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रवि अरोड़ा की नजर से.....

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 इसकी टी शर्ट तो उसके नंगे पांव /  रवि अरोड़ा 



देश बदल रहा है। अब जमीनी मुद्दे गौण हो चले हैं और उनका स्थान ले रहे हैं नेताओं के तौर तरीके और कपड़े। यकीनन आजादी के दौर से अब तक नेताओं की जीवन शैली सदैव चर्चाओं में रही है मगर फिर भी मुद्दे वही बनते थे जो जनता जनार्दन के सुख दुःख से जुड़े हुए होते थे । मगर अब सबकुछ थोथला है। राजनीतिक दल और इवेंट कंपनियां एक जैसी हो चली हैं तो नेताओं और मॉडल के बीच भी समानता सी उपज गई है। गंभीर मुद्दे अब किसी की दरकार नहीं हैं। प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी मां की शव यात्रा में कांधा देने पहुंचे, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह हो गया कि उस समय उनके पांव में चप्पल अथवा जूते क्यों नही थे ? बाल की खाल निकालने वाले उन तस्वीरों को भी ढूंढ लाए जिनमें केदारनाथ के दर्शन के समय उन्होंने जूते पहने हुए थे । राहुल गांधी अपनी भारत जोड़ो यात्रा के दिल्ली पड़ाव के समय पूर्व प्रधान मंत्रियों की समाधियों पर गए, इससे अधिक फुटेज इस बात को मिली की दिल्ली की भीषण सर्दी में भी उन्होंने ऊनी कपड़े नहीं वरन एक सादी सी टी शर्ट पहनी हुई थी। यही नहीं राहुल की यात्रा से अधिक उनकी बढ़ी दाढ़ी खबरों में है। बस खबरों में नहीं हैं तो सिर्फ वे बातें जिनके चलते देश के करोड़ों लोग सुबह शाम हलकान होते हैं। 


वैसे तो नए साल में नए मुद्दों पर बात होनी चाहिए मगर जब हमारी रीति नीति नए साल में भी पुरानों की मानिंद ज्यों की त्यों रहने वाली है तो कोई मुद्दा नया क्या और पुराना क्या ? साल 2022 में हमने मोदी जी के कपड़ों पर खूब रस ले लेकर बातें की हैं। विपक्षी दल भी सुबह शाम यही राग अलापते हैं कि मोदी जी दिन में पांच पांच बार कपड़े बदलते हैं। राहुल गांधी की पद यात्रा पर पहला हमला भाजपा ने भी उनकी टी शर्ट को लेकर ही बोला था । दावा किया गया कि उनकी टी शर्ट 42 हजार रुपए की है। इस टी शर्ट को इतना बड़ा मुद्दा बनाया गया कि राहुल गांधी इसका लाभ लेने में ठीक ऐसे ही जुट गए जैसे चाय वाला बताए जाने पर 2014 में मोदी जी जुट गए थे। तभी तो चार महीने होने को आए और राहुल गांधी इसी टी शर्ट में घूम रहे हैं। 


मुल्क में नेताओं के कपड़े पहली बार चर्चा में नहीं हैं। गांधी की लंगोटी उनकी पहचान थी तो नेहरू की अचकन और जैकेट। चौड़े बॉर्डर वाली साड़ी इंदिरा गांधी की शोहरत से जुड़ी थी तो शॉल को एक कंधे से लपेटना राजीव गांधी को लोगों से अलग करता था । एपीजे अब्दुल कलाम और लालू यादव अपने हेयर स्टाइल के लिए जाने जाते थे तो ज्ञानी जैल सिंह सीने पर लगे गुलाब के फूल के लिए । मनमोहन सिंह की पगड़ी के नीचे की नदारद फिफ्टी उन्हें आम सिक्खों से अलग करती थी तो दक्षिण के नेताओं की पहचान उनके कांधे पर पड़ी शॉल अरसे से रही है। नेताओं की छवि में इनके कपड़ों की भूमिका को हम बेशक महत्वहीन न मानें मगर फिर भी उनके मूल्यांकन में कार्य शैली,  ईमानदारी, समझ और लोकप्रियता को ही प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए क्या ?  मगर अब ये क्या हो रहा है कि सर्दी में कोई स्वेटर न पहने तो उसे हम तपस्वी करार दे देते हैं और कोई नंगे पांव शव यात्रा में शामिल हो तो वह हमें ड्रामा लगने लगता है।




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