*"जन्म दुःखं जरा दुःखं जाया दुःखं पुनः पुनः ।*
*अन्तकालं महादुःखं तस्मात् जागृहि जागृहि ।।"*
--> जन्म दुःख है , वृद्धावस्था दुःखमय है , स्त्री , पुत्रादि कुटुम्बजन दुःखरुप है , और अन्तकाल भी बडा दुःखद है , इसलिए जागो - जागो । इस अंतकाल को रोज याद करो ।
,.... नित्य विचार करेँ कि यदि आज यमदूत मुझे पकडने आयेँ तो मैँ कहाँ जाऊँगा - नरक मे , स्वर्ग मेँ , बैकुण्ठ मेँ , मृत्यु का निवारण शक्य नही है , तो फिर पाप क्यो ? कई लोग बहुत समझदार बनते है । जब बाजार मे कुछ लेने जाते है तो बडी देर तक सोच विचार करते है कि किस वस्तु को लिया जाय । किन्तु जिसका विचार करने की आवश्यकता है उस पर विचार ही नहीँ करते । मृत्यु को रोज याद करेँ , मृत्यु का भय रहेगा तो पाप दूर होगा और जिस दिन पाप दूर हो जायेगा । उसी दिन मनुष्य संत बन जायेगा ।
......., पाप - पुण्य के अनेक साक्षी है - सूर्य , चन्द्रमा , धरती , वायुदेव , दोनो संध्याएँ , दिन - रात , आकाश , अग्नि , अपनी आत्मा , आदि ।
ये सभी भगवान के सेवक है जहाँ हम जायेगेँ साथ रहेगेँ । हम यह मानते है कि जो पाप हम करते है उसे कोई देखता नही ।
एकान्त कैसा भी हो किन्तु वहाँ वायु और अपनी अन्तरात्मा मेँ विद्यमान परमात्मा विराजमान रहता है ।
*"यद्यपि लोके मरणं शरणं तदपि न मुञ्चति पापाचरणम् "*
आखिर तो मनुष्य इस लोक मेँ मरण की शरण मेँ ही जाता है फिर भी वह पापाचरण छोडता नहीँ । शंकराचार्य स्वामी कहते है कि - मनुष्य यह जानता है कि एक दिन मरना है , यह सब छोडकर एक दिन जाना है , ऐसा होने पर भी वह पाप क्यो करता है ?
मुझे इसका आश्चर्य होता है ।💓