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पिता की विरासत को थाम लिया राकेश टिकैत ने

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 भाजपा के लिए आफत बनते जा रहे राकेश टिकैत


CHARAN SINGH RAJPUT-



तीन नये किसान कानूनों को वापस कराने के लिए दिल्ली बार्डर पर चल रहे किसान आंदोलन का चेहरा बन चुके राकेश टिकैत भाजपा के लिए लगातार आफत बनते जा रहे हैं। अब राकेश टिकैत ने 26 जून आपातकाल की वर्षगांठ को लोकतंत्र बचाओ किसान बचाव दिवस मनाने का ऐलान किया है। 26 जून को किसान देशभर के सभी राजभवनों का घेराव करेंगे। देश में अघोषित आपातकाल मानते हुए किसान 26 जून को मोदी सरकार के खिलाफ फिर से हुंकार भरेंगे। मतलब जहां भाजपा 26 जून को कांग्रेस को घेरने क कोशिश करेगी वहीं उसे किसानों के आक्रोश का भी सामना करना पड़ेगा। राकेश टिकैत ने मोदी सरकार को खुली चेतावनी दे दी है कि अब सरकार से बिना शर्त बातचीत होगी।


दरअसल राकेश टिकैत विपक्ष के नेताओं के साथ लगातार संपर्क में हैं। पं. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, उत्तर प्रदेश की कांग्रेस प्रभारी प्रियंका गांधी से उनकी विभिन्न मुद्दों पर बातचीत हो रही है। वैसे भी 26 मई नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के दिन को काला दिवस मनाने के किसानों के कार्यक्रम को कांग्रेस, सपा समेत 1२ विपक्षी राजनीतिक दलों ने समर्थन देकर राकेश टिकैत का कद बढ़ा दिया था। अगले साल उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात और पंजाब में होने वाले विधानसभाचुनाव में विपक्ष किसानों के माध्यम से भाजपा को घेरने की रणनीति बना रहा है। वैसे तो किसान आंदोलन का असर पूरे देश में है पर हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में इसका असर प्रमुखता से देखा जा रहा है। प. बंगाल के विधानसभा चुनाव पर भी अप्रत्यक्ष रूप से किसान आंदोलन का असर पड़ा है। पंजाब निकाय चुनाव में तो भाजपा ने बुरी तरह से मुंह की खायी थी। ऐसे में भाजपा को यह चिंता सता रही है कि नये किसान कानूनों को लेकर यदि किसानों का आक्रोश चार राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में फूड पड़ा तो न केवल इन विधानसभा चुनाव बल्कि 2024 में होने वाले आम चुनाव में भी भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। भाजपा का विशेष रूप से उत्तर प्रदेश की चिंता सता रही है। क्योंकि राकेश टिकैत का प. उत्तर प्रदेश किसानों पर अच्छा खासा प्रभाव माना जाता है।

दरअसल उत्तर प्रदेश में योगी सरकार को बनाये रखने के लिए भाजपा को किसानों को साधना बहुत जरूरी है। विशेष रूप से प. उत्तर  प्रदेश किसानों को। प. उत्तर प्रदेश में वैसे तो खेती के पेशे से लगभग सभी जातियां जुड़ी हुई हैं पर जाट प्रमुखता से माने जाते हैं। प. उत्तर प्रदेश का किसान मतलब जाट। मौजूदा हालात में  भाजपा के लिए जाट वोटबैंक बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कभी चौधरी चरण सिंह की वजह उनके बेटे अजीत सिंह का साथ देते आ रहे जाट 2017 के विधानसभा चुनाव में मुजफ्फरनगर दंगों के चलते लामबंद होकर भाजपा के साथ आ गये थे। मौजूदा हालात में जाट नये किसान  कानूनों के विरोध में गाजीपुर बार्डर पर बैठे हैं। प. उत्तर प्रदेश के जाटों पर भाकियू का अच्छा खासा प्रभाव माना जाता है। आज की तारीख में जाटों पर राकेश टिकैत का प्रभाव माना जा रहा है। यही वजह है कि केंद्रीय मंत्री संजीव बालान को कई जगहों पर जाटों का ही विरोध झेलना पड़ा। ऐसे में राकेश टिकैत की मोदी सरकार के खिलाफ हुंकार भाजपा के लिए बड़ी परेशानी का सबब बन चुकी है।


दरअसल प. उत्तर प्रदेश में जाटों का बड़ा दबदबा माना जाता है। यह माना जाता है कि चाहे लोकसभा चुनाव हो या फिर विधानसभा चुनाव, जाट मतदाता जिधर गए उसी का बेड़ा पार हो गया। 2017 में यूपी विधानसभा चुनाव और 2019 का लोकसभा चुनाव इसका ताजा उदाहरण है। इससे भी पहले वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जाटों ने अपना जनादेश कुछ इस तरह दिया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सभी लोकसभा सीटें भारतीय जनता पार्टी के खाते में आ गईं। यह सिलसिला 2019 के लोकसभा चुनाव में भी जारी रहा। यहां पर भाजपा की एकतरफा जीत रही। सपा-बसपा और रालोद का मजबूत गठबंधन भी पिट गया। वैसे तो पूरे उत्तर प्रदेश में जाटों की आबादी 6 से 8 फीसद के आसपास है, लेकिन पश्चिमी यूपी में जाट 17 फीसद से ज्यादा हैं। खासतौर से सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बागपत, बिजनौर, गाजियाबाद, मुरादाबाद, संभल, अमरोहा, बुलंदशहर, हाथरस, अलीगढ़, नगीना, फतेहपुर सीकरी और फिरोजाबाद में जाटों की ठीकठाक आबादी है। ऐसे में आगामी यूपी विधानसभा चुनाव 2022 को लेकर सभी दलों ने जाट वोटों को लेकर सक्रियता बढ़ा दी है। जाटों को लुभाने में राकेश टिकैत को साधना मुख्य माना जा रहा है।

दरअसल, आगामी 26 जून को तीनों केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे किसानों के आंदोलन को पूरे सात महीने हो जाएंगे। 26 जून को मोदी सरकार के खिलाफ राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन भाजपा की चिंता बढ़ाने वाला है। वैसे भी गाजीपुर बॉर्डर पर चल रहे किसानों के आंदोलन पर भारतीय जनता पार्टी भी निगाह बनाए हुए है। राकेश टिकैत पर भाजपा की खास नजर है। सिर्फ उत्तर भारत के कुछ राज्यों तक सिमटे राकेश टिकैत फिलहाल किसानों के बड़े नेता के तौर पर शुमार किए जाने लगे हैं। नये किसान कानूनों को लेकर  2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को लामबंद होकर वोट करने वाले जाट 2022 के चुनाव में भाजपा के खिलाफ जा सकते हैं जो भाजपा के लिए चिंता का विषय है।

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