अतीत के एतिहासिक झरोखों से झांकता खंडहर बनता देव का किला
सुरेश चौरसिया
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देव का प्राचीनतम इतिहास सूर्यमंदिर के बाद राजघराने से भी जुड़ा हुआ है। देव के अंतिम राजा जगनाथ सिंह के मृत्यु के साथ देव राजवंश पर ग्रहण- सा लग गया। आज देव का किला जर्जर हालत में है। जिन्हें देव किला को विरासत में दिया गया है, वे किले को संरक्षित रखने में नाकाम साबित हो रहे हैं। देव किले के अंदर का बहुत भाग खंडहर बनता जा रहा है। पूरे किले की संरक्षण हेतु आज किले का सरकारी अधिग्रहण की आवश्यकता से इंकार नहीं किया जा सकता है।
क्या देव किला को अधिग्रहण किया जाना चाहिए ?
आपकी क्या विचार है, आप राय रख सकते हैं।
बताते हैं कि देव किला का सबसे अंतिम राजा जगनाथ सिंह थे जो काफी लंबे समय तक अपने राज्य में शांति और वह प्रजा लोगो के साथ शांति के साथ राज्य का जिम्मा अपने हाथ में लेकर शासन किया। उनका कोई भी अपना संतान नहीं था।
उल्लेखनीय हैं कि देव राज के संस्थापक राजाभान सिंह मेवाड़ के उदयभान सिंह के छोटे भाई थे। कहा जाता है कि वे जग्गनाथ पुरी जा रहे थे और रास्ते में उमगा रानी के यहां ठहर। रानी के खिलाफ प्रजा ने विद्रोह कर दिया था। भान सिंह ने रानी का पक्ष लिया और विद्रोह को कुचल दिया। रानी का कोई उत्तराधिकारी नहीं था। रानी ने भान सिंह को अपना उत्तराधिकारी बना लिया। देव में उन्होंने अपनी राजधानी बनाई। देव के राजा छत्रपाल सिंह के पुत्र फतेहनारायण सिंह ने राजा चेत सिंह के खिलाफ अंग्रजों की मदद की थी। पिंडारियों से हुए युद्ध में उन्होंने कम्पनी का साथ दिया।
उनके देहांत के बाद बारी आई कि अब राज्य का जिम्मा कौन संभाले तो ये जिम्मेदारी उनकी बीवी को लेनी थी। उनकी दो पत्नियां थी जिसमे से राज्य का जिम्मा उनकी छोटी पत्नी ने संभाली। उनकी छोटी पत्नी ने अपने राज्य पर देश को स्वत्रंत होने 1947 तक किया राज किया। भारत को इंडिपेंडेंट देश बनने के बाद उस वक्त के देव राज्य के अटॉर्नी जॉर्नल मुनेश्वर सिंह ने देश में विलय ( मर्ज ) के लिए हस्ताक्षर किया था और इस तरह से देव राज्य भारत देश में विलय हो गया।