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चंबल की प्रेम कहानियाँ / रिजवान चंचल

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 अब नहीं सुनाई पड़ती दस्‍यु सुन्‍दरियों के चूडि़यों की खनखनाहट : पंचायत चुनाव के लिए किसी ने नहीं जारी किया फतवा : चंबल आजकल सन्नाटे में है, कल तक बीहड़ो में दस्यु सुंदरियों के सौतिया डाह के चलते जहां चूड़ियों की खनखनाहट और गोलियों की तड़तड़ाहट आम बात थी, आज वहां सन्नाटा पसरा है। न ही इस बार पंचायती चुनाव में किसी दस्यु का फतवा जारी हुआ है और न ही कोई पाती किसी को डकैतों द्वारा भेजी गई है। ज्ञात हो कि उत्‍तर प्रदेश एवं मध्‍य प्रदेश के ज्यादातर दस्यु गिरोहों के खात्में के चलते पहली बार ऐसा देखने को मिल रहा है कि पंचायती चुनाव चाहे वह बुंदेलखण्ड हो या इटावा, भिण्ड-मुरैना, कहीं भी इस बार दस्युओं का खौफ, जो ग्रामीण मतदाताओं के सिर चढ़ बोलता था, नजर नही आ रहा है. बल्कि ग्रामीण जब चर्चा छेड़ते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि स्थितियां चाहे जो भी रहीं हों, किन्तु कई दस्यु ऐसे रहे जिन्हें आज भी लोग डकैत नही बल्कि बागी कहना ज्‍यादा अच्छा मानते हैं.

बुजुर्ग ग्रामीणों के मुताबिक चंबल घाटी के डाकुओं के भी अपने आदर्श और सिंद्धांत हुआ करते थे. अमीरों को लूटना और गरीबों की मदद करना यहां के डाकुओं का शगल हुआ करता था. अन्याय और शोषण के खिलाफ विद्रोह करने वाले ये लोग पुलिस की फाइलों में भले ही “डाकू” के नाम से जाने जाते हों, लेकिन यहां के लोग उन्हें सम्मान से “बागी” कहते हैं. बागी यानी अन्याय के खिलाफत बगावत करने वाला… मानसिंह और मलखान सिंह जैसे दस्यु सरगनाओं की गौरव गाथाएं और आदर्श की मिसाल यहां के बच्चे-बच्चे के मुंह से सुनाई देती है. चंबल के पुरानी पीढ़ी के डाकू महिलाओं का बहुत सम्मान करते थे. डाकू डकैती के समय महिलाओं को हाथ नहीं लगाते थे. महिलाओं का मंगलसूत्र डाकू कभी नहीं लूटते थे. अगर डकैती वाले घर में बहन-बेटी आ रुकी है तो इज्जत पर हाथ डालने की बात तो दूर, डाकू उनके गहनों तक को हाथ नहीं लगाया करते थे.

पहली और दूसरी पीढ़ी के डाकू इस सिद्धांत और आदर्श को मानते थे. तब गिरोह में किसी महिला सदस्य का प्रवेश वर्जित था. लेकिन तीसरी पीढ़ी के डाकुओं ने अपने आदर्श बदल लिए. चंबल के बीहड़ों में लंबे समय तक कार्यरत रहे एक पूर्व पुलिस अधिकारी के मुताबिक “तीसरी पीढ़ी के डाकुओं ने न केवल महिलाओं पर बुरी नजर डालनी शुरु की, बल्कि उन्हें अपह्रृत कर बीहड़ में भी लाने लगे. अस्सी और नब्बे के दशक में जितनी महिला डकैत हुई, उनमें से ज्यादातर का डाकू गिरोह के सरदार द्वारा अपहरण किया गया था.” चंबल घाटी के इतिहास में पुतलीबाई का नाम पहली महिला डकैत के रूप में दर्ज है. बीहडों में पुतलीबाई का नाम एक बहादुर और आदर्शवादी महिला डकैत के रूप में सम्मानपूर्वक लिया जाता है.

गरीब मुस्लिम परिवार में जन्मी गौहरबानों को परिवार का पेट पालने के लिए नृत्यांगना बनना पड़ा. इस पेशे ने उसे नया नाम दिया-पुतलीबाई. शादी-ब्याह और खुशी के मौकों पर नाचने-गाने वाली खूबसूरत पुतलीबाई पर सुल्ताना डाकू की नजर पड़ी और वह उसे जबरन गिरोह के मनोरंजन के लिए नृत्य करने के लिए अपने पास बुलाने लगा. डाकू सुल्ताना का पुतलीबाई से मेलजोल बढ़ता गया और दोनों में प्रेम हो गया. इसके बाद पुतलीबाई अपना घर बार छोड़ कर सुल्ताना के साथ बीहड़ों में रहने लगी. पुलिस इनकाउंटर में सुल्ताना के मारे जाने के बाद पुतलाबाई गिरोह की सरदार बनी और 1950 से 1956 तक बीहड़ों में उसका जबरदस्त आतंक रहा. पुतलीबाई पहली ऐसी महिला डकैत थी, जिसने गिरोह के सरदार के रूप में सबसे ज्यादा पुलिस से मुठभेड़ की.

बताया जाता है कि एक पुलिस मुठभेड़ में गोली लगने से पुतलीबाई को अपना एक हाथ भी गंवाना पड़ा था. बावजूद इसके उसकी गोली चलाने की तीव्रता में कोई कमी नहीं आई. छोटे कद की दुबली-पतली फुर्तीली पुतलीबाई एक हाथ से ही राइफल चला कर दुश्मनों के दांत खट्टे कर देती थी. सुल्ताना की मौत के बाद गिरोह के कई सदस्यों ने उससे शादी का प्रस्ताव रखा लेकिन सुल्ताना के प्रेम में दीवानी पुतलीबाई ने सबको इनकार कर काटों की राह चुनी. कभी चंबल के बीहड़ों में आतंक के पर्याय रह चुके पूर्व दस्यु सरगना मलखान सिंह पुतलीबाई के साहस और सुल्ताना के प्रति समर्पण भावना की प्रशंसा करते नहीं थकते. पुतलीबाई के साहस की मिसाल देते हुए मलखान सिंह कहते हैं “वह ‘मर्द’ थी और मुठभेड़ में जमकर पुलिस का मुकाबला करती थी. बीहड़ में अपनी निडरता और साहस के लिए जानी जाने वाली डाकू पुतलीबाई 23 जनवरी, 1956 को शिवपुरी के जंगलों में पुलिस इनकांउटर में मार दी गई थी.

पुतलीबाई के बाद कुसमा नाइन को खूंखार दस्यु सुंदरी के रूप में जाना जाता है. 90 के दशक में चंबल के बीहड़ों में कुसमा ने अपने आतंक का डंका बजा रखा था. दस्यु सरगना रामआसरे उर्फ फक्कड़ के साथ रही कुसमा ने आखिर तक फक्कड़ का साथ नहीं छोड़ा. कुसमा उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के टिकरी गांव की रहने वाली है. विक्रम मल्लाह गिरोह का माधो सिंह कुसमा को उठा कर अपने साथ बीहड़ में ले गया था. यह बात 1978 की है. बाद में गिरोह बंटने पर कुसमा नाइन कुछ दिनों लालाराम गिरोह में भी रही किन्तु सीमा परिहार से लालाराम के निकटता के चलते वह राम आसरे उर्फ फक्कड़ के साथ जुड़ गई। करीब दस साल फक्कड के साथ बीहड़ों में बिताने के बाद 8 जून, 2004 को भिंड में मध्य प्रदेश पुलिस के सामने उसने आत्म समर्पण कर दिया, फिलहाल दोनों जेल में हैं. कुसमा फक्कड़ को इस कदर प्रेम करती थी कि जब 2003-04 में फक्कड़ बुरी तरह बीमार था और बंदूक उठाने में असमर्थ था, तब कुसमा न केवल उसकी सेवा करती थी, बल्कि साये की तरह हमेशा उसके साथ रहती थी. इस दौरान कई मुठभेड़ में वह फक्कड़ को पुलिस से बचाकर भी कई बार सुरक्षित स्थान पर ले गई.

कुसमा फक्कड़ को लेकर जितनी कोमल थी, दुश्मनों के लिए उतनी ही निर्दयी और बर्बर. दस्यु फूलन देवी के द्वारा 14 फरवरी 1981 को किये गये बेहमई कांड, जिसमे फूलन ने एक साथ करीब 22 ठाकुरों को लाइन में खड़ा कर मौत के घाट उतार दिया था, का बदला कुसमा ने 23 मई को उत्तर प्रदेश के औरैया जिले के मईअस्ता गांव के 13 मल्लाहों को एक लाइन में खड़ा कर फूलन की तर्ज पर ही गोलियों से भून कर लिया था। इतना ही नहीं फक्कड गिरोह से गद्दारी करने वाले संतोष और राजबहादुर की चाकू से आंखें निकाल कर कुसमा ने ‘प्रेम’ के साथ-साथ ‘बर्बरता’ की भी मिसाल पेश की थी. हालांकि फूलन देवी और सीमा परिहार भी दस्यु सुंदरी के रूप में बीहड़ों में काफी चर्चित रहीं। 1976 से 1983 तक चंबल में फूलन ने राज किया और चर्चित बेहमई कांड के बाद उसने 12 फरवरी, 1983 को मध्य प्रदेश पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया.

तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की उपस्थिति में करीब 10 हजार जनता व 300 से अधिक पुलिसकर्मियों के सामने आत्मसमर्पण करने वाली फूलन ने पांच मांगें प्रमुखता से सरकार के सामने रखीं थी, जिसमें अपने भाई को सरकारी नौकरी व पिता को आवासीय प्लाट, मृत्यु दण्ड दिया जाना और 8 साल से अधिक जेल न रखना प्रमुख थीं. बाद में वह 1994 में पैरोल पर आयी तथा एकलव्‍य सेना का गठन किया. महात्मा गांधी व दुर्गा को आदर्श व पूज्य मानने वाली फूलन ने राजनीति में रुचि ली और सांसद भी बनीं. लेकिन 25 जुलाई, 2001 को दिल्ली के सरकारी निवास पर उनकी हत्या कर दी गई. सीमा परिहार के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था. दस्यु सरगना लालाराम सीमा परिहार को उठा कर बीहड़ लाया था. बाद में लालाराम ने गिरोह के एक सदस्य निर्भय गूजर से सीमा की शादी करवा दी. लेकिन दोनों जल्दी ही अलग हो गए.

सीमा परिहार के मुताबिक उसे लालाराम से प्रेम हो गया और फिर उसने लालाराम से शादी कर ली उसके एक बेटा भी है.” लेकिन 18 मई, 2000 को पुलिस मुठभेड़ में लालाराम के मारे जाने के बाद 30 नवंबर, 2000 को सीमा परिहार ने भी आत्मसमर्पण कर दिया. फिलहाल वह जमानत पर रिहा हैं और औरैया में रहते हुए राजनीति में सक्रिय हैं. फूलनदेवी के ही चुनाव क्षेत्र मिर्जापुर से लोकसभा का चुनाव लड़ चुकी सीमा परिहार फिलहाल समाजवादी पार्टी में सक्रिय हैं. इसके अलावा रज्जन गूजर के साथ रही लबली पांडेय उत्तर प्रदेश की इटावा के भरेह गांव की रहने वाली थी. सूत्र बतातें है कि 1992 में ही लबली की शादी हो गई, लेकिन पति ने उसे तलाक दे दिया. पिता की मौत और पति द्वारा ठुकराए जाने से आहत लवली की मुलाकात दस्यु सरगना रज्जन गूजर से हुई और दोनों में प्यार हो गया. रज्जन से रिश्ते को लेकर लवली को गांव वालों के भला-बुरा कहने पर रज्जन ने भरेह के ही एक मंदिर में डाकुओं की मौजूदगी में लवली से शादी कर ली.

दस्यु सुदंरी लवली के आतंक से कभी बीहड़ थर्राता था. 50 हजार की इनामी यह दस्यु सुंदरी 5, मार्च, 2000 को अपने प्रेमी रज्जन गूजर के साथ पुलिस मुठभेड़ में मारी गई. नीलम गुप्ता और श्याम जाटव की कहानी इन सबसे कुछ अलग है. श्याम जाटव को दुर्दांत डाकू निर्भय गूजर ने अपना दत्तक पुत्र घोषित किया था. औरैया की रहने वाली नीलम गुप्ता का निर्भय ने 26 जनवरी, 2004 को अपहरण कर लिया था. महिलाओं के शौकीन निर्भय ने नीलम को अपना रखैल बना लिया था. लेकिन जवान नीलम और श्याम जाटव का प्यार ऐसा परवान चढा कि दोनों ने निर्भय के खौफ के बावजूद शादी कर ली. बाद में निर्भय ने दोनों की हत्या के काफी प्रयास भी किए. निर्भय से बचने के लिए दोनों ने उत्तर प्रदेश पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. फिलहाल दोनों जेल में हैं.

इन सबके अलावा सलीम गूजर-सुरेखा, चंदन यादव-रेनू यादव, मानसिंह-भालो तिवारी, सरनाम सिंह- प्रभा कटियार, तिलक सिंह-शीला, जयसिंह गूर्जर-सुनीता बाथम और निर्भय सिंह-बंसती पांडेय की जोड़ियां बीहड़ों में काफी चर्चित रही. इनमें से सीमा परिहार और सुरेखा तथा रेनू यादव ने तो अपने प्रेमियों के निशानी के रूप में बच्चे को भी जन्म दिया है. जगन और कोमेश के “आतंक और खौफ” से कल तक जो घबराते थे, वही आज उसके “प्रेम” की चर्चा करते दिखाई देते है. दो दर्जन से ज्यादा हत्याएं करने वाला 12 लाख का इनामी खूंखार डकैत जगन गूर्जर को “प्यार” ने बदल दिया है. अब वह डकैत की तरह नहीं, बल्कि एक आम आदमी की तरह जीना चाहता है. हत्या, अपहरण, लूट और डकैती जैसे 70 से ज्यादा जघन्य अपराधों के आरोपी और 15 सालों से तीन राज्यों की पुलिस को नाकों चने चबवाने वाले दुर्दांत डाकू जगन ने पुलिस के सामने केवल इसलिए आत्मसमर्पण कर दिया ताकि वह अपनी प्रेमिका और दस्यु सुंदरी कोमेश के साथ रह सके। वह अब आम आदमी की तरह सामाजिक जीवन जीना चाहता है.

पुलिस फाइलों में इन महिला डकैतों के अपराधों के किस्से तो दर्ज हैं, लेकिन, उनके प्रेम और समर्पण की मिसाल नहीं। कई बार चंबल में दस्यु सुदरियों के बीच पनपे शौतिया डाह को लेकर भी गोलियों की तड़तडा़हट हुई. कभी सीमा परिहार को ठिकाने लगाने का मन कुसमा नाइन ने बनाया तो कभी बसंती ने नीलम को। आज चंबल में न तो दस्यु सुदरियों की चूड़िया खनकती दिखतीं हैं और न अब गोलियों की तड़तड़ाहट ही अब सुनाई पड़ती है। इस बार तो अभी तक पंचायत चुनाव में किसी दस्यु का फतवा भी जारी हुआ नही सनाई दिया है।

लेखक रिजवान चंचल रेड फाइल के संपादक और जनजागरण मीडिया मंच के महासचिव हैं.

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