाद, जीवनी आदि विधाओं के साथ उन्होंने अर्थशास्त्र, विज्ञान, इतिहासआदिअन्य अनुशासनों में न सिर्फ विपुल मात्रा में लिखा, बल्कि अन्य लेखकों को भी इस दिशा में लेखन के लिए प्रेरित किया.आचार्य द्विवेदी जी के अतुलनीय योगदान के कारण ही आधुनिक हिन्दी साहित्य का दूसरा युग 'द्विवेदी युग'के नाम से प्रसिद्ध है.
भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में भी उनका उल्लेखनीय रहा.सरस्वती'में प्रकाशित कविता 'आर्य भूमिमे द्विवेदीजी
लिखऎते हैं----
विचार ऐसे जब चित्त आते,
विषाद पैदा करते, सताते।
न क्या कभी देव दया करेंगे?
न क्या हमारे दिन भी फिरेंगे।
आचार्य रामचन्द्रशुक्ल,पदुमलालपन्नालालबख्शी, मैथिली शरण गुप्त, विश्वम्भर नाथ शर्मा आदि हिन्दी साहित्य के दैदीप्यमान सितारे द्विवेदी युग की ही देन हैं. 'प्यारा वतन'कविता में वह लिखते हैं:
कच्चा घर जो छोटा सा था,
पक्के महलों से अच्छा था।
पेड़ नीम का दरवाजे पर,
सायबान से बेहतर था।
देश प्रेम की ये पंक्तियाँ-------
पिछड़ा वतन हुआ यह बेजा,
फटता है सुब किये कलेजा।
ठाठ अमीरी के सब तुझपर,
मिले अगर, तू करे निछावर।
द्विवेदी जी के अतुलनीय योगदान का हिन्दी साहित्य चिर ऋणी रहेगा. 21 दिसम्बर 1938 को रायबरेली में इनका स्वर्गवास हो गया.
आज पुण्यतिथि पर नमन.