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रवि अरोड़ा की नजर से.......

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खेल के हिस्सेदार  /  रवि अरोड़ा



इस हफ्ते जयपुर जाना हुआ । तीन दिन की यात्रा में तीन बार ही ट्रैफिक पुलिस की आसामी बना । दो जगह दो-दो सौ रूपए की भेंट चढ़ा कर पीछा छुड़ाया तो एक जगह बाकायदा पांच सौ का चालान ही कटवाना पड़ा। मेरा कसूर यह था कि मेरी कार का नंबर उत्तर प्रदेश का था और बाहरी राज्य की गाड़ी देख कर लगभग सभी शहरों में ट्रैफिक पुलिस वाले यूं झपटते हैं जैसे मांस को देख कर चील । जयपुर में पहली बार मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ है, जब भी वहां जाना हुआ हर बार ट्रैफिक पुलिस की अवैध वसूली का शिकार हुआ । मोटर व्हीकल एक्ट में इतने प्रावधान हैं कि यदि पुलिस कर्मी तय कर ले तो आप चाह कर भी अवैध वसूली से बच नहीं सकते । जयपुर ही क्यों चंडीगढ़ भी जब कभी गया, ट्रैफिक पुलिस की मुट्ठी गर्म करनी ही पड़ी। चूंकि मेरी कार पर प्रेस, एडवोकेट अथवा अन्य कोई प्रभावी स्टीकर नहीं होता अतः छोटी से छोटी सी बात पर भी बाहरी राज्य में स्थानीय ट्रैफिक पुलिस रोक लेती है। अब कोई एक दिन में कितने चालान कटवा सकता है और किस किस बात पर कटवा सकता है ? हां अपना ड्राइविंग लाइसेंस ही रद्द करवाने की मंशा हो तो बात कुछ और है।


मैं जिस मुद्दे पर बात कर रहा हूं, उसे वही बेहतर ढंग से समझ सकता है जो अपने वाहन से सुदूर राज्यों में आता जाता रहता है। कमाल की बात देखिए कि दिल्ली एनसीआर में चालीस सालों से मैं कार स्कूटर चला रहा हूं और कभी चालान तो दूर किसी ट्रैफिक पुलिस ने रोका भी नहीं । कारण यह नहीं है कि वे मुझे पहचानते हैं, बल्कि यह है कि मैं ट्रैफिक नियमों का सदैव पालन करता हूं और उससे बढ़कर बात यह है मेरे वाहन का रजिस्ट्रेशन नंबर लोकल है। मगर अपने शहर में रोजाना मैं किसी न किसी बहाने से बाहरी वाहनों को रोका जाना भी देखता हूं। हमारे यहां ही नहीं लगभग हर बड़े शहर में बाहरी वाहन चालकों को ठगने के लिए ट्रैफिक पुलिस ने बाकायदा जाल बिछा रखे हैं। जयपुर में अनेक सड़कों पर छोटा सा बोर्ड स्पीड लिमिट चालीस अथवा साठ लिख कर अथवा कहीं किसी कोने में 'वाहन ठहराना मना है 'का बोर्ड लगा कर इससे अनभिज्ञ बाहरी वाहनों को जाल में फंसा ही लिया जाता है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई और बंगलुरू जैसे तमाम बड़े शहरों की भी मिलती जुलती कहानी है। समझ नहीं आता कि एक तरफ तो हम दावा करते हैं कि देश की पूरी सीमा के भीतर एक संविधान और एक कानून है मगर जब उसके पालन की बात आती है तो कहानी स्थानीय बनाम बाहरी का मोड़ ले लेती है।


जब से नया मोटर व्हीकल एक्ट आया है, ट्रैफिक पुलिस की पांचों उंगलियां घी में हैं। नए प्रावधान के अनुरूप पुलिस को पच्चीस हजार तक का जुर्माना करने का अधिकार मिल गया है। पेचीदगी का आलम यह है कि चप्पल अथवा हाफ पेंट पहन कर वाहन चलाने पर भी मोटा जुर्माना है। बच्चा साथ हो तो स्पीड लिमिट चालीस निर्धारित कर दी गई है। जाहिर है कि ऐसे कानूनों के पालन में वाहन चालक से कहीं न कहीं चूक हो ही जाती है, नतीजा देश में कई लाख चालान प्रति दिन हो रहे हैं। जयपुर, चंडीगढ़, दिल्ली, गुरुग्राम में प्रति दिन तीन हजार से अधिक चालान कर राज्य सरकारें अपनी तिजोरी भर रही हैं। एक अनुमान के अनुसार दस हजार करोड़ रुपया सालाना चालानों के द्वारा वसूला जाता है। जबकि ट्रैफिक पुलिस का स्टाफ इससे कई गुना अधिक अपनी जेब के हवाले करता है। नियमानुसार राज्य सरकारों को वसूली का एक हिस्सा ट्रैफिक के नियमों के प्रचार प्रसार में भी खर्च करना होता है मगर ऐसा होता नहीं। न जाने यह खेल क्या है और इसमें कौन कौन हिस्सेदार है ?


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