हैदराबाद से दूर हैदराबाद हाउस, पटेल और 'ऑपरेशन पोलो'
हैदराबाद रियासत का भारतीय संघ में विलय 17 सितंबर,1948 को हुआ। उससे पहले 'ऑपरेशन पोलो' चलाया गया। जिसके बाद हैदराबाद का निज़ाम घुटनों पर आ गया था। आपरेशन पोलो सरदार पटेल की देखरेख में चला था। वे स्वतंत्र भारत के पहले उपप्रधानमंत्री के साथ प्रथम गृह, सूचना तथा रियासत विभाग के मंत्री भी थे। बहरहाल, दिल्ली में हैदराबाद हाउस इंडिया गेट के पास सन 1929 में बन गया था।
आपको याद होगा कि अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी दिल्ली यात्रा के समय भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से हैदराबाद हाउस में ही चर्चा की थी। करीब सात एकड़ में फैले हैदराबाद हाउस को निज़ाम हैदराबाद उस्मान अली खान ने बनवाया था। ट्रंप से पहले बराक ओबामा ने भी अपनी भारत की यात्राओं के समय भारतीय नेताओँ के साथ हैदराबाद हाउस में ही मुलाकातें की। प्रधान मन्त्री नरेंद्र मोदी ने इधर ही बराक ओबामा और जापान के प्रधानमन्त्री स्वर्गीय शिन्जो अबे के लिए भोज की व्यवस्था की थी।
इसका डिजाइन नई दिल्ली के चीफ आर्किटेक्ट एडवर्ड लुटियन्स और उनके सहयोगी हरबर्ट बेकर ने मिलकर बनाया था। लुटियंस और उनके साथी प्राइवेट काम भी कर रहे थे। भारत सरकार ने हैदराबाद हाउस को सन 1948 के बाद टेकओवर कर लिया था। अब हैदराबाद हाउस में प्रधानमन्त्री की ओर से विदेशी राष्ट्राध्यक्षों, प्रधानमंत्रियों और अन्य गणमान्य मेहमानों के सम्मान में राजकीय भोज आयोजित किए जाते हैं।
यह 1991 तक आन्ध्र भवन का हिस्सा था। अब इसकी देखरेख विदेश मंत्रालय के जिम्मे है। बता दें कि राजीव गांधी और सोनिया गांधी की शादी 25 फरवरी 1968 को सुबह तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के 1 सफदरजंग रोड स्थित आवास में सम्पन्न हुई थी। उसके बाद शाम को रिसेप्शन आयोजित की गई थी हैदराबाद हाउस में। रिसेप्शन की सारी व्यवस्था श्रीमती इंदिरा गांधी के खासमखास बी के नेहरु और पी एन हक्सर देख रहे थे। उस विवाह समारोह और फिर रिसेप्शन के कार्यक्रम में अमिताभ बच्चन और अजिताभ बच्चन सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे।
सरदार पटेल, हैदराबाद और उनका घर
सरदार पटेल 1, एपीजे अब्दुल कलाम रोड ( पहले औरंगजेब रोड) पर स्थित एक निजी बंगले के एक हिस्से में रहते थे। यह बंगला था बनवारी खंडेलवाल का। वे सरदार पटेल के मित्र थे। सरदार पटेल ने इस बंगले में रहते हुए ही उन्होंने हैदराबाद रियासत में पुलिस एक्शन की रणनीति अपने सलाहकारों के साथ मिलकर बनाई थी। सरदार पटेल ने हैदराबाद रियासत में पुलिस कार्रवाई को 'ऑपरेशन पोलो' के नाम से जाना जाता है। यह 13 सितंबर, 1948 को सुबह चार बजे शुरू हुआ। इस एक्शन के बादहैदराबाद का भारत में विलय हो गया था। सरदार पटेल के साथ दिल्ली में उनकी पुत्री मणिबेन पटेल भी रहती थीं। अफसोस कि आजाद भारत के इतिहास से जुड़े इतने अहम स्थान के बाहर कोई शिलापट्ट लगाने की किसी ने कोशिश नहीं की।
हैदराबाद हाउस से निकला आंध्र भवन
यूं तो राजधानी में सभी राज्यों के अपने भवन हैं, पर आंध्र प्रदेश का भवन बनने के बाद बंटा। चूंकि आंध्र प्रदेश से निकला तेलंगाना, इसलिए इसका बंटवारा हुआ। अब आंध्र प्रदेश भवन 58 फीसद आंध्र प्रदेश सरकार के पास है और शेष 42 फीसद तेलंगाना के हिस्से में है। इंडिया गेट से सटे अशोक रोड पर स्थित आंध्र भवन की एक विशेषता ये भी है कि इसका डिजाइन एक चीनी मूल के भारतीय आर्किटेक्ट ने तैयार किया था। उनका नाम था जे.एम. बैंजमिन। आंध्र भवन के डिजाइन की जिम्मेदारी जब बैंजमिन साहब को मिली तो उनसे अपेक्षा थी कि वे इसमें सभागार, कांफ्रेंस रूम, विधायकों, तथा सांसदों के कक्ष साथ-साथ मुख्यमंत्री और राज्यपाल के सूईट, कैंटीन वगैरह के लिए भी स्पेस देंगे।
आंध्र प्रदेश भवन का निर्माण 1975 के आसपास पूरा हो गया था। आंध्र भवन परिसर लगभग 19 एकड़ में फैला है। इसकी इमारत में तीन फ्लोर बने हैं। इनमें 72 कक्ष और कुछ सूईट हैं। दरअसल हैदराबाद हाउस परिसर की एक छोटी सी इमारत से आंध्र प्रदेश भवन 1956 के बाद चलने लगा। उसी साल आंध्र प्रदेश देश के नक्शे पर आया था। उसके विस्तार की जिम्मेदारी बैंजमिन साहब को आगे चलकर मिली।
उन्होंने इधर तीन नए ब्लॉक क्रमश: गोदावरी, स्वर्णमुखी और साबरी का डिजाइन तैयार किया। इन तीनों नामों की नदियां आंध्र प्रदेश में बहती हैं। नामवर डिजाइनरों की खासियत ये होती है कि वे जिन इमारतों का डिजाइन तैयार करते हैं, उनमें वे सीढ़ियों को यूजर फ्रेंडली रखते हैं। बैंजमिन साहब सीढ़ियों को टप्पा कहते थे। उन्होंने दो सीढ़ियों के बीच बेहद मामूली अंतर रखा ताकि यहां आने वालों को इमारत के ऊपर-नीचे उतरने में कभी कठिनाई ना आए।
इस बीच,आंध्र प्रदेश भवन की कैंटीन सारी दिल्ली में जानी जाती है अपने सस्ते और स्वादिष्ट भोजन के लिए। इधर भरपेट भोजन मिलता है। एक बार बिल देने के बाद आप जितना चाहें खा सकते हैं। जाहिर है, जब कैंटीन के लिए स्पेस निकल रहा होगा तो किसी ने नहीं सोचा होगा कि आंध्र भवन की कैंटीन में रोज सैकड़ों ‘भोजन भट्ट’ पेट- पूजा के लिए आएंगे।
पटौदी दिल्ली से हैदराबाद तक
अब बात सरदार पटेल और हैदराबाद हाउस से हटकर । मंसूर अली खान पटौदी 1960 के दशक के मध्य तक दिल्ली की रणजी ट्रॉफी टीम के कप्तान थे। वे दिल्ली में कामराज मार्ग में ही रहते थे। तब उन्होंने अचानक से हैदराबाद से खेलने का फैसला किया। वे हैदराबाद की टीम से खेलते रहे। पटौदी कभी हैदराबाद के कप्तान नहीं बने। कुछ साल पहले उनके नाम पर फिरोजशाह कोटला में 'हालऑफफेम'स्थापित किया गया। पटौदी जुझारू क्रिकेटर थे। एक कार हादसे में उनकी दायीं आँख की रोशनी जाती रही थी। पर पटौदी ने हार नहीं मानी। उन्होंने एक आँख से बल्लेबाजी करते हुए टेस्ट मैचों में 6 शतक और 16 अर्धशतक ठोके।
कहा जाता है कि वे जब बल्लेबाजी करते थे तब उन्हें दो गेंदें अपनी तरफ आती हुई दिखती थीं। इन दोनों के बीच कुछ इंचों की दूरी भी रहती थी। पर पटौदी ने हमेशा उस गेंद को खेला जिसे उन्हें खेलना चाहिए था। पर उनके दिल्ली को छोड़कर हैदराबाद का रुख करने से राजधानी के बहुत से क्रिकेट प्रेमियों के दिल टूटे थे।