टेलीविजन पत्रकारिता के भीष्म पितामह को सादर नमन🙏🙏
विनोद दुआ आखिरकार दुनिया को अलविदा कह गए। एक बेहतरीन पत्रकार तो वो थे ही, एक शानदार इंसान भी थे, ज़िन्दगी से भरपूर। महफ़िल की शान, किस्सों की खदान और दिल से बहुत नेक, मददगार। बहुत क्रूर है यह काल जिसने पहले चिन्ना भाभीजी और फिर उनके हमसफ़र हम सब के आदर्श विनोद दुआ को असमय छीन लिया।
उनसे पहला परिचय 2002 में वरिश्ठ पत्रकार विनोद शर्मा ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के दीवाली मिलन समारोह में कराया, तब मैं क्लब का सेक्रेटरी जनरल था। परिचय के बाद विनोद शर्मा ने कहा कि मंच पर दुआ दम्पत्ति को आमंत्रित करो, बहुत बढ़िया गाते हैं। मैंने उन्हें आमन्त्रित किया। दोनों ने "इशारों-ईशारों में दिल देने वाले...,"गाया और समां बाँध दिया, वन्स मोर के शोर के बाद दोनों ने फिर गाया।
इसके बाद विनोद शर्मा के साथ ही इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में अक्सर शाम को उनसे मुलाकात होती थी। इंदौर के नमकीन को पसंद करते थे इसलिए हर बार कहते थे, "संजीव, भई स्टॉक खत्म हो गया। वो लहसुन और लौंग वाली भुजिया मंगा दो।"
एक बार मैं गोआ से लौट कर आया तो बोले "तुम वहाँ होटल में क्यों रुकते हो? मेरा घर है, एक फोन करो और जाकर रहो।"
कल से मन दुखी है। रह रह कर उनकी हँसी, बातें और किस्से याद आ रहे हैं।
ईश्वर दोनों जीवन्त पति-पत्नी को खुश रखे यही प्रार्थना है🙏💐
https://youtu.be/i4kLDN03pAo