*महात्मा गाँधी पर केंद्रित दो ग़ज़लें*
-डा. वेद मित्र शुक्ल
सहायक प्रोफ़ेसर, अंग्रेजी विभाग
राजधानी महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय
राजा गार्डेन, नई दिल्ली – 110015
मोब.: 9599798727
(1)
खुद को ही जिसने होम किया उसका तो जीवन यज्ञ रहा,
अंतिम जन को जो जान गया सच में वह इक सर्वज्ञ रहा।
अपने तो अपने ही थे पर दूजों की भी परवाह रही,
दुश्मन के अच्छे भावों को जो समझ सका मर्मज्ञ रहा।
जिसने जीवन में सत्य, अहिंसा और प्रेम को सीख लिया,
फिर कौन ज्ञान जो नहीं रहा, वह इस जग में तत्वज्ञ रहा।
जो कुछ भी है उस मालिक का फिर लेन-देन को क्यों झगड़े,
दुनियावी लाभ-हानि की चिंता को कब वह गणितज्ञ रहा।
जन-जन की सेवा को जिसने हरि की सेवा था मान लिया,
उसको जग भुला सके कैसे, युग बीते किन्तु कृतज्ञ रहा।
(2)
गाँधी जैसा बनते-बनते जिन्ना और जवाहर बनते,
बिरले ही होते हैं जो कुछ सत्ता से हो बाहर बनते।
बातें करना राजा से यों आँख दिखाकर कहाँ सरल पर,
बातें करते आँख मिला जो घोर निशा में दिनकर बनते।
दुनियादारी छोड़ विरागी और संत बनना आसां है,
पर, गाँधी सा होंगे कितने जो जग में ही रहकर बनते।
बुद्ध हुए थे या फिर गाँधी जिनकी दुनिया में तो साहिब,
लोग जरायम छोड़ा करते और अहिंसक नाहर बनते।
सोचो कुछ करने को जब भी सच्चाई इक पैमाना हो,
कहते सच तो शिव होता है औ शिव से सब सुंदर बनते।
अपने अंतरतम की सुनकर धीरे ही पर चलते कुछ तो,
क्यों लोगो के हाथों में हम बस इक बेबस मोहर बनते।