समाजवादी चाचा और भतीजे के रिश्तों के बीच जमीं बर्फ मैनपुरी से पिघलने लगी है..?
@ डॉ अरविन्द सिंह
(#त्वरित_टिप्पणी )
क्या चाचा और भतीजे के सियासी रिश्तों के बीच जमीं बर्फ, अब मैनपुरी से पिघलने लगीं हैं। तो क्या जिस धरतीपुत्र ने अपने जीते-जी, समाजवादी कुनबे में मचे सत्ता-संघर्ष और शक्ति संतुलन को लेकर चाचा-भतीजे के रिश्तों के बीच जमीं बर्फ और कड़वाहट को दूर नहीं कर पाए, वह काम मुलायम सिंह यादव की आखिरी यात्रा ने कर दिखाया।
कहते हैं कि दुख का भी अपना समाजशास्त्र और मनोविज्ञान होता है, दुख में अपने और पराए का बोध नजदीक से होता है, वहीं दु:ख रिश्तों को तोड़ता भी और जोड़ता भी। मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद समाजवादी कुनबे और सैफई परिवार को जहां भीतर तक हिला दिया, वही अखिलेश को बाप के साए से अचानक से महरूम, और रिश्तों के मनोविज्ञान को महसूसना सिखा दिया।
मुलायम सिंह यादव सरीखे राजनेता को गढ़ने में जिन भी तत्वों और परिस्थितियों का समावेश हो, लेकिन उनके बनने में शिवपाल सरीखे भाई का त्याग और समर्पण कम नहीं था और नहीं है। इस बात को मुलायम ने हमेशा ही समझा और अपने अनुज को लक्ष्मण सरीखे मान दिया। यही कारण था कि बेटे और भाई के बीच- सियासी संघर्ष के बीच भी, दोनों के शक्ति के स्रोत भी 'नेताजी'ही बने रहे।
जीवन पर्यन्त उन्होंने समाजवादी आंदोलन को आगे बढ़ाया, मरने के बाद उनकी सियासी हड्डियां भी, उनके विरासत की सियासत के लिए दधिचि की हड्डी बन गयी। जिसने चाचा और भतीजे को न केवल उनकी सियासी जमीन मैनपुरी में एक साथ उतारकार उनके अहम् और रिश्तों के दरम्यान जमीं बर्फ को पिघला दिया, बल्कि उनकी बहु डिंपल की ऐतिहासिक जीत ने चाचा और भतीजे के दिल को भी एकाकार कर दिया। इस सफलता के मूल में भी दुख से उपजी एकता और सियासी विवशता है। अखिलेश ने बड़ा दिल दिखाया और चाचा शिवपाल की प्रसपा को समाजवादी पार्टी में विलय कर पुनः उन्हें सायकिल पर चढ़ा दिया। यह विपक्ष की एक नई सियासी दौर की शुरुआत होगी,जो समाजवादी मुलायम के अंत से.. प्रारंभ होती नज़र आ रही है।