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मॉडर्न रिव्यू के संपादक के नाम भगत औऱ बटुकेश्वर का पत्र

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 जब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने मार्डन रिव्यू के संपादक को समझाया था इंकलाब जिंदाबाद का अर्थ, पढिए -

पत्र के कुछ अंश...


भगत सिंह व चंद्रशेखर आजाद के क्रांतिकारी दल हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य थे यतींद्र नाथ दास। वर्ष 1929 में भगत सिंह, यतींद्र नाथ व उनके कई साथियों ने लाहौर जेल में राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए उपवास किया। राजनीतिक कैदियों से अर्थ उन बंदियों से है जो किसी अपराध के कारण नहीं अपितु राजनीतिक-सामाजिक बदलाव के विचारों व उन्हेंं क्रियान्वित करने के प्रयासों के कारण जेल भेजे जाते हैं। 63 दिनों के निरंतर उपवास के बाद 13 सितंबर, 1929 को यतींद्र नाथ का देहांत हो गया। उनकी अंतिम यात्रा में लाहौर में 50,000 से अधिक लोग शामिल हुए। उनके पॢथव शरीर को ट्रेन से कोलकाता ले जाया गया तो कानपुर, इलाहाबाद व विभिन्न स्टेशनों पर हजारों लोग श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे। कोलकाता में अंतिम यात्रा का नेतृत्व नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने किया था। इसमें लगभग सात लाख लोग शामिल हुए। क्रांतिकारी यतींद्र नाथ दास के बलिदान के कुछ समय बाद माडर्न रिव्यू के संपादक रामानंद चट्टोपाध्याय ने भारतीय जनता द्वारा शहीद के प्रति किए गए सम्मान और इंकलाब जिंदाबाद नारे की आलोचना की। भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने माडर्न रिव्यू के संपादक को उनके उस संपादकीय का निम्नलिखित उत्तर दिया था...


श्री संपादक जी, माडर्न रिव्यू,


आपने अपने सम्मानित पत्र के दिसंबर, 1929 के अंक में एक टिप्पणी इंकलाब जिंदाबाद शीर्षक से लिखी है और इस नारे को निरर्थक ठहराने की चेष्टा की है। आप सरीखे परिपक्व विचारक तथा अनुभवी और यशस्वी की रचना में दोष निकालना तथा उसका प्रतिवाद करना, जिसे प्रत्येक भारतीय सम्मान की दृष्टि से देखता है, हमारे लिए बड़ी धृष्टता होगी। तो भी इस प्रश्न का उत्तर देना हम अपना कर्तव्य समझते हैं कि इस नारे से हमारा क्या अभिप्राय है?


यह आवश्यक है, क्योंकि इस देश में इस समय इस नारे को सब लोगों तक पहुंचाने का कार्य हमारे हिस्से में आया है। इस नारे की रचना हमने नहीं की है। यही नारा रूस के क्रांतिकारी आंदोलन में प्रयोग किया गया है। प्रसिद्ध समाजवादी लेखक अप्टन सिंक्लेयर ने अपने उपन्यासों बोस्टन और आईल में यही नारा कुछ क्रांतिकारी पात्रों के मुख से प्रयोग कराया है। इस नारे का अर्थ क्या है? इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि सशत्र संघर्ष सदैव जारी रहे और कोई भी व्यवस्था अल्प समय के लिए भी स्थायी न रह सके। दूसरे शब्दों में देश और समाज में अराजकता फैली रहे।


दीर्घकाल से प्रयोग में आने के कारण इस नारे को एक ऐसी विशेष भावना प्राप्त हो चुकी है, जो संभव है, भाषा के नियमों एवं कोष के आधार पर इसके शब्दों से उचित तर्कसम्मत रूप में सिद्ध न हो पाए, परंतु इसके साथ ही इस नारे से उन विचारों को पृथक नहीं किया जा सकता, जो इनके साथ जुड़े हुए हैं। ऐसे समस्त नारे एक ऐसे स्वीकृत अर्थ के द्योतक हैं, जो एक सीमा तक उनमें उत्पन्न हो गए हैं तथा एक सीमा तक उनमें निहित हैं।


उदाहरण के लिए, हम यतींद्र नाथ जिंदाबाद का नारा लगाते हैं। इससे हमारा तात्पर्य यह होता है कि उनके जीवन के महान आदर्शों तथा उस अथक उत्साह को सदा-सदा के लिए बनाए रखें, जिसने इस महानतम बलिदानी को उस आदर्श के लिए अकथनीय कष्ट झेलने एवं असीम बलिदान देने की प्रेरणा दी। यह नारा लगाने से हमारी यह लालसा प्रकट होती है कि हम भी अपने आदर्शों के लिए अचूक उत्साह को अपनाएं। यही वह भावना है, जिसकी हम प्रशंसा करते हैं। इस प्रकार हमें इंकलाब शब्द का अर्थ भी कोरे शाब्दिक रूप में नहीं लगाना चाहिए। इस शब्द का उचित एवं अनुचित प्रयोग करने वाले लोगों के हितों के आधार पर इसके साथ विभिन्न अर्थ एवं विशेषताएं जोड़ी जाती हैं। क्रांतिकारी की दृष्टि में यह एक पवित्र वाक्य है। हमने इस बात को ट्रिब्युनल के सम्मुख अपने वक्तव्य में स्पष्ट करने का प्रयास किया था।


उस वक्तव्य में हमने कहा था कि क्रांति (इंकलाब) का अर्थ अनिवार्य रूप से सशस्त्र आंदोलन नहीं होता। बम और पिस्तौल कभी-कभी क्रांति को सफल बनाने के साधन मात्र हो सकते हैं। इसमें भी संदेह नहीं है कि कुछ आंदोलनों में बम एवं पिस्तौल एक महत्वपूर्ण साधन सिद्ध होते हैं, परंतु केवल इसी कारण से बम और पिस्तौल किसी भी तरह से क्रांति के पर्यायवाची नहीं हो जाते। विद्रोह को क्रांति नहीं कहा जा सकता, यद्यपि यह हो सकता है कि विद्रोह का अंतिम परिणाम क्रांति हो।


इस वाक्य में क्रांति शब्द का अर्थ प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना एवं आकांक्षा है। लोग साधारण जीवन की परंपरागत दशाओं के साथ चिपक जाते हैं और परिवर्तन के विचार मात्र से ही कांपने लगते हैं। यह अकर्मण्यता की भावना है, जिसके स्थान पर क्रांतिकारी भावना जाग्रत करने की आवश्यकता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अकर्मण्यता का वातावरण निर्मित हो जाता है और रूढ़िवादी शक्तियां मानव समाज को कुमार्ग पर ले जाती हैं।


क्रांति की इस भावना से मनुष्य जाति की आत्मा स्थायी तौर पर ओत-प्रोत रहनी चाहिए, जिससे कि रूढ़िवादी शक्तियां मानव समाज की प्रगति की दौड़ में बाधा डालने के लिए संगठित न हो सकें। यह आवश्यक है कि पुरानी व्यवस्था सदैव न रहे और वह नई व्यवस्था के लिए स्थान रिक्त करती रहे, जिससे कि आदर्श व्यवस्था संसार को बिगाड़ने से रोक सके। यह है हमारा वह अभिप्राय जिसको हृदय में रखकर हम इंकलाब जिंदाबाद का नारा ऊंचा करते हैं।


साभार - भगत सिंह, बी. के. दत्त, 22 दिसंबर, 1929 [सरदार भगत सिंह के राजनैतिक दस्तावेज़, संपादक चमनलाल व प्रकाशक नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया]


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