माटी से बनी शरीर कल माटी में मिल गयी।जिस तमसा के तट को उन्होंने अपनी कर्मस्थली बनाया, कल उसी तमसा की अविरल धारा में विलीन हो गयें। पंचभूतों से बनी काया पंचभूतों में मिल गयी। इधर काफी दिनों से मुलाक़ात नहीं हो पायी थी,कल जब उनके निधन की सूचना मिली तो मन में अकुलाहट होने लगी,एक जिन्दादिल और हस्सास व्यक्ति इस धरा धाम को अलविदा कह अगले यात्रा पर निकल पड़ा। सहाय जी आजमगढ़ के आकाशवाणी के संवाददाता ही नहीं थे, बल्कि एक कस्बाई नगर आजमगढ़ की पहचान भी बन गये थे। कितनी स्मृतियां और यात्राएं उनके साथ जुड़ी थीं। अपने समय के सबसे प्रभावशाली पत्रकार थे। बनवारी लाल जालान, पंडित अमर नाथ तिवारी और श्रीनाथ सहाय जैसों का समय आजमगढ़ के पत्रकारिता के इतिहास को रेखांकित करने वाला कालखंड था। तब कलेक्टर और कप्तान उनसे मिलने उनके घर या कार्यालयों में आया करते थें, आज की तरह पत्रकारिता का पतन नहीं हुआ था।छपे हुए शब्दों में तलवार सी धार हुआ करती थी और पत्रकारों की रीढ़ बिल्कुल सीधी।
उस कालखंड में एक इंटरमीडिएट कॉलेज का अध्यापक भी समाचारपत्रों की दुनिया और इसके जादुई शब्द संसार से जुड़ा, संन्मार्ग जैसे पत्रों में बतौर संवाददाता अपनी सेवाएं देने वाले श्रीनाथ सहाय आजमगढ़ की पत्रकारिता में आकाशवाणी से जुड़े। वे पहले ऐसे संवाददाता थें, जिन्हें एक साथ समाचार पत्र संन्मार्ग और आकाशवाणी दोनों से मान्यता मिली थी।
जब भी कलेक्ट्रेट तरफ आते तो फोन करते अरविन्द जी! आफिस में हैं। उत्तर मिलता हां तो, सीढ़ियां चढ़ शार्प रिपोर्टर के दफ़्तर में आते। इधर सन-2019 में उनकी स्वतंत्र पत्रकार की मान्यता की पूरी पत्रावली एक सप्ताह मेहनत करके तैयार किया। न केवल तैयार किया बल्कि उनकी और मेरी दोनों की राज्य मुख्यालय की प्रेस मान्यता एक साथ हुई। इस दिशा में आप कह सकते हैं कि वे आजमगढ़ के पहले मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार थें। अपनी पहचान और व्यवहार कुशलता से वे आजमगढ़ के बाहर भी प्रभावशाली व्यक्तित्व के स्वामी थे। वे भारत सरकार के भारी उद्योग मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य भी रहे और इस समिति के बैठकों में प्रतिभाग करने देश के विभिन्न राज्यों में जाया करते थे। उन यात्राओं में गंगटोक और मुन्नार की यात्रा हमने साथ साथ किया था। उन यात्राओं में गोरखपुर के आकाशवाणी और दूरदर्शन के निदेशक रहे डॉ उदयभान जी भी रहे। अब दोनों स्मृतिशेष हो गयें हैं।
लगभग 80 के सहाय जी की खिलखिलाहट और उद्दात मन किसी बच्चे के मानिंद चहक उठता था। प्रतिदिन एक घंटे पूजा करने के बाद ही अन्न ग्रहण करते चाहे घर पर हों,या बाहर।
एकबार लखनऊ में मिल गयें बोले-अरविन्द जी, मेरे शरीर की जांच करा दीजिए। फिर क्या बलरामपुर अस्पताल में उन्हें दिखाया गया और वहीं भर्ती हुए। हालांकि उन्हें तकलीफ कुछ भी नहीं थी। रात बोले- अरविन्द जी, यह नंबर निधि का है, जरा फोन लगा कर उसे बता दीजिए कि मेरी तबियत बहुत खराब है, भर्ती हूं।
न चाहते हुए भी उनकी इस जिद्द के आगे झुकना पड़ा और फोन करके बताया। कुछ देर बाद उनकी लड़की आयीं। फिर उन्हें पकड़ कर रोएं। इस उम्र में शायद उन्हें अपनों की आत्मीयता और प्रेम चाहिए था।
दूसरे दिन पत्रकार मित्र सतीश रघुवंशी भी बनारस से मिलने आए।
आजमगढ़ के डीएबी पीजी कॉलेज के प्रबंधक और पदाधिकारी रहें डॉ श्रीनाथ सहाय एक संघर्षशील व्यक्तित्व का नाम है, प्रबंधतंत्र की लड़ाई वे विश्वविद्यालय से लेकर राजभवन तक लड़े। आखिरी समय में भी उनकी मर्जी से ही नया प्रबंध तंत्र आबाद हुआ था। शायद बूढ़ापे और बूढ़ी हड्डियों की नरमी महसूस करने लगे थे।
इधर लगभग एक महिने से तबियत कुछ खराब ज़रूर थी, लेकिन इतना जल्दी चले जाएंगे यह किसी ने नहीं सोचा था। जिस दिन निधन हुआ उस शाम 7 बजे के लगभग बोलते बतियाते अस्पताल में गयें। उनकी केयरटेकर काजल ने बताया कि हमें विश्वास ही नहीं हुआ कि नाना जी हमें छोड़कर चलें जाएंगे। ठीक एक घंटे बाद 8 बजे उन्होंने लखनऊ के एक अस्पताल में आखिरी सांस ली। कल जब उनके हरिऔध नगर कालोनी स्थित आवास पर पहुंचे तो लगा अभी बोल पड़ेंगे! लेकिन गहरी नींद में सोया यह कलमकार अब कहां उठ पाता। रंगकर्मी Santosh Srivastav Srivastav संतोष श्रीवास्तव, मित्र Mahendra Kumar Singh महेंद्र सिंह और विधायक मित्र Akhilesh Yadav Mubarakpur अखिलेश यादव के बीच उनकी स्मृतियों को याद किया गया।
उनकी स्मृतियों को, उनके साथ बिताए समय को,और उस जिन्दादिल इंसान को भावभीनी श्रद्धांजलि!!