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मीडिया और रंगकर्मी राजनारायण बिसारिया नहीं रहे

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 बीबीसी हिंदी के लोकप्रिय प्रसारक और हिंदी के वरिष्ठ कवि, गीतकार, मीडिया और रंगकर्मी राजनारायण बिसारिया नहीं रहे। वे 93 वर्ष के थे और दिल का दौरा पड़ने के कारण पिछले कुछ दिनों से अस्पताल में थे। बीबीसी से सेवानिवृत्त होने के बाद बिसारिया जी दिल्ली लौट गए थे और ‘परम्परा’ नाम की साहित्यिक संस्था चलाते थे। वे छह वर्षों तक प्रसार भारती बोर्ड के मानद सदस्य भी रहे।


बीबीसी में काम करते हुए मैंने बिसारिया जी से बहुत कुछ सीखा। पत्रकारिता के अफ़रा-तफ़री के माहौल में उनकी शांत और सहज भाव से काम करने की शैली से बड़ा सुकून मिलता था। सामयिक चर्चाओं के दैनिक कार्यक्रमों के अलावा बिसारिया जी ने बरसों तक सांस्कृतिक चर्चा और बालजगत जैसे लोकप्रिय साप्ताहिक कार्यक्रम भी किए जिन पर उनकी रचनात्मकता और साहित्यिक शैली की छाप स्पष्ट दिखाई देती थी।


बिसारिया जी ने बीबीसी के पूर्व प्रसारक और उपन्यासकार जॉर्ज ऑरवेल के कालजयी व्यंग्यात्मक उपन्यास Animal Farm का रेडियो नाट्य रूपांतर ‘जानवरों का बाड़ा’ लिखा और निर्देशित किया था जिसमें काम करना एक यादगार अनुभव था। अनुभव में दशकों वरिष्ठ होने के बावजूद उनका व्यवहार बेहद दोस्ताना और गर्मजोशी भरा रहता था जिसकी वजह से हम नौसिखिए लोग भी बेतकल्लुफ़ी से काम कर लेते थे।


मध्य प्रदेश के भिण्ड शहर में जन्मे बिसारिया जी की प्रारंभिक शिक्षा गूना और मुरैना में हुई थी। ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज से हिन्दी में एम ए करने के बाद उन्होंने प्रयाग जाकर डॉ रामकुमार वर्मा के निर्देशन में शोध कार्य किया। परंतु इस बीच उनका मन दूसरी ओर मुड़ गया और शोधपत्र लिखे बिना ही वे श्रेष्ठ साहित्यकारों के बीच लेखन कार्य में जुट गये। उनके कई लेख 'आलोचना'पत्रिका में प्रकाशित हुए। 


संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आकाशवाणी में नियुक्ति के बाद उन्होंने जालंधर, जयपुर, इलाहाबाद, पोर्टब्लेयर और फिर से आकाशवाणी जयपुर में प्रोड्यूसर और कार्यक्रम अधिकारी के पदों पर काम किया। प्रशासनिक कार्य के साथ-साथ उन्होंने अपना प्रसारण और लेखन का कार्य जारी रखा। साथ ही वे कविताएँ लिखते और काव्य सम्मेलनों में भाग भी लेते रहे।


अपनी रचनाशीलता के कारण दूरदर्शन में चयनित होकर उन्होंने ऊँचे पदों की ज़िम्मेदारियों का निर्वाह किया। साथ ही 'श्री अरविन्द की सावित्री'के एक सर्ग का हिन्दी में रूपान्तरण व निर्देशन'एवं 'सुब्रह्मण्यम भारती'के गीतों का हिन्दी रूपांतरण भी किया। उनके मंचनों में 'अमृतसर सिफ़्ती दा घर'शीर्षक से किया 'ध्वनि प्रकाश'दिग्दर्शन भी शामिल है जिसे आँचलिक ही नहीं वरन राष्ट्रीय समाचार पत्रों में भी लोकप्रिय रंगकर्म का आदर्श माना गया। श्रीनगर और दिल्ली के दूरदर्शन केंद्रों के निदेशक रहने के बाद वे बीबीसी हिंदी के प्रसारक बनकर लंदन आए।


लंदन से दिल्ली लौट कर उन्होंने अपना पूरा ध्यान कविता लेखन और ‘परम्परा’ के संचालन पर लगाया। उनके दो कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। ‘कुछ देह - कुछ विदेह’ और ‘समय की रोशनी में’ जो दो खंडों में है। उनकी कविताओं को पढ़कर स्पष्ट हो जाता है उनकी रचनाशीलता का आयाम बड़ा होने के साथ-साथ वैविध्य पूर्ण भी है। उन्होंने कम लिखा है पर जो भी लिखा, सारपूर्ण लिखा है। उनकी एक लंबी कविता ‘ग्रामवधू की विदा’ पचास के दशक में लोकप्रिय हुई थी और साहित्य चर्चा का का विषय बनी थी। उसकी कुछ पंक्तियाँ आज उनकी विदाई पर बरबस याद आ रही हैं:


विदा की घड़ी है,

कि ढप ढप, ढपाढप

बहे जा रहे ढोल के स्वर पवन में

बधू सी जतन से सजाई हुई सी

लजाई हुई सी, पराई हुई सी

खड़ी है सदन में…


बिसारिया जी मूलतः एक गीतकार थे। पर उनकी चुस्त बयानी कई बार ग़ज़ल का तेवर भी अपनाती नज़र आती है। भावानुरूप उनकी कवितायें कभी गीत कभी ग़ज़ल का आकार लेती हैं। जैसे:


कुछ कहूँ मैं और तुम उत्तर न दो, 

मैं नहीं इसके लिये तैयार था। 

सिर्फ़ सम्मोहन रहा या प्यार था 

कुछ नहीं मालूम पहली बार था। 

एलबम तुम याद का मेरे लिये, 

मैं जिसे तुम पढ़ चुकी अख़बार था।.


शब्दों में मार्मिक अभिव्यक्ति उनका अतिरिक्त गुण हैं, जिसे संग्रह की तमाम कविताओं में आदि से अंत तक सुना और पहचाना जा सकता है। उनकी छोटी-छोटी कविताओं का चुटीला अंदाज बहुत मोहक है। परम्परा'की विकास यात्रा की स्मृतियों और उपलब्धियों को केन्द्र में रखते हुए बिसारिया जी ने 'परम्परा एक पड़ाव'पुस्तक का सम्पादन भी किया जो उनके सम्पादन कौशल और प्रतिभा का उत्कृष्ट उदाहरण है। अंतिम साँस तक उनके मन ने उन्हें रुकने या थकने की इजाजत नहीं दी। मन की इसी ज़िद को वे इन पंक्तियों में व्यक्त कर गए हैं:


थका-थका है पूरा तन

अभी और चलने का मन।

भले मना कर दें ये घुटने

साँस भले ही लगे टूटने

उठे भले ही एक चरण

अभी और चलने का मन।


बिसारिया जी अपनी यात्रा समाप्त करके अनंत की एक और यात्रा पर निकल गए हैं। ईश्वर पुष्पा जी और उनके परिवार को यह असह्य दुःख सहने की शक्ति दे और दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान देकर चिरशांति प्रदान करे। 

भावभीनी श्रद्धांजलि 🙏


https://www.prabhatkhabar.com/national/famous-bbc-hindi-broadcaster-rajnarayan-bisaria-passes-away-in-the-age-of-93-vwt


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