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Channel: पत्रकारिता / जनसंचार
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31अक्टूबर की एक याद ऐसी भी / मनोज कुमार

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 31 अक्टूबर 1984 अभी अखबार के दफ्तर में काम शुरू हुआ ही नहीं था। सुबह के कोई 9 और 10 के बीच का वक्त होगा। टेलीप्रिंटर पर खबर फ्लैश फ्लैश होने लगी। खबर आम खबर नहीं थी। खबर देश की ही नहीं बल्कि दुनिया की उस महान राजनेता इंदिरा गांधी की थी जिन्हें उनके अंगरक्षको ने गोलियों से भून दिया था। ऐसी खबर सबसे पहले मैंने टेलीप्रिंटर पर पढ़ा। इस खबर को पढ़ते ही मैं भीतर तक हिल गया। एकाएक यकीन ही नहीं हुआ कि ऐसा भी हो सकता है। तब मैं पत्रकारिता का नया विद्यार्थी था। खबर को लेकर मैं पशोपेश में था कि किसे इसकी सूचना दूं? खबर गलत हुई तो मेरी पत्रकारिता उसी दिन समाप्त हो जानी थी लेकिन खबर नहीं बताने पर भी यही हश्र होना था। एक बात तो तय  थी कि खबर गलत नहीं हो सकती है क्योंकि यह समाचार एजेंसी की खबर थी। कुछ हिम्मत बटोर कर जैसे तैसे मैंने अपने  वरिष्ठों को इसकी सूचना दी । इसके बाद तो ऐसी हलचल  मची कि पूरा दफ्तर इसी एक खबर में डूब गया । तकरीबन हजार के आसपास हेड लाइन बनाई गई। और आखिर में एक हेड लाइन फाइनल हुई "एक और गांधी की शहादत"। पूरे देश में इस शीर्षक की सराहना हुई। मेरी पत्रकारिता के आरंभिक दिनों का यह बेमिसाल अनुभव मुझे हुआ। उस समय मैं स्कूल की पढ़ाई पूरी कर ट्रेनी जर्नलिस्ट के तौर पर सीख रहा था । आज पीछे पलट कर देखता हूं तो पत्रकारिता का पूरा फलक बदला सा नजर आता है। शुक्रिया देशबंधु जहां मुझे  सीखने, समझने और जानने का अवसर मिला । और एक मुकम्मल लेखक पत्रकार के रूप में मैं खुद को आज भी अपडेट करने की कोशिश में लगा हुआ हूं। पत्रकारिता से मीडिया एजुकेशन में यही सीखा कि लगातार सीखते जाना ही  पत्रकारिता और अध्यापन की बुनियाद है। 

आज यूं ही याद आ जाने पर अनुभव शेयर करने का मन किया।

मनोज कुमार


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