लो, आ गए चीते! /
आखिर नामीबिया से चीते आ गए। आ क्या गए, मीडिया से लेकर राजनीति तक सर्वत्र इस तरह छा गए कि सारा जगत चीतामय हो उठा। चीते न हुए, महाशक्ति के अवतार हो गए!
भारत तो वैसे ही उत्सवधर्मी देश है। जन्म से मृत्यु तक उत्सव ही उत्सव! मुल्क में महा उत्सव का माहौल है। अमृत महोत्सव! चीतों को क्या पता कि उन्हें पिंजरे से आज़ाद करके कूनो राष्ट्रीय उद्यान में कूदने को छोड़ने वाली विभूति कौन है! लेकिन उत्सवधर्मी मीडिया को यह समाचार विस्फोटक लगा कि वह विभूति भी अपने जीवन के अमृत महोत्सव की ओर अग्रसर है। यह कोई संयोग थोड़े ही रहा होगा कि चीते उसी दिन आए (अथवा लाए गए) जिस दिन प्रधानमंत्री महोदय की बहत्तरवीं वर्षगाँठ थी। सोच समझ कर ही तो एक उत्सव को दूसरे उत्सव से जोड़ा गया होगा! चीतों का स्वागत भी हो गया; और अनोखे अंदाज में जन्मदिन भी मन गया। गोया चीते न आए हों, चितचोर आ गए हों! सियासी घमासान छिड़ गया। प्रधानमंत्री ने कह दिया कि आजादी के बाद के तमाम वर्षों में उनके अलावा किसी की सरकार ने चीतों को लाने की नहीं सोची। विपक्ष को लगा कि यह तो उसके शानदार अतीत को कलंकित करने जैसा है। किसी ने उसके कानों में फूँक मार दी शायद कि चीता तंत्र का इस्तेमाल करके सत्तारूढ़ दल 2024 का आम चुनाव जीतने का टोटका कर रहा है। बस फिर क्या था, सारा विपक्ष मिल कर टूट पड़ा चीतों के पुनर्वास का श्रेय लेने को। यह भी कोई बात हुई कि योजना की शुरूआत कांग्रेस काल में होने के बावजूद आज सारा श्रेय वर्तमान सरकार और उसके प्रधानमंत्री लिए जा रहे हैं! सो, चीख चीख पर जनता को बताया गया कि चीतों का असली पालनहार तो विपक्ष ही है। आशा है, जनता ने सुन लिया होगा; और अगली बार वोट देते वक़्त इसका सिला ज़रूर देगी!
उधर चीते इस सारी चिल्ल पों से बेखबर नए माहौल से समझौता करने की कोशिश कर रहे होंगे। निराशा का काढ़ा पीकर मत्त हुए बैठे बहुत से सयानों को अगर यह लग रहा हो कि भारत की जलवायु में ये चीते जी नहीं पाएँगे, तो ऐसा लगने में कुछ बुराई भी नहीं। पर उन्हें समझना चाहिए कि यह एक महत्वाकांक्षी योजना है और सुदीर्घ अध्ययन और शोध के बाद ये चीते यहाँ लाए गए हैं। उनकी पूरी सार सँभाल इस तरह की जानी है कि वे खुद भी फलें फूलें और अपनी प्रजाति का इस तरह विकास करें कि भारत भी कह सके कि अब हमारे पास भी अपने चीतों की फौज है। आखिर अमृत काल में हमें विकसित देश बनना है। इसके लिए शायद चीतों का विकास भी ज़रूरी है। अगर ये सारे चीते सचमुच जीते रहे, तो हो सकता है कि विश्वगुरु बनने का रास्ता उसी उद्यान से निकले, जिसमें उन्हें बसाने के लिए कई आदिवासी परिवारों को अपने जल-जंगल-ज़मीन से बेदखल होना पड़ा होगा। है न रोचक किंतु सत्य कि अब तक पशुओं का घर उजाड़ कर मनुष्यों को बसाया जाता रहा, अब चीतों को बसाने के लिए मनुष्यों को उजाड़ना भी संभव है। उम्मीद की जानी चाहिए कि चीतों की हितैषी सरकार उन उजड़े हुओं के हितों का भी ध्यान रखेगी।
अस्तु, फिलहाल राजस्थान के चर्चित कवि अतुल कनक के शब्दों में…
तुम्हें लगता है उसके चेहरे पर धारियाँ हैं आँखों के नीचे,
मुझे लगता है वह बहुत रोया है घर छोड़ने के पहले;
किसे अच्छा लगता है भला
अपना घर, अपने लोग, अपनी धरती छोड़ते हुए?
तब तो बिल्कुल भी नहीं जब छोड़ना पड़ रहा हो सब कुछ
अपनी इच्छा के बिना! 000