कहने के लिए कागज पर दो संतान हैं,एक लड़की और एक लड़का।दोनों से कोई संबंध नहीं हैं।जबकि मैंने कानूनन उनके शिक्षा,भरण-पोषण का समस्त खर्चा उनकी मां को दिया। लड़की तीस साल की है और लड़का सत्ताइस साल का।दोनों मां के गहरे असर में हैं।मां से तलाक हो गया।अदालत के आदेश के बावजूद मां ने दोनों को मुझसे कभी मिलने नहीं दिया।वस्तुत: वे मेरे जीवन में अनुपस्थित हैं।आरंभ में अकेले ही उनको छह साल तक अपने हाथों पाला पोसा ।सब बेकार गया।आप कह सकते हैं ,मैं संतान सुख से वंचित हूं।मैं आज तक नहीं जानता कि ये दोनों इन दिनों क्या कर रहे हैं और किस दशा में हैं। यह एक ठोस सच्चाई है।अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि मैं व्यवहार में संतान रहित हूं।
समाज में अधिकांश मामलों में संतान का संबंध संपत्ति का संबंध है।पति-पत्नी का संबंध संपत्ति का संबंध है।उसमें इंसानियत खोजना सही नहीं होगा। संविधान और कानून भी सामाजिक संबंधों को संपत्ति के संबंध के रुप में ही देखता है। संक्षेप में यह उस परिवार की कहानी है जो मेरा तथाकथित परिवार था। यह बेहद त्रासद स्थिति है।ईश्वर न करे अन्य कोई इस त्रासदी का शिकार हो।पहली पत्नी से उन्नीस साल की कठिन लडाई में तलाक हुआ और उसके लगाए सभी आरोप अदालत ने खारिज किए और उस पर क्रूरता का अपराध सिद्ध हुआ और तलाक हुआ।दिलचस्प बात यह कि तलाक के केस में आठ साल बाद हम दोनों की सहमति से अलीपुर सेशन कोर्ट से तलाक हो गया।बाद में वो मुकर गई और पुन: आगे अपील की तो दोबारा तलाक का केस कलकत्ता उच्च न्यायालय ने सेशन कोर्ट में पुन: सुनवाई के लिए भेज दिया।उसके बाद दस साल तक उन लोगों ने पूरे केस को घसीटा जबकि उच्च न्यायालय का आदेश था छह महीने में फैसला देने का लेकिन सेशन कोर्ट इस आदेश का पालन करने में असमर्थ रहा।अंत में दस साल लगे और पहली पत्नी पर क्रूरता के आरोप सिद्ध करने में मुझे सफलता मिली और तलाक हुआ।अदालत की कार्यवाही समय और पैसा दोनों को किस तरह नष्ट करती है यह मैंने स्वयं महसूस किया।इस क्रम में माकपा बंगाल के कुछ नेताओं और मेरे विभाग के दो प्रोफेसरों ने सबसे गंदा आचरण किया।
यह सब लिखने का आशय यह है कि शिक्षित लोगों में असभ्य और बर्बर लोग भरे पड़े हैं।यह सब भारत में मध्यवर्ग-निम्न-मध्य वर्ग के परिवार में सामान्य बात है। असभ्यता और अमानवीयता मध्यवर्ग की सबसे बड़ी संपदा है।
मैंने जब से होश संभाला, परिवार एकसिरे से दुर्लभ रहा। मैं जब बहुत छोटा था। तब ही हमारा संयुक्त परिवार टूट गया। परिवार में ताई के दबाव में बंटवारा हुआ। जिस समय बंटवारे की प्रक्रिया आरंभ हुई उस समय पूर्वमध्यमा प्रथम वर्ष यानी कक्षा नौ में पढ़ता था।यानी सन् 1970-71 के आसपास से यह सिलसिला आरंभ हुआ। परिवार के विभाजन ने अकल्पनीय तकलीफों को जन्म दिया। विभाजन के बाद एक भाई और एक बहन की मौत टायफाइड से हो गयी,सन् 1972 में हम चारों भाई-बहन को एक साथ टायफाइड हुआ,उसमें हम दो(मैं और गिरीश) बच गए जबकि रंगेश्वर और राजेश्वरी की मौत एक ही दिन और एक ही समय हुई।बहुत भयानक दृश्य था। उस दृश्य को मैं आज तक भुला नहीं पाया हूँ। रंगेश्वर की उम्र तकरीबन सात साल और बहन की उम्र पांच साल थी। दोनों बेहद सुंदर और मेधावी थे।पिता के पास हम लोगों के इलाज के लिए पैसे नहीं थे और न सामान्य मेडीकल सेंस ही था।इसके कारण टायफाइड से एक साथ और एक ही समय पर दो बच्चों की मौत हुई,दोनों को पिता एक-एक करके सफेद कपड़े में लपेटकर यमुना में बहाकर चला आए। लंबे समय तक पूरा परिवार रंगेश्वर और राजेश्वरी के दुख में डूबा रहा। किसी को न खाना अच्छा लगता था और न किसी से बात करना ही अच्छा लगता था। सबसे त्रासद पहलू यह था कि हमारे परिवार की उस दुख की घड़ी में किसी ने मदद नहीं की।
इस घटना ने सबसे बड़ी समझ यह दी कि दुख निजी होते हैं, दुख को समझना चाहिए और दुख समझकर ही दुख झेलने की शक्ति पैदा होती है। कहने के लिए हम लोगों के समर्थ नातेदार-रिश्तेदार थे। लेकिन हमलोगों के लिए उस दुख की घड़ी में उनका कोई सामाजिक मूल्य नहीं था। जीवन में दुख का एक अन्य बड़ा कारण तो स्वयं पिता का स्वभाव था,वे विद्वान थे,साथ ही गुस्सैल भी थे,बेहद ईमानदार और सच्चे थे, वे मंदिर की आमदनी पर निर्भर थे और बंटबारे में मंदिर का भी बंटबारा हो गया। इससे सबसे अधिक नुकसान पिता को हुआ। क्योंकि वे अन्यत्र जाकर कोई नौकरी करना नहीं चाहते थे, परंपरागत यजमानी वृत्ति उनके स्वभाव से मेल नहीं खाती थी, फिर भी उन्होंने मजबूरी में घर-घर जाकर यजमानों के यहां अपनी सालाना दक्षिणा वसूली ,यह मध्यकालीन भिक्षावृत्ति का ही एक रूप है। पिताजी ने यह काम चार-पांच साल किया, बाद में मेरे कहने पर उन्होंने यह काम बंद कर दिया।
लंबे समय तक परिवार में आय का कोई निश्चित स्रोत नहीं था, पिता पंडिताई कराते थे और उससे इस तरह की आय नहीं होती थी कि परिवार का ठीक से लालन-पालन हो सके।पूरा परिवार आकाशीवृत्ति पर पल रहा था। मैं जब उत्तरमध्यमा के द्वितीय वर्ष यानी इण्टरमीडिएट में परीक्षा देने वाला था,उसी साल माँ गर्भवती हो गयी, सन् 1974 के मई महिने में उसने आठ महिने के एक पुत्र को जन्म दिया ,जो देखने में बहुत ही सुंदर था,लेकिन मात्र छह दिन में मर गया। उस दौर की समूची घटनाएं आज भी मन को खराब कर देती हैं। मेरी शाम को वृन्दावन में परीक्षा थी, वहां पर परीक्षा केन्द्र था रंगजी मंदिर संचालित संस्कृत पाठशाला में।अपराह्न तीन से शाम 6 बजे तक परीक्षा होती थी। घर में पिता नहीं थे, वे शहर के बाहर किसी यजमान के यहां कलकत्ता जनेऊ या शादी कराने गए हुए थे। मैं उस समय 17 साल का था, जानता नहीं था कि माँ को प्रसव अवस्था में कहां ले जाऊं.कोई मदद के लिए पास नहीं था, मैं माँ को रिक्शा में बिठाकर सीधे मथुरा जिला अस्पताल ले गया,वहां जनाने अस्पताल में भर्ती करने के बाद पता चला कि माँ बहुत कमजोर है, बच्चा पैदा करने के क्रम में मर भी सकती है।बच्चा आठ माह का है। डाक्टरों ने सुझाव दिया कि आगरा ले जाओ,मैंने असमर्थता व्यक्त की कि और कहा कि मेरे पास तो आगरा ले जाने के पैसे नहीं हैं। यह सब कुछ घट रहा था सुबह 6बजे करीब और मेरे पास मात्र डेढ़ सौ रूपये थे, मैंने नर्स से हाथ जोड़कर कहा कि किसी तरह माँ को यहां पर रखकर बच्चा पैदा करें, मैं यथाशक्ति आप लोगों को पैसे दूँगा। अंत में वही हुआ माँ को वहीं पुत्र हुआ, मैं खुश था कि माँ स्वस्थ है, मेरा भाई भी स्वस्थ था,कुछ देर बाद मैं परेशान हुआ कि माँ को क्या खाना खिलाएं, क्योंकि मैं खाना बनाना नहीं जानता था। अंत में किसी तरह मैं दुकान से जाकर दूध,काजू और पूड़ी लाकर माँ को दे आया।और बोलकर आया कि मैं अब दूसरे दिन सुबह ही आ पाऊंगा। क्योंकि मुझे दोपहर परीक्षा देने वृन्दावन जाना था, संस्कृत की परीक्षाएं प्रतिदिन होती थीं, पांच दिन में पांच पेपर की परीक्षाएं हुईं। दोपहर बाद मेरी नानी ने माँ की जाकर खबर ली और उससे मुझे थोड़ी राहत मिली, लेकिन मेरी समस्या ज्यों की त्यों बनी रही। मैं तीन दिन तक माँ को दुकान से खरीदकर खाना दे आता था, वह सारा दिन वही खाती थी। चौथे दिन मैं उसे घर ले आया, अब नई मुसीबत सामने आई,माँ के दूध निकलना बंद हो गया, घर में पता नहीं क्या घटा कि छठे दिन ही मेरे भाई की मौत हो गयी। इस मौत ने मेरी माँ को पूरी तरह तोड़ दिया, उसके बाद वह लगातार अस्वस्थ रहने लगी। उसे पहले टीवी हुई,बाद में और भी कई बीमारियां हुईं और अंत में 20 मई 1976 को माँ की मृत्यु हो गई।मौत और गरीबी का यह अटूट सिलसिला देखते हुए पिता मानसिक तौर पर टूट गए, लंबे समय तक मानसिक तनाव में रहे, मानसिक तनाव से दूर रहने के लिए भांग लेने लगे। भांग ने उनको मानसिक राहत दी, लेकिन गरीबी और उससे जुड़े कष्टों ने परिवार का पीछा नहीं छोड़ा।इसी दौरान पैतृक संपत्ति के विवादों ने मुकदमेबाजी के अंतहीन सिलसिले ने परिवार के संभलने की संभावनाओं को हमेशा के लिए खत्म कर दिया। जिन लोगों ने हमारी पैतृक संपत्ति पर अवैध कब्जा जमाया हुआ था, वे मथुरा शहर के ताकतवर लोग थे ।जातिगत लामबंदी के कारण सनाढ्य ब्राह्मणों का एक बड़ा वर्ग उनके साथ था। इस क्रम में जाति द्वेष और कांग्रेस शासन में ,बाद में आपातकाल के दौरान पुलिस के बेशुमार जुल्म और झूठे मुकदमों को पिता ने झेला, उनको अकारण कईबार पुलिस पकड़कर ले गई,जमानती न मिल पाने के कारण उनको एकबार एक रात मथुरा जेल में भी गुजारनी पड़ी।यह आपातकाल का दौर था। मुकदमेबाजी के कारण सभी नाते-रिश्तेदार और भी दूर रहने लगे।
गरीबी,बीमारियां,मुकदमेबाजी और अर्थाभाव ने मिलकर एक विलक्षण परिवेश निर्मित किया था, जो निरंतर अभाव का अहसास कराता था। सामाजिक,मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक अभाव की कभी खत्म न होने वाली संभावनाओं को उसने पैदा किया।मेरे साथ के सभी लड़के बेहतर स्कूल-कॉलेजों में पढ़ते थे, सबके पास परिवार था,माँ थी, और परिवार का सामान्य सुख था, लेकिन मेरे पास न तो माँ थी और न परिवार का सामान्य सुख था।संक्षेप में इस वृत्तान्त को कहने का आशय यह कि परिवार के बिना मैं साठ साल तक कैसे जी सका,यह मेरे लिए आज भी सबसे जटिल सवाल बना हुआ है। चाहकर भी परिवार न बना पाना, बने-बनाए परिवार का नष्ट हो जाना, परिवार में लगातार करीबी परिवारीजनों की मृत्यु के सिलसिले का बना रहना,ये सब चीजें मिलकर एक ही सवाल खड़ा करती हैं आखिर हम जीते क्यों हैं ॽ परिवार के लिए जीते हैं या समाज के लिए ॽ
मेरा अनुभव यही बताता है कि मनुष्य बेहतर तब ही जी सकता है जब वह समाज के लिए जीने की कोशिश करे।व्यक्ति परिवार के लिए जीकर सीमित क्षेत्र में अपनी ऊर्जा खर्च करता है, लेकिन बृहत्तर समाज के लिए जीकर वह समूचे समाज को अपनी शक्ति का लाभ देता है। हमें परिवार के मोह से दूर रहकर परिवार और समाज के बीच में शक्ति-संतुलन बिठाने की कोशिश करनी चाहिए। परिवार की बजाय समाज के प्रति मोह पैदा करने की कोशिश करनी चाहिए। परिवार का मोह व्यक्ति की शक्ति को सीमित करता है या नष्ट करता है। समाज का मोह व्यक्ति की शक्तियों को सामाजिक विकास और सांस्कृतिक विकास के कामों में लगाता है और उनका विकास करता है।
बचपन में आठसाल का ही था तब मेरा जनेऊ हो गया, बाकायदा गायत्री मंत्र की दीक्षा के साथ बाला-भुवनेश्वरी की दीक्षा भी श्रीजी गद्दी के आचार्य और हमारे कुलगुरू स्व. कामेश्वरनाथ चतुर्वेदी जी के जरिए दिलाई गयी। पिता स्वयं तंत्रशास्त्र और वेदों के विद्वान थे अतःउनकी दिली इच्छा थी कि मैं शक्ति का उपासक बनूँ और बढ़िया ज्योतिषी भी बनूं, इसलिए बचपन से ही ,कक्षा पांच पास करने के बाद उन्होंने माथुर चतुर्वेद संस्कृत महाविद्यालय में दाखिला दिला दिया जहां से मैंने प्रथमा से सिद्धांत ज्यौतिषाचार्य पर्यंत तक की डिग्रियां हासिल कीं।
लंबे समय तक मैं अपने ग्रहों को अपने जीवन के दुखों का कारक मानता रहा, लेकिन बुद्धि विकास ने मुझे यह समझ दी कि मेरे दुखों के कारक ग्रह नहीं बल्कि जीवन की भौतिक-आध्यात्मिक परिस्थितियां हैं। फिर भी जब भी कोई बड़ा दुख घटता तो जन्मकुंडली लेकर बैठ जाता और अपने मन को संतुष्ट कर लेता कि फलां मौत इसलिए हुई, फलां दुख इसकी वजह से आया,माँ की मृत्यु ने मेरे अंदर संशय पहलीबार पैदा किया, जन्मकुंडली आदि से पैदा होने वाले या आध्यात्मिक निष्कर्षों को मैं संशय के नजरिए से देखने लगा। मैंने उस समय तक मार्क्सवाद का नाम तक न सुना था, मैं परंपरागत संस्कृत साहित्य ही पढ़ता था, लेकिन मन में संशय के पैदा होने के कारण नई हलचल ने जन्म लिया, जीवन को भिन्न नजरिए से,भौतिक नजरिए से देखने की प्रक्रिया का जन्म हुआ।मैं ईश्वर की पूजा करता था,साथ ही ईश्वर से जुड़े सभी तर्कों को संशय की नजर से देखने लगा। मैंने अपने जीवन का बहुत ही मूल्यवान समय शक्ति की उपासना में खर्च किया है लेकिन मुझे कोई सुख नहीं मिला। महात्रिपुरसुंदरी यंत्र की कई घंटे पूरे विधि-विधान के साथ पूजा करता रहा, लेकिन परिवार के निरंतर क्षय को नहीं रोक पाया। परिवार का क्षय,माँ की मृत्यु,भाई-बहन की मृत्यु,भयानक गरीबी आदि को उपासना के जरिए नहीं रोक पाया। मैं नहीं जानता,पूजा निष्फल थी या उसके पीछे भौतिक कारण थे, आज पलटकर देखता हूँ तो पाता हूं परिवार क्षय का प्रधान कारण था अर्थाभाव, वैज्ञानिक बुद्धि-विवेक का अभाव और आधुनिक ढ़ंग से न जी पाने की पिता की अवस्था, इस सबने मिलकर पारिवारिक त्रासदियों को जन्म दिया। भगवान और ग्रहों का पारिवारिक त्रासदियों के साथ कोई संबंध नहीं था।
सामाजिक जीवन को ग्रह नहीं चलाते, भगवान नहीं चलाते,बल्कि मनुष्य और उसके कर्म ही चलाते हैं।भगवान तो हमारे मन को समझाने का एक उपाय मात्र है। जब हम किसी समस्या के सही कारण नहीं खोज पाते तो समस्या को ईश्वर और ग्रहों के हवाले करके अपने मन को तसल्ली देने लगते हैं। भगवान तो तसल्ली का नाम है!