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व्यंग्य पर विचार / कमलेश पाण्डेय

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 : व्यंग्य पर कुछ विचार- 


साहित्य की अन्य विधाओं के बीच व्यंग्य वैसे ही है जैसे आभिजात्य के बीच फ़क़ीरी. या फिर एक सामान्य सी भीड़ में खडा सिड़ी-सा कोई आदमी, जो लीक से ज़रा हटके ये जांचता नज़र आये कि ये भेड़ों की कतार कहाँ और क्यों कर जा रही हैं. मज़ा ये है की अन्य विधाएं यानि कविता, कहानी जो व्यंग्य को अलग विधा मानने से कतराते हैं, वक़्त-ज़ुरूरत अपने प्रारूप में धड़ल्ले से व्यंग्य को इस्तेमाल करते हैं. अकादमिक और सांस्थानिक तौर पर स्थापित साहित्यिक विधाओं का अपना आभिजात्य है, जो जन सरोकारों से जुड़े होने का एकाधिकार भाव से जन्म लेता है. एक विशिष्ट बौद्धिक अभिव्यक्ति होने के आत्मगौरव से लदी ये प्रवृत्ति व्यंग्य में भदेसपन देखती है और हल्का लेखन कह कर नकार देती है. इस अकारण दंभ को पोषित करते हैं एक अंधाधुंध-क़िस्म का व्यंग्य-लेखन के प्रवर्तक, जिनके तथाकथित व्यंग्य में न कोई गंभीर विचार होता है न ही साहित्य के जुरुरी लक्षण. ये महज़ हल्ला-गुल्ला किस्म की टिप्पणियां होती हैं. इन्हें व्यंग्य करार देने से बाकी विधाएं समूचे व्यंग्य साहित्य को हेय दृष्टि से देखने लगती हैं. हालांकि ये भी अत्याचार ही है, क्योंकि किस विधा में खराब लेखन नहीं होता. वस्तुतः खराब लेखन है क्या, ये एक समुचित लोकतांत्रिक आलोचना तंत्र के बिना तय करने का अधिकार किसको मिल गया?

बहरहाल ‘व्यंग्य’ जिसे हम आज एक विधा मानने की जिद के तहत कहते हैं, आमतौर पर एक शब्द-सीमा में कैद, तात्कालिकता के बोझ से भारी एक निबंधात्मक अभिव्यक्ति है. उधर ख़ास तौर पर, बल्कि कहें कि सही तौर पर ये परसाई, शुक्ल, जोशी, त्यागी और ज्ञान की परम्परा से चलता आ रहा एक विशिष्ट किस्म का लेखन है जिसमें सूक्ष्म पर्यवेक्षण, गहन चिंतन और शैलीगत विलक्षणताएं मौजूद होती हैं. सच्चा व्यंग्य वैचारिक गहराई और शाश्वत मूल्यों से जुड़ाव के जरिये समाज के परम्परागत श्रेष्ठ मूल्यों को प्रतिस्थापित करने के इरादे से सामयिक प्रवृत्तियों में छुपे विपर्यय का विश्लेषण करता है. इस लिहाज से व्यंग्य कठिनतम विधा है जो अपने उद्गम में करुणा छुपाये रहता है पर सतह पर कटाक्ष, हास्य और विट-संगत अभिव्यक्ति ही रखता है ताकि सम्प्रेषण सहज हो. आज विडंबनाओं के अम्बार से दबे समाज में व्यंग्य इसीलिए एक जनप्रिय अभिव्यक्ति है, बल्कि एक सामान्य वृत्ति हो चली है. सोशल मीडिया में तो व्यंग्य की अद्भुत अभिव्यक्तियाँ देखने में आ रही हैं जिनमें उत्कृष्ट वन लाइनर, कार्टून, सामयिक मुद्दों पर व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ और प्रयोगात्मक आलेख सब शामिल हैं. ये लाखों की संख्या में पढ़े और साझा किये जा रहे हैं. इन प्लेटफार्मों पर सक्रिय कोई भी व्यक्ति जान सकता है कि अन्य विधाओं के मुकाबले व्यंग्यात्मक आलेखों को पसंद करने वाले अधिक हैं. खैर, यहाँ विधा की चर्चा है तो वही प्रामणिक व्यंग्य बहस मंफ आयेगा जो परंपरा के हवाले से ऊपर विश्लेषित हुआ है. 


व्यंग्य है ही नए सवालों से जूझने की कोशिश. देश और समाज में निरंतरता से चलती आ रही परम्पराओं और मूल्यों में जो विपर्यय होता है, अच्छा या बुरा ये तो समय तय करता है, पर जीवन- चर्या में इस ‘नए हस्तक्षेप’ को साहित्य की सभी विधाएं अपने-अपने अंदाज़ में दर्ज़ करती हैं. व्यंग्य में देखने का कोण चूंकि कुछ आड़ा-तिरछा होता है, यहाँ इन विसंगतियों को खुरच-खुरच कर उजागर किया जाता है. व्यंग्य में इसलिए नए विषयों की बहुतायत लाजिमी है. प्रश्न इतना भर है कि क्या उन्हें नये ढंग से बरता भी गया है या महज किसी नई घटना पर टिप्पणी कर के छोड़ दिया गया है. क्या नई प्रवृत्तियों की प्रभावी पकड़ की गई है, या महज सतही तौर पर रेखांकित कर छोड़ दिया गया. अफसोस की बात है कि मुझे इस दौर का व्यंग्य कुछ जियादा ही सामयिक और अधिकांशतः टिप्पणी-केन्द्रित है. प्रवृत्तियों के रेखांकन पर अधिक तवज्जो नहीं दी जा रही. शायद मेहनत कम की जा रही है, या फिर नई प्रवृत्तियों में दुरुहता अधिक है, या शायद दोनों ही तथ्य एक साथ प्रभावी हैं. नये समय से तात्पर्य केवल समाचारों(ट्रेंडिंग?) और उसपर सोशल मीडिया में चली बहसों से लिया जा रहा है. कई बार तो व्हाट्सएप के चुटकुलों से प्रेरणा ली जाती है जो वैसे तो बुरी बात नहीं, पर चुटकुले को ही व्यंग्य की चादर उढ़ा देने के हास्यास्पद प्रयास निंदनीय हैं. यहाँ सामयिकता नितांत तात्कालिकता में ढल जाती है और सार्थक कुछ भी नहीं होता. कालजयी होने का दावा व्यंग्य यों भी नहीं करता पर ईमानदारी से सामयिक तो हो? अपने वक़्त की नब्ज़ थामकर कुछ धडकनें समझने से पहले रचनाकार से कड़ी तैयारी अपेक्षित है, जो इस दौर के कम ही व्यंग्यकारों में दिखती है. 


चर्चा का एक मुद्दा अति-प्रकाशन से सम्बद्ध है, जिसका अभिप्राय बहुत स्पष्ट नहीं है. व्यंग्य को अपने कालमों के जरिये प्रश्रय देने वाली अधिकाँश पत्रिकाओं का अवसान हो रहा है. जो हैं, उनमें साल में इक्का-दुक्का मौके ही मिलते हैं. अति-प्रकाशन की गुंजाईश या तो छपी किताबों में है, अखबारों के सिकुड़ते कालमों में है या फिर इन्टरनेट के विशाल कैनवास पर, जिसपर हर व्यक्ति के निजी और सबके साझा स्पेस भी हैं. अखबारों के 250-650 शब्द सीमा में छपा आइटम व्यंग्य ही है तभी इस विमर्श में शामिल होना चाहिए. पर शायद अधिकांशतः नहीं है. उधर इन्टरनेट पर व्यंग्य की विविधा फैली पड़ी है. नई-नई शैलियाँ, फार्मेट, भाषाई प्रयोग और चमत्कारी अभिव्यक्तियाँ देखने को मिलती हैं, वह भी तुरंत-फुरंत पाठकीय प्रतिक्रिया के साथ. इसके विस्तार को देखकर कई बार कहने को जी करता है बाज़ार के नियमों के तर्ज़ पर सबकुछ निर्बाध ही छोड़ देना ठीक है. वैसे भी इन बंधनों को मानता कौन है? रचनाशीलता कोई सीमा नहीं जानती. हालांकि इसके विपक्ष में तर्क है कि साहित्यिक अराजकता ऎसी ही परिस्थितियों से जन्म लेती है, अतिशय और अतिरेक को थामा न जाए तो अविचार (कुविचार) के रेले सामाजिक चिंतन को बहा ले जा सकते हैं. खैर ये बहस से व्यतिक्रम है, ऎसी स्थिति फिलहाल तो नहीं दिखता कि आई है. 

तब उचित यही है- विमर्श में चंद साहित्यिक स्तंभों और किताबों/संग्रहों में छपे ताज़ा व्यंग्य को ही रखें, जिन्हें समीक्षा की कसौटी से गुजारने की गुंजाईश हो. साहित्यिक पत्रिकाओं के स्तम्भ अधिकांशतः स्थापित व्यंग्यकार लिखते हैं, एक सुनिश्चित गुणवत्ता के साथ, किन्तु संग्रहों के साथ ऐसा नहीं है. इनके छपने के आधार एकदम अलहदा होते हैं. ज़ाहिर है, गुणवत्ता के आधार या कई बार कुछ अन्य वजहों से भी चर्चा में आते, रहते या हाशिये पर चले जाते हैं. तो, कुल मिलाकर (कुल मिलाना पसंद न होने पर भी कहना पड़ रहा है) अतिप्रकाशन का प्रथमदृष्ट्या मामला अखबारी लेखों पर ही बनता है. उन्हीं को आगे सोशल मीडिया पर भी वाह-वाह सम्प्रदाय के पाठकों के आगे परोसा भी जाता है. और ये मामला वाकई गंभीर है. लाभ यदि रचनाओं के गठ्ठर तैयार करने में है तो ये लाभ है, पर मुझे लगता है ये ख़राब मुद्रा द्वारा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देने जैसा मामला है. सारा खराब लेखन हाशिये पर ही नहीं जाता बल्कि कुछ हिस्सा फफूंद की तरह साहित्य की ज़मीन पर जमा भी रह जाता है. कुछ नहीं तो नए पाठकों को भ्रमित करता रहता है, जिनकी अभिरुचि इतनी विकसित न हुई हो कि खराब अच्छे का नीर-क्षीर कर सके. मेरी राय में ये भी ज़ुरूरी है ऐसे खराब लेखन को पहचान कर उसके व्यंग्य कहलाने के दावे को खारिज किया जाय. उसे व्यंग्य साहित्य के फलते-फूलते वृक्ष पर अमरबेल की तरह लिपटने न दिया जाए. इनकी पहचान कैसे हो ये लोकतांत्रिक ढंग से वरिष्ठ तय करें. पाठक के विवेक को रचना-पाठ तक ही सीमित मान कर चलना सुसंगत है. 


निश्चित ही हिन्दी व्यंग्य जगत में इन दिनों हलचल है. इस विराट प्रदेश के कुछ शहरों और राजधानी दिल्ली में स्थित संस्थाएं चौपाल, कार्यशाला, व्यंग्य-गोष्ठी आदि के बहाने व्यंग्यकारों का समागम करवाती रही हैं. इनमें मनोरम पर्यटन स्थलों पर आयोजित बैठकें-कार्यशालाएं भी शामिल हैं. कुछ वरिष्ठ लेखक स्कूल-कालेजों जैसी जगहों पर भी पाठकों से व्यंग्य से जुड़ा सीधा संवाद कर रहे हैं, जो कि मेरी दृष्टि में विमर्श का एक सार्थक व् प्रभावी ढंग है. बाकी आमतौर पर इन गोष्ठियों से कुछ सार्थक निकल कर आता हो इसके प्रामाणिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. एक आभासी समूहों का निरंतर चलता विमर्श भी है, जिसका व्यंग्य रचनाओं के प्रचार-प्रसार में अच्छा योगदान है. सुदूर छपने वाली अखबार-पत्रिकाओं में भी व्यंग्य के नाम पर अच्छा या बुरा क्या छाप रहा है, इसकी एक झलक मिल जाती है. पर यहाँ कुछ अच्छी बहसों पर ज़ियादातर वाहवाही का कोरस हावी रहता है. व्यंग्य या किसी भी साहित्यिक विधा की मूल चिंताओं का कोई समाधान विमर्श से निकलता हो, कहना मुश्किल है. इसपर सबका अपना नज़रिया हो सकता है. धीरे-धीरे तमाम गोष्ठियां गुटों का रूप लेने लगती हैं, यात्राओं में वही-वही लोग वही-वही दुहराते पाए जाने लगते हैं. मंच पर क्या पढ़ा जाता है, कितनी गंभीरता से पढ़ा जाता है, इस पर जो विस्तृत रिपोर्टें आती हैं, उन्हें भी कोई पढता है या नहीं, मुझे नहीं मालूम. मेरे विचार से इतनी सारी समानांतर संस्थाएं और उनके द्वारा अलग-अलग समूहों में बंटा चर्चा और विमर्श लोकतांत्रिक तौर-तरीकों से विचलित हो जाता है. नतीजे में मुद्दे भी बंट और भटक जाते हैं. बातचीत को कार्यव्यवहार में कितना अपनाया जाता है, ये भी संदेहास्पद है. इसलिए मेरी राय में व्यंग्य को अति-विमर्श की नहीं एक स्वस्थ आलोचना पद्धति की ज़रूरत है. मिल बैठना एक स्वस्थ परम्परा है, पर उस वक़्त नहीं जब एक ही मुद्दे पर अलग-अलग बैठ कर चर्चाएँ हो रही हों और विरोध के लिए विरोध किया जा रहा हो. इस सन्दर्भ में एक अखिल भारतीय व्यंग्य संघ पर भी सोचा जा सकता है जिसमें क्षेत्रीय समूहों को ईकाई बना कर राष्ट्रीय स्वरूप का हिस्सा बनाया जाय. अभी सोशल मीडिया के ग्रुप ये काम आभासी तौर पर करते नजर आ रहे हैं, पर विमर्श की उनकी एक निश्चित सीमा है. हाँ, ऐसे किसी विराट संघ में अहम् के टकरावों को नियंत्रित रखना वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए एक चुनौती ही होगी. 


राजनीति व्यंग्य के निशाने पर रहती आई है. समाज की व्यवस्थित आलोचना तो व्यंग्य है ही. वर्तमान व्यंग्य भी ये दोनों दायित्व निभा रहा है, पर अधिक ध्यान निश्चित ही राजनीति पर है. समाचार के हेडलाइन से प्रेरित व्यंग्य की यही नियति है. राजनीति पर व्यंग्य लिखना यों एक कड़ी चुनौती है. परसाई और शरद जोशी जैसे उच्च मानक सामने रखे हैं. राजनीति अपने मुखौटे भी बड़ी तेज़ी से बदलती है. सत्तर सालों में राजनीति उस मुकाम पर है जब इसकी विसंगतियां इसका चरित्र बन चुकी हैं. इसकी परतें खोलना आसान नहीं क्योंकि ये पहले ही नंगी है. इसलिए आज का राजनीतिक व्यंग्य अधिकांशतः हल्का–फुल्का टिप्पणी-जन्य, विशुद्ध पक्षधरता, व्यक्तिगत आक्षेप और मीडिया में चर्चित चुटकुलों के संवर्धित संस्करण के तौर पर रचा जा रहा है. उधर सामाजिक प्रवृत्तियों की विसंगतियों को बरतने के लिए जिस सुलझी हुई सोच, ठहराव और चिंतन की ज़ुरुरत है, वो समसामयिक व्यंग्यकारों के मिज़ाज में बसी जल्दबाजी का शिकार है. कालम में नज़र आने के लिए जल्द-बहुत जल्द लिख कर देने की मांग का अपनी आपूर्ती से संयोजन करने में लेखकीय विवेक अक्सर समझौते का शिकार हो जाता है. फिर भी बदलते सामाजिक मूल्यों, बाज़ार के दबावों और छीजते नैतिक मूल्यों पर बहुत सी सम्वेदनशील व्यंग्य रचनाएं देखने में आई हैं. इन्हें एक सम्पूर्ण परिप्रेक्ष्य देते हुए बरतने की लगातार कोशिश होनी चाहिए. व्यंग्य का सबसे बड़ा दायित्व यही है भी. वर्तमान समय में कुछ गंभीर व्यंग्यकार पूरी ईमानदारी से इस दायित्व का वहन कर रहे हैं. डा. ज्ञान चतुर्वेदी उनमें अग्रणी हैं.



युवा व्यंग्यकारों पर अलग से विचार करने के औचित्य पर विचार हो. युवा रचनाकार नहीं, रचना होती है. व्यंग्य में तो वैचारिक प्रौढ़ता अपेक्षित है, जो अनुभव, तीक्ष्ण दृष्टि, गहरी संवेदना और प्राकृत-प्रदत्त विट से आती है. ये सब किसी भी उम्र के लेखक में हो सकते हैं. फिर भी व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में जो नए लोग आये हैं उनकी प्रतिभा पर संदेह करने का कोई आधार नहीं है. मैं सिर्फ उनका ज़िक्र करूंगा जो व्यंग्य की बढ़ती लोकप्रियता से प्रेरित होकर, या महज़ व्यंग्य लिखना आसान समझ कर या करत-करत अभ्यास के तहत व्यंग्य साधना में कूद पड़े हैं. इनमें से कई नैसर्गिक प्रतिभा जन्य खूबियों से हिन्दी व्यंग्य में नए मुहावरों, भाषा-प्रयोगों और अभिनव विषयों के ज़रिये  एक नई ताज़गी भरने में लगे हैं. फिर भी ये बेहद आशाजनक स्थिति है कि उम्र के लिहाज से भी युवा लोगों में व्यंग्य के प्रति रूचि बढी है और इसके पीछे कुछ नौजवान व्यंग्यकारों की ताज़गी भरी शैली है. एक पूरी नई पीढी परम्परा से जुड़ी रहकर सार्थक व्यंग्य लेखन के प्रयास में लगी है. पर साथ-साथ व्यंग्य जगत के चक्रमों में भी उन्हें उलझता पाया जा रहा है. युवा लेखन को पुरस्कारों द्वारा उत्साहित करने के काम में कुछ ग़ैरज़ुरुरी बहसें भी खडी करते देखा गया है. ऐसे नये लेखक अखबारी कालमों में छपने और अपना संग्रह प्रकाशित करवाने में भी युवोचित जल्दबाजी दिखा रहे हैं. यहाँ बेशक अग्रणी व्यंग्यकारों की भूमिका उनके सार्थक मार्गदर्शन में है, जिसके कुछ अच्छे प्रयास सोशल मीडिया के जरिये होते दिख रहे हैं. व्यंग्य में नयेपन की मिकदार देखते हुए भविष्य को आशावाद से देखा जा सकता है. 


व्यंग्य में आलोचना की स्थिति पर कुछ कहते हुए पहले थोड़ा क्षोभ होता ही है. एक ऎसी विधा जिसे मुख्य-धारा की विधाओं का आलोचना-तंत्र लगातार उपेक्षित रखता आया, खुद अपने भीतर से एक आलोचना-तंत्र को जन्म देती तो क्या ही बढ़िया होता. कुछ प्रयास हुए भी हैं तो उनपर अलग-अलग समूहों में बंटे लेखकों ने एकांगी, पक्षपातपूर्ण और अक्षम भी होने के आक्षेप लगाए. हिन्दी व्यंग्य आलोचना में इधर एक स्वस्थ परम्परा की शुरुआत की कोशिश कुछ युवा आलोचकों ने की है. इन्हें पूरी निर्ममता से वर्तमान व्यंग्य-समय का आकलन करना होगा. विराट और बहु-आयामी व्यंग्य साहित्य के लिए उन्हें आलोचना के नए औज़ार खुद बनाने होंगे, वर्चस्ववादी सिद्धांतकारों के फतवों से बचते हुए, अव्यंग्य व् कुव्यंग्य को निरस्त करते हुए सार्थक, अभिनव और पठनीय व्यंग्य को स्थापित करने के इरादे से कड़ी मेहनत करनी होगी. इसमें व्यंग्य साहित्य को सम्मान दिलाने के इच्छुक सभी लेखक-पाठकों को सहयोग भी करना होगा. फिलहाल अभी की स्थिति पर कोई सार्थक विमर्श हो सकता है, इस पर मुझे संदेह है. 


भाषा, सम्प्रेषणीयता, सपाटबयानी आदि व्यंग्य के वे तकनीकी पहलू हैं, जिनका कोई तय प्रतिमान अब तक नहीं है. होना जुरुरी भी नहीं. व्यंग्य की अभिव्यक्ति इतनी वैविध्य और अनंत संभावनाओं से भरी है कि उसके लिए कोई संचा गढ़ा ही नहीं जा सकता. हर व्यंग्यकार अपने कथ्य के मुताबिक़ नया साँचा बनाता है. कभी एक सीधी सपाट सी दिखती रचना से भी तीखा व्यंग्य उभरता है तो कभी सजी-संवरी डिजाईनर कृति में शब्द-जाल में उलझ कर कथ्य दम तोड़ देता है. व्यंजना व्यंग्य की सबसे बड़ी ताकत है, ये निर्विवाद है. वर्तमान व्यंग्य में दो किस्म की धाराएं दिखती हैं. एक हडबडी-सम्प्रदाय के व्यंग्यकार मुद्दे के इर्द-गिर्द सम्बद्ध तथ्यों के जाल बुनकर, विषय को सीधे बरतते हुये टिप्पणी नुमा आलेख तैयार कर उसे व्यंग्य कहने की जिद करते हैं तो दूसरा प्रबुद्ध-सा सम्प्रदाय भाषाई जादूगरी से कथ्य पर आकर्षक कलई चढाता है, व्यंजनात्मक सन्दर्भों से चमत्कृत करने की कोशिश करता है. दोनों ही स्थितियों में व्यंग्य पीछे रह जाता है. पहली शैली को सपाटबयानी कहने का प्रचलन है, हालांक जुरुरी नहीं कि ऐसा लेखन हमेशा सपाट ढंग से ही बयान होता हो. दुसरे प्रकार के लेखक भी तमाम लफ्फाजियों के बावजूद सपाट-सा ही प्रभाव पैदा करते हैं. अच्छे व्यंग्य का कोई फार्मूला नहीं है. किसी विसंगति पर अपने क्षोभ-भरी प्रतिक्रिया को प्रभावी ढंग से व्यक्त करना ही व्यंग्य है. ज़ाहिर है हास्य प्रभावी होने का सबसे कारगर तरीका है. इस विषय पर भी मुझे नहीं लगता कि विमर्श से कुछ हासिल है. सपाट(या खराब) व्यंग्य अपने आप खारिज हो जाता है, किसी की जिद से वह व्यंग्य साहित्य के कबाड़खाने में पडा रहे तो रहे. आगे व्यंग्य लिखने वाले कुदरत की दी हुई तंज करने की आदत और अपने साहित्यिक संस्कारों की मदद से पाठकों के मन में दबे आक्रोशों को अपनी अभिव्यक्ति से उभाडते रहेंगे. जो सबसे नर्म और गहरे ढंग से कुरेदेगा उसका व्यंग्य सबसे सार्थक, प्रभावी और लोकप्रिय होगा.


जब तक ये कायनात रहेगी, व्यंग्य रहेगा. हम सब क्षण-क्षण इसे जीते हैं. ज़िन्दगी जितने विस्तार और उलझाव पाती जा रही है, विसंगतियां उतनी ही प्रखर होती जा रही हैं. एक दौर में जिन विषयों पर व्यंग्य सुन-पढ़ कर हम आंदोलित होते थे अब दिनचर्या बन चुकी हैं. इसलिए व्यंग्य से अपेक्षा ये है कि वो बहु-आयामी हो, सतह पर दिखती विसंगतियों की नाभि पर आघात करे, उनका पूर्ण विच्छेदन कर मवाद निकाले. व्यंग्य बेबाक हो, निर्भीक हो, निष्पक्ष हो. तीखा भी हो पर सहलाए भी. पर सबसे आगे मानवता को अंतिम सत्य मानते हुए ही किसी भी स्थिति की आलोचना में जुटे. किसी को न बख्शे, और जहां तक हो सके कोशिश करे कि सभी इसे पढ़ सकें क्योंकि वंचितों की वंचना का सच सामने लाने का दायित्व है इसपर. क्योंकि व्यंग्य ही आमजन की सबसे करीब की अभिव्यक्ति है. अपेक्षा है कि व्यंग्य समाज की हर बुरी प्रवृत्ति को सभी ढंग से गरियाता रहे.

व्यंग्य बस कबीर बना रहे.


हुत सार्थक बातें हैं कमलेश जी।🙏🏼💐b

[12b/15, 14:25] +91 94063 51567: कमलेश जी ,ने बहुत अच्छा और सार्थक विचारों के साथ तथ्यपूर्ण आलेख पटल पर रखा है।👍


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