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यूपी औऱ समाजवादी पार्टी के चाणक्य / अरविंद सिंह

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अमर-स्मृतिशेष :  वह एक समय में भारतीय राजनीति का चाणक्य था...! 

"इस खित्ताए आज़मगढ़ पे, फै़जाने तजल्ली है यक्सर/
जो ज़र्रा यहाँ से उठता है, वो नैय्यर-ए-आज़म होता है."

@ अरविंद सिंह
वह एक समय में भारतीय राजनीति का चाणक्य था. वह 
मनमोहन सरकार का संकटमोचक था, वह परमाणु करार का नायक था.वह दोस्तबाज़ था, वह मुलायमवादी था. वह गज़ब का वक्ता था, वह राजनीतिक प्रबंधक था.और सबसे बड़ी खूबसूरती यह कि वह हाज़िर जवाबी था, दुनिया के सारे सवालों का उत्तर देने और सामना करने की अदभुत क्षमता थी. सियासत ही नहीं, व्यापार ही नहीं, फिल्म और मौसिकी में भी गज़ब का दखल था. याद्दाश्त इतनी कि पत्रकारों और फिल्मी पत्रकारों को भी करेक्ट कर देने की अदभुत क्षमता थी. 
 सक्रिय सियासत में जबतक जिया भारतीय मीडिया ही नहीं विदेशी मीडिया का भी ध्यान खींचा. क्योंकि वह अमर था, और अमर ही रहेगा, मुलायम का यह अमर-प्रेम, समय और सियासत की रेखा पर अमर था और अमर ही रहेगा, एक समय समाजवादी पार्टी के प्रमुख रहे मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक प्रबंधन का केन्द्रीय तत्व. उनके फैसलों और नजरिएं का हमसाया और सोच की प्रतिछाया था. दोस्तबाज़ इतना की एक समय में दुनिया की सबसे शक्ति देश अमेरिका के राष्ट्रपति रहे बिल क्लिंटन को भी उत्तर प्रदेश में लाकर मुलायम के बगल बैठा दिया. दुनिया के अनेक राष्ट्राध्यक्षों से व्यक्तिगत संबंध रखने वाले अमर सिंह को एक समय में भारतीय सियासत का चाणक्य तक कहा गया. 
आज सिंगापुर में इलाज के दौरान  अंतिम सांस ली.निधन की ख़बर से पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गयी है. काफी समय पहले उनका किडनी ट्रांसप्लांट हुआ था, तभी से उनके स्वास्थ्य में गिरावट आने लगी थी. और काफी दिनों से सिंगापुर में इलाज चल रहा था.
अमर सिंह मूलतः पूर्वी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के तरवां क्षेत्र के रहने वाले थे. हरिश्चंद्र सिंह के बड़े पुत्र के रूप में अमर सिंह की शुरुआती शिक्षा दीक्षा अलीगढ़ से लेकर कोलकाता (तब कलकत्ता) तक में हुई. आजमगढ़ के प्रतिष्ठित फौजदारी अधिवक्ता शिवधनी सिंह की कृपा इस लेखक के ऊपर हमेशा बनी रही, उनके जीवन काल में अनेक सामाजिक मुद्दों पर बातें और विधिक परामर्श लेने का सौभाग्य मिला और आजीवन 'शार्प रिपोर्टर'के विधिक सलाहकार बनकर आशीर्वाद देते रहे.एक संस्मरण सुनाते हुए शिवधनी सिंह ने बताया था कि- 'एक बार उन्हें कोलकाता जाने का अवसर मिला. वहाँ उन्हें अमर सिंह के पिता हरिश्चन्द्र सिंह से भी मिलना था. क्षेत्रीयता के कारण उनसे एक लगाव भी था. बताते हैं कि जब वे हरिश्चन्द्र सिंह के घर गये तो देखा, एक युवा कमरे में पुस्तकालय बना कर किताबों के बीच बैठा है, पत्र और पत्रिकाओं के ढेर में इस युवा से जब शिवधनी सिंह की मुलाकात हुई तो उन्होंने पूछ लिया कि आप इतनी भाषाओं के अखबार, पत्रिकाओं और किताबों को पढ़ डालते हैं, तो अमर सिंह ने जवाब दिया, यह मेरी रोज की दिनचर्या है. जमीन पर लेटा और किताबों के बीच में घिरा यह युवक अमर सिंह उस समय राजनीति में नहीं था, बल्कि साहित्य, मौसिकी और किताबी ज्ञान की दुनिया में डूबा हुए एक अध्येता था. शिवधनी के अनुसार जिस युवा में अपने जवानी में इतनी अध्यवसायी होने का प्रमाण मिल रहा हो, वह जिस भी क्षेत्र में जाएगा बुलंदी पर पहुंचेगा.'आज शिवधनी सिंह नहीं हैं, बल्कि उनकी अशेष स्मृतियाँ हैं, और उनकी कही बातें हैं, जो अमर सिंह के लिए कही थी.
अमर सिंह ने शिवधनी सिंह से रिश्तों को भी निभाया. और अंतिम समय में अखिलेश और उनकी सरकार से रिश्तों की समाप्ति के बाद भी अपने प्रभाव से शिवधनी के छोटे पुत्र सिद्धार्थ सिंह को सरकार का अपर महाधिवक्ता तक बनवा दिया. यह आजमगढ़ की माटी की खूबी और तमसा के पानी की रवानी है कि वह जहाँ भी रहेगा, भीड़ का हिस्सा नहीं बल्कि भीड़ का लीडर बनकर दिखता है. आजमगढ़ जो विद्रोह और बगावत की धरती रही है, उसने सियासत में भी उतना ही जे़हनी और प्रतिबद्ध मानी गयी. कभी वामपंथियों का केरल रहा आजमगढ़ परिवर्तन और बगावत का आगाज करता है. अमर सिंह ने जिस समाजवादी मुलायम सिंह यादव के साथ रिश्तों को निभाते हुए उनके पुत्र अखिलेश यादव का एडमिशन कराने आस्ट्रेलिया ले गये, समय ने ऐसा करवट ली कि वही अमर सिंह   अखिलेश के अंकल से गैर बन गये. समय ने ऐसे भी दिन दिखाए की परमाणु करार के नायक को जेल भी जाना पड़ा और इस मुश्किल वक्त में एक एक दोस्त बेगाने बनते चले गएं. लेकिन उन्होंने कभी मुलायम और शिवपाल की यारी नहीं भूली.  आज उनके जाने के बाद दो पुत्रियाँ दृष्टि और दिशा तथा पत्नी पंकजा के अलावा छोटे भाई अरविंद सिंह हैं.  आजमगढ़ के इस लाल को जिसने आजमगढ़ की गरिमा को आसमान की ऊंचाई दी अंतिम सलाम!!  अलविदा अमर सिंह..!

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