यादें / अलविदा राहत इंदौरी साहब...
कोरोना पॉ़जिटिव होने के बाद मशहूर शायर राहत इंदौरी को देर रात इंदौर के अरविंदो अस्पताल में भर्ती कराया गया था। यह जानकारी उन्होंने खुद ट्वीट कर अपने चाहने वालों को दी थी। उन्होंने कहा था, कोविड के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर कल मेरा टेस्ट किया गया, जिसकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। ऑरविंदो हॉस्पिटल में एडमिट हूं, दुआ कीजिए जल्द से जल्द इस बीमारी को हरा दूं। उन्होंने अपने ट्वीट में लोगों से अपील भी की थी कि मेरे बारे में जानकारी के लिए बार-बार मुझे या मेरे परिवार को फोन न करें, इसकी जानकारी ट्विटर और फेसबुक के माध्यम से आपको मिलती रहेगी। लेकिन सच यही है कि उनकी ओर से अब कोई खबर नहीं आएगी। अपनी तरह की शायरी और उसे कहने के अंदाज़ के लिए मशहूर शायर और गीतकार राहत इंदौरी ने इस दुनिया को आज अलविदा कह दिया। उनका इंतकाल दिल का दौरा पड़ने से हुआ।
राहत इंदौरी को फ़िल्म में गीत लिखने का पहला अवसर महेश भट्ट ने अपनी फिल्म सर में दिया था। फिल्म के गीत पसंद किए गए, लेकिन उन्हें ज्यादा तवज्जो नहीं मिली। बाद में कुछ और फिल्मों के गीत उन्होंने लिखे। मुन्नाभाई एमबीबीएस के देख ले... और छन छन..., करीब का चोरी चोरी जब नजरें मिलीं..., मीनाक्षी: ए टेल ऑफ थ्री सिटीज के ये रिश्ता... और दो कदम और सही..., मिशन कश्मीर का बुमरो बुमरो..., इश्क़ का नींद चुराई मेरी किसने ओ सनम तूने..., मर्डर का दिल को हजार बार रोका रोका रोका..., दर्द का दीवाना दीवाना..., बेगमजान का मुर्शिद... आदि गीतों को लोगों ने पसंद किया, लेकिन उनकी तबीयत शायरी करने लिखने में ही लगती थी।
राहत का जन्म इंदौर में 1 जनवरी 1950 में रिफअत उल्लाह कुरैशी और मकबूल उन निशा बेगम के यहां हुआ। वे उन दोनों की चौथी संतान थे। उनकी शिक्षा इंदौर में हुई। उन्होंने इस्लामिया करीमिया कॉलेज से स्नातक और बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल से उर्दू साहित्य में एमए किया। फिर मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय से उर्दू साहित्य में पीएचडी भी किया।
राहत इंदोरी ने शुरुआती दौर में आई के कॉलेज, इंदौर में उर्दू साहित्य का अध्यापन कार्य शुरू किया। वे कॉलेज के अच्छे व्याख्याता थे। फिर वे मुशायरों में व्यस्त हो गए और पूरे भारत से और विदेशों से निमंत्रण प्राप्त करना शुरू कर दिया। उनकी अनमोल क्षमता, लगन और शब्दों के चयन की कला के साथ शायरी करने की एक विशिष्ट शैली भी थी, जिसने बहुत जल्द जनता के बीच उन्हें लोकप्रिय बना दिया और कुछ समय में उनकी कविता की खुशबू ने उन्हें उर्दू साहित्य की दुनिया में एक प्रसिद्ध शायर बना दिया। वह न सिर्फ पढ़ाई में प्रवीण थे, बल्कि खेलकूद में भी प्रवीण थे। स्कूल और कॉलेज स्तर पर फुटबॉल और हॉकी टीम के कप्तान भी थे। वह केवल 19 वर्ष के थे जब उन्होंने अपने कॉलेज के दिनों में अपनी पहली शायरी सुनाई थी।
जब राहत साहब के वालिद रिफअत उल्लाह 1942 में देवास जिले से इंदौर आए तो उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन उनके राहत इस शहर की पहचान बन जाएंगे। राहत साहब का बचपन का नाम कामिल था। बाद में इनका नाम बदलकर राहत उल्लाह कर दिया गया, फिर राहत कुरैशी और बाद में राहत इंदौरी। राहत साहब का बचपन मुफलिसी में गुजरा। वालिद ने इंदौर आने के बाद ऑटो चलाया, मिल में काम किया, लेकिन उन दिनों आर्थिक मंदी का दौर चल रहा था। दूसरे विश्वयुद्ध ने पूरे यूरोप की हालात खराब कर रखी थी। उन दिनों भारत के कई मिलों के उत्पादों का निर्यात योरोप से होता था। दूर देशों में हो रहे युद्ध के कारण भारत पर भी असर पड़ा। मिल बंद हो गए या वहां छटनी करनी पड़ी। राहत साहब के वालिद की नौकरी भी चली गई। हालात इतने खराब हो गए कि परिवार को बेघर होना पड़ा। जब राहत साहब ने आगे कलम थामा तो इस वाकये को शेर में बयां किया...
अभी तो कोई तरक़्की नहीं कर सके हमलोग
वही किराए का टूटा हुआ मकां है मियां
राहत साहब को पढ़ने लिखने का शौक़ बचपन से ही रहा। पहला शेर देवास के मुशायरे में पढ़ा था। राहत साहब से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा यह है कि जब वे नौंवी कक्षा में थे, तो उनके स्कूल नूतन हायर सेकेंड्री स्कूल में एक मुशायरा होना था। राहत साहब की ड्यूटी शायरों की ख़िदमत करने की लगी। जांनिसार अख्तर वहां आए थे। राहत साहब उनसे ऑटोग्राफ लेने पहुंचे और कहा, मैं भी शेर पढ़ना चाहता हूं, इसके लिए क्या करना होगा?
जांनिसार अख्तर साहब बोले, पहले कम से कम पांच हजार शेर याद करो...
राहत साहब बोले, इतने तो मुझे अभी याद हैं हुज़ूर
उनकी बात सुनकर जांनिसार अख्तर साहब ने कहा, तो फिर अगला शेर जो होगा, वो तुम्हारा होगा...
इसके बाद जांनिसार अख्तर ऑटोग्राफ देते हुए अपने शेर का पहला मिसरा लिखा, हमसे भागा न करो दूर गज़ालों की तरह...
ज्योंहि अख्तर साहब कुछ आगे कहते, राहत साहब के मुंह से दूसरा मिसरा बेसाख्ता निकला, हमने चाहा है तुम्हें चाहने वालों की तरह...
राहत इंदौरी की सबसे खास बात यह रही कि वह अवाम के ख़यालात को बयां करते रहे। उसपर ज़बान और लहज़ा ऐसा कि क्या इंदौर और क्या लखनऊ, क्या दिल्ली और क्या लाहौर, हर जगह के लोगों की बात उनकी शायरी में होती रही। इसका एक उदाहरण तो बहुत पहले ही मिल गया था। साल 1986 में राहत साहब ने कराची में एक शेर पढ़ा था तब लगातार पांच मिनट तक तालियों की गूंज सुनाई देती रही। फिर उन्होंने दिल्ली में भी वही शेर पढा, तो ठीक वैसा ही दृश्य यहां भी बना। शेर था...
अब के जो फैसला होगा वह यहीं पे होगा
हमसे अब दूसरी हिजरत नहीं होने वाली
शेर, नज़्म या ग़ज़ल पढ़ने के अपने अंदाज के लिए मशहूर राहत साहब अब हमारे बीच नहीं हैं। बस उनकी यादें हैं..., अलविदा राहत इंदौरी साहब।
-रतन