रवीश कुमार पर विनय शुक्ल द्वारा बनाई गई फ़िल्म आज टोरंटो फ़िल्म फ़ेस्टीवल (TIFF 2022) में जा कर देख आए। डाउन टाउन में यूनिवर्सिटी एवेन्यू स्थित scotiabank के थिएटरों में यह समारोह चल रहा था।
कई फ़िल्में एक साथ दिखाई जा रही थी। हमारी फ़िल्म आठ नंबर हाल में चल रही थी। क़रीब 500 लोगों का हाल पूरा भरा हुआ था।
फ़िल्म शाम 6.05 पर शुरू हुई और 100 मिनट की यह डाक्यूमेंट्री 7.45 पर ख़त्म हुई। बाद में फ़िल्म के निर्देशक विनय शुक्ल से सवाल जवाब हुए। विनय मुझे देखते ही अत्यंत प्रसन्न हुए और गले मिले।
फ़ोटो में मेरे साथ एक तरफ़ समीर लाल (Udan Tashtari) तो दूसरी तरफ़ विनय शुक्ल।
यह फ़िल्म अद्भुत और लाजवाब है।
आज गोदी मीडिया के दौर में सच्ची पत्रकारिता कैसे की जाती है रवीश उसकी मिसाल हैं। ट्रोल सेना उन पर मर्मांतक हमले करती है फिर भी रवीश चट्टान की तरह खड़े हैं। अपने मूल्यों और अपनी संवेदना के साथ।


रात साढ़े आठ वहाँ से चला था और 72 किमी का सफ़र तय कर 9.20 पर घर आया।
अब सुनिए पूरा वृत्तांत फ़िल्म ‘नमस्कार! मैं रवीश कुमार’ का!
कल शाम छह बजे जब हम टोरंटो डाउन टाउन के scotia बिल्डिंग में पहुँचे तब नीचे एक काफ़ी लंबी क़तार में हम भी लग गए। लेकिन हमारी फ़िल्म का समय हो रहा था इसलिए जब वहाँ खड़ी मैनेजर से बात की तो उसने सीधे ऊपर जाने दिया। ऊपर हाल नंबर आठ में हमारी फ़िल्म शुरू होने वाली थी। हाल के मुख्य दरवाज़े पर सन्नाटा था इसलिए लगा कि हाल में ज़्यादा लोग नहीं होंगे और आराम से पीछे बैठ कर फ़िल्म देखेंगे। मगर अंदर घुसे तो पाया कि हाल पूरा भरा हुआ है। कहीं कोई सीट ख़ाली नहीं और हमें सबसे आगे बैठना पड़ा। कोई 55 साल बाद इस तरह से फ़िल्म देखना मजबूरी थी।
फ़िल्म शुरू नहीं हुई थी और लाइटें जल रही थीं। एक नज़र पीछे घुमाई तो हाल में 70 प्रतिशत गोरे-गोरियाँ। कुछ चीनी, जापानी और कुछ अफ्रीकी भी। देर तक नज़र गड़ाने पर पाया नहीं कुछ हम जैसे हिंदी-पाकी भी हैं। पाँच मिनट बाद लाइट गुल और एक गोरे ने आ कर इंडिया के टीवी एंकर रवीश कुमार के बारे में बताया। कुछ विज्ञापन आए और फिर आवाज़ आई, “नमस्कार, मैं रवीश कुमार!” ऐसा लगा, कान में अमृत की बूँदें झरीं। गोरों के मुल्क में हिंदी की गूँज।
दिल्ली के ग्रेटर कैलाश स्थित NDTV का ऑफ़िस दिखा। प्रियदर्शन, निधि कुलपति, सुशील मोहापात्रा और सुशील बहुगुणा दिखे। इसके बाद शुरू हो गई फ़िल्म। यह फ़िल्म 2014 से 2019 के बीच के काल की है।
देश में एक ऐसा माहौल है, जिसमें न रोज़गार है न लोक कल्याण है न किसी को इस माहौल पर टिप्पणी करने की आज़ादी। अन्य सारे टीवी एंकर सुधीर चौधरी, अरनब गोस्वामी, अमीश देवगन एक ही राग अलापते दिखाई पड़ रहे हैं कि ज़ोर से बोलो, ‘मोदी के राष्ट्रवाद की जय। और इसका विरोध करने वाले लोगों की क्षय’! उनके सुर में सुर सड़क छाप वे लोग भी मिलाते हैं, जिनके पास रोटी तो नहीं है लेकिन बोटी तो है। बोटी मुसलमानों के ख़िलाफ़ आग उगलने की।
रोज़गार की बात करने वाले रवीश कुमार को फ़ोन पर धमकाने, माँ-बहन की गाली देने और उन्हें काट डालने जैसी बातें करने की। रवीश धमकियों की परवाह तो नहीं करते हैं न चिंतित हैं, बल्कि उनसे फ़ोन पर वे मज़े लेते हैं। एक देशभक्त को कहते हैं, कि अच्छा मुझे तुम सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा सुनाओ।
देशभक्त दूसरी लाइन नहीं बोल पाता लेकिन रवीश को गाली देने में उसकी ज़ुबान नहीं रुकती। अरबन नक्सल के नाम पर उत्पीड़न और उमर ख़ालिद की गिरफ़्तारी पर सुशील बहुगुणा और मोहापात्र कोई इनपुट नहीं दे पाते क्योंकि NDTV को कोई भी स्रोत सूचना नहीं देते लेकिन सुधीर और अरनब दे दना दन इसे राष्ट्रद्रोहियों को उनके किए की सजा बता रहे हैं।
पहलू खान और नोएडा की घटना पर सौरभ शुक्ला उन लोगों से बात करते हैं, जिन्होंने गाय का मांस घर पर रखने के जुर्म में नोएडा के इसहाक को मार देते हैं। पुलिस उन्हें बचा लेती है लेकिन सौरभ के कैमरे पर मुजरिम ख़ुद कहते हैं कि हमें अपने किए पर गर्व है। तब मजनूरन पुलिस को उन पर कार्रवाई करनी पड़ती है। एनडीटीवी के निदेशक प्रणब रॉय और उनकी पत्नी राधिका रॉय पर छापे और फिर स्टाफ़ में भविष्य के भय का ग़ज़ब का चित्रण है।
सुशील मोहापात्रा ऑफ़िस में ही योग करने लगते हैं तो स्वरालिपि छोड़ जाती है पर रवीश के समक्ष बैठ कर वह रोती भी है। सौरभ शुक्ला को आज तक से 40 पर्सेंट हाइक का न्योता आता है। मगर रवीश को वे कहते हैं- “अंत में मैंने सोचा कि पैसे से मूल्यवान है पत्रकारिता!”
पुलवामा हमले पर जब सुधीर, अरनब एवं अमीश इसे पाकिस्तान की करतूत बताते हैं तब रवीश CRPF जवानों के परिवार के साथ संवेदना ज़ाहिर कर रहे होते हैं। सर्जिकल स्ट्राइक को जब बाक़ी के TV एंकर “मोदी है तो मुमकिन है!” कहते हुए फूहड़ प्रलाप कर रहे होते हैं तब रवीश बताते हैं कि अब पुलवामा से लेकर ऊड़ी तक सब साफ़ है कि हुक्मराँ चाहते क्या हैं। अब हमें तय करना है कि 2019 में हम क्या निर्धारित करेंगे।
विवेक पर गोदी मीडिया द्वारा बनाया गया माहौल भारी पड़ता है। बीजेपी की बंपर जीत। इसके बाद रवीश को रेमन मैगसेसे पुरस्कार और उसमें रवीश का कहना कि पत्रकारिता को एक भीषण अलोकतांत्रिक माहौल में कैसे बचाई जाए। इसके बाद राष्ट्रगान और फ़िल्म समाप्त।
फ़िल्म के निर्देशक विनय शुक्ला ने अपनी इस डाक्यूमेंट्री में बहुत श्रम किया है हर छोटी-छोटी चीज पर बारीक नज़र रखी है। यह कोई बायोपिक नहीं है न किसी कल्पना के सहारे वे चले हैं। धरातल पर खड़े हो कर फ़िल्म बनाना बहुत जोखिम का काम है। इसके लिए उन्हें धन्यवाद। फ़िल्म की समाप्ति पर पाँच मिनट तक लगातार ताली बजीं। मुझे वह दृश्य याद हो आया जब एक पाकिस्तानी गायिका ने फ़ैज़ की हम देखेंगे नज़्म गाई थी तो जैसे ही उन्होंने बोला, “जब ताज़ उछाले जाएँगे, और तख़्त गिराये जाएँगे!” तो दस मिनट तक लोग तालियाँ बजाते रहे।
फ़िल्म की समाप्ति पर मैं फ़िल्म के निर्देशक विनय शुक्ला से मिला तो नाम सुनते ही वे गले मिले और बोले, जी रवीश जी ने आपके बारे में बताया था।
फ़िल्म की टिकट हमारे दोस्त और मशहूर ब्लॉगर श्री समीर लाल (Udan Tashtari) ने पहले से ही मँगा ली थीं। वे अभी 9 तारीख़ को विपश्यना योग करके लौटे थे। और शाम चार बजे घर आ गए। उनके साथ हम घर से 72 किमी दूर scotia बिल्डिंग गए। फ़िल्म देखी और सौ मिनट की फ़िल्म देख कर साढ़े आठ बजे वहाँ से चले तथा 50 मिनट की ड्राइव कर घर वापस आ गए।
रवीश कुमार-
बधाई विनय ।आपकी टीम के काम को इतना पसंद किया गया। शानदार। फ़िल्मी दुनिया को एक दमदार फ़िल्मकार मिला है। जो एक किरदार को दो साल तक केवल देखता रहा। पूरी टीम को बधाई । नम्रता जी और असीम छाबड़ा जी से प्रशस्ति पाना आसान नहीं । ये लोग अपने काम में बेहद सख़्त हैं और किसी फ़िल्मकार से ज़्यादा की उम्मीद रखते हैं। इनकी तारीफ़ आपके लिए मायने रखती है। बढ़े चलो।


संतोष सिंह-
मैं रवीश कुमार अब यह शब्द टीवी स्क्रीन से निकल कर 70 एमएम के पर्दे पर पहुंच गया है जी है आज भारतीय समयानुसार सुबह तीन बजे रवीश कुमार की पत्रकारिता जीवन पर आधारित फिल्म टोरंटो फिल्म फेस्टिवल (TIFF 2022) में रिलीज हो गया।
हिन्दी पत्रकारिता के लिए और हिन्दी माध्यम से पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों के लिए यह बेहद ही गौरव का यह क्षण है ।उम्मीद करते हैं यह फिल्म भारत के सिनेमा हांल में भी जल्द ही देखने को मिलेगा ।
वैसे हम भारतीयों की फ़ितरत में रवीश कुमार जैसे लोगों के लिए कोई जगह नहीं है क्यों कि संघर्ष ,व्यवस्था से लड़ने का स्वाभाव और सत्ता से सवाल करने की आदत हम भारतीय के स्वभाव के विपरीत है ।हमें क्रिकेट का भगवान तेंदुलकर चाहिए जो कभी अपने पूरे कैरियर में पिच पर लड़ते हुए नहीं दिखा लेकिन वो भगवान है, इसी तरह ‘सदी के महानायक’ अमिताभ को देख लीजिए फिल्म जगत में उनका क्या योगदान है।
लेकिन मेरे जैसे पत्रकारों के लिए रवीश कुमार एक चेहरा तो है जिसको देख कर बहुत कुछ सीखा जा सकता एक ऐसा व्यक्ति बिहार के छोटे से गांव से निकल कर दिल्ली पहुंचता है और चिट्ठी छाँटने की नौकरी से पत्रकारिता जीवन की शुरुआत कर इस मुकाम तक पहुंचा है वो भी अंग्रेजी पत्रकारिता के बादशाहत को तोड़ कर ।
शुक्रिया रवीश कुमार उम्मीद करते हैं ऐसे लोग जिनकी लड़ाई आप चिट्ठी छाँटने के दिन से लड़ रहे हैं वो भी फूले नहीं समा रहा होगा लेकिन वो अपनी इस खुशी को अपने पति के सामने, पिता के सामने ,भाई के सामने, परिवार और नाते रिश्तेदार के सामने खुल कर व्यक्त नहीं कर सकता है क्यों कि ये इनकी आदत में शुमार नहीं है छुप छुप कर सब कुछ करेंगे लेकिन इजहारे मोहब्बत से अभी भी बचते हैं क्यों, लोग क्या कहेंगे।
वैसे रवीश जी अब बहुत हुआ कुछ अपनी जिंदगी भी जी लीजिए क्यों कि ये ज़िन्दगी रंगमंच है यहाँ हर एक को नाटक करना पड़ता है.
“माचिस की ज़रूरत यहाँ नहीं पड़ती..
.यहाँ आदमी आदमी से जलता है…!!”
ऐसे में अब किसके लिए इतना तनाव लेनाजिसकी लड़ाई लड़ रहे है उसके पास इससे ज्यादा कुछ नहीं है बस रवीश कुमार पत्रकारिता को जिंदा रखा । छोड़िए अब इस फील्ड को अब क्या रखा है आपने दुनिया को एक शब्द दे दिया है गोदी मीडिया वो दिन दूर नहीं है जब यह शब्द ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में अंकित हो जाये ।
अब क्या चाहिए गांव से दिल्ली अम्मा जी का आर्शीवाद लेकर निकले थे, सोचे थे यहां पहुंचेगे नहीं ना तो फिर निकलिए इस मायाजाल से लौट आइए अपने उसी गांव में जहां से सफर की शुरुआत किये थे ,एक नयी मंजिल की तलाश में क्यों कि किसी ने बस इसी के लिए आपको इस जहां में भेजा है।
लड़ते रहना है गुनगुनाते रहना है सफर के डगर पर मुस्कुराते हुए चलते रहना मैं रवीश कुमार।