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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मास कम्यूनिकेशन (aimc) यानी कृत्रिम मेधा जनसंचार / मनीष शुक्ल

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हिंदी एवं भाषाई पत्रकारिता व जनसंचार के पितामह प्रोफ़ेसर डॉक्टर राम जी लाल जांगिड सर को समर्पित पुस्तक 


आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस मास कम्यूनिकेशन (aimc) 

यानी 

कृत्रिम मेधा जनसंचार /  मनीष शुक्ल 

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विषय सूची 


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चैप्टर एक 

कृत्रिम मेधा का परिचय 

 हम आपको विज्ञान की कथा नहीं सुनाने जा रहे हैं बल्कि भविष्य की दुनियां में शामिल होने के लिए शिक्सित  करने जा रहे हैं| ये शिक्सा है तकनीक से परिपूर्ण जीवन शैली की जहाँ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) यानी कृत्रिम मेधा का व्यापक उपयोग होगा| जिसमें विकास का रास्ता खुद तलाशना होगा और आशंकाओं का निराकरण भी खुद ही तलाशना होगा| ये सही भी है कि तकनीक अपने साथ विकास और आशंका को भी जन्म देती है है| फिर चाहें रोजी- रोजगार के अवसरों की हो या फिर जीवनशैली पर होने वाले असर की बात हो| सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सवालों की हो| इन सवालों का जवाब भी तकनीक के प्रयोग से ही मिलेगा| कभी पुरानी को सुधार कर, कभी नई तकनीक अपनाकर| जब तक मानवीय मूल्य हैं| हर शंका का निवारण है| यही अंतिम निष्कर्ष है| तकनीक का संचालक मनुष्य ही है| फिर चाहें सूचनाक्रांति के दौर के शुरुआत में कंप्यूटर के प्रयोग को लेकर जन्म लेने वाली आशंकाओं का निराकरण हो या मौजूदा डिजिटल युग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) यानी कृत्रिम मेधा के व्यापक उपयोग की हो|  

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंप्यूटर युग का विकासक्रम है| तकनीक हमारे जीवनशैली का हिस्सा बन गई है | खासतौर पर करोना काल के समय से बदल रहे जीवन चक्र में कृत्रिम मेधा की महत्वपूर्ण भूमिका हो गई है| आज घर की जरुरत के सामान से लेकर स्वास्थ्य और नागरिक सुरक्ष एआई के जरिये आसानी से उपलब्ध है| आपका समार्ट फोन हो फिर सरकार की बनाई जा रही स्मार्ट सिटी, बिना कृत्रिम मेधा के संभव नहीं है| डिजिटल शापिंग से लेकर पेमेन्ट सब कुछ आसानी से हो रहा है| एआई जीवन के हर पहलू को छू रही है| पत्रकारिता और जनसंचार में भी एआई महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है| मानव संसाधन की नौकरी छिनने से लेकर उसके मष्तिष्क पाए एआई के कब्जे की आशंका के साथ| बिलकुल वैसा ही जैसा कभी कंप्यूटर के आने के बाद आशंका व्यक्त की गई थी लेकिन धीरे- धीरे आंशकाओं से आगे बढ़कर हमने कंप्यूटर को अपनाया और फिर पूरी दुनियां में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ| शायद कुछ वर्षों बाद एआई को लेकर भी आशंकाओं के बादल छंट जाएँ| इसलिए आशंका और नुकसान का आंकलन हम आने वाले अध्याय में करेंगे | पहले हम कृत्रिम मेधा से परिचित हो जाएँ| 

आम नागरिक के जीवन में कंप्यूटर के प्रवेश के साथ सूचना क्रांति हुई थी| डिजिटल युग में डाटा पॉवर बन गया है| डाटा हासिल करने के लिए कार्पोरेट जगत आपस में लड़ रहा है| आपके मोबाइल से लेकर विभिन्न डिवाइस में घुसकर चोरी हो रही है| आपकी सारी जानकारी दुनियां के किसी अनजान कोने में बैठे व्यक्ति को है, इसका कारण भी कृत्रिम मेधा ही है| इसके फायदे और नुकसान हैं पर यह सच्चाई है कि एआई से लैस आज रोबोट आपके लिए चाय परोसने से लेकर न्यूज़ एंकर का कार्य कर रहा है| ये एआई के विस्तार का पहला चरण है| भविष्य में ये तकनीक क्या शक्ल लेगी| ये सब उपयोगिता पर निर्भर करेगा| ऐसे में विकल्प हमेशा खुले रहेंगे| हमें बस दो बातों को याद रखना होगा कि मनुष्य तकनीकी का जन्मदाता है न कि तकनीकी| दूसरा तकनीक को हमेशा परिवर्तित और नियंत्रित किया जा सकता है| मानवीय मूल्यों के कारण यह सबकुछ आसानी से संभव है| हमें तो ये समझना होगा कि आखिर कृत्रिम मेधा यानी ए आई है क्या! कहाँ से आई| किसने पूरी दुनियां तक इसको पहुंचा दिया| 

कृत्रिम मेधा यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्या है! ?

मेधा नैसर्गिक होती है| मेधा को निरंतर अभ्याiस से निखारा भी जा सकता है| ईश्वर से मिली बुद्धि का निरंतर विकास ही मेधा का उपयोग है| मनुष्य खुद को दूसरे से बेहतर साबित करता है तो उसकी मेधा का परिचय होता है| वो अपनी बुद्धि का प्रयोग कर कृत्रिम (बनावटी) मेधा का सृजन करता है फिर इसका दायरा उपयोग और प्रयोग के अनुसार विस्तृत होता जाता है| आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भी सतत विकास हुआ है| इसका श्रीगणेश बीती शताब्दी के पाचवें दशक से हुआ था| 

सरल शब्दों में कहें तो कृत्रिम मेधा कंप्यूटर प्रोग्रामिंग से संचालित होती है जिसमें मनुष्य ही प्रोग्राम को कमांड कर एआई को सोचने, समझने और विश्लेषण करने की क्षमता प्रदान करता है| लेकिन हम एआई के जरिये अध्ययन कर सकते हैं कि मनुष्य का दिमाग कैसे प्रयोग होता है| आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जनक जॉन मैकार्थी के अनुसार यह कंप्यूटर प्रोग्राम को बनाने का विज्ञान और अभियांत्रिकी है अर्थात यह मशीनों द्वारा प्रदर्शित किया गया इंटेलिजेंस है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कंप्यूटर द्वारा नियंत्रित रोबोट या फिर मनुष्य की तरह इंटेलिजेंस तरीके से सोचने वाला सॉफ़्टवेयर बनाने का एक तरीका है। 

कृत्रिम मेधा आज हमारे जीवन के हर हिस्से में मौजूद है| एआई से लैस सिस्टम 1997 में शतरंज के सर्वकालिक महान खिलाड़ियों में शुमार गैरी कास्पोरोव को हरा चुका है। कंप्यूटर गेम से लेकर हालीवुड और वालीवुड फिल्मों में काफी समय से प्रयोग हो रहा है| एआई का प्रयोग नेचुरल लैंगुएज प्रोसेसिंग, एक्सपर्ट सिस्टम, इंटेलिजेंट रोबोट, विजन सिस्टम, स्पीच रिकोग्निशन और ट्रांसपोर्टेशन में हो रहा है|  

दरअसल एआई का महत्त्व पिछली शताब्दी के सातवें दशक से ही तकनीक से लैस देशों ने समझ लिया था| सबसे पहले अमेरिका और जापान जैसे देशों में एआई का चलन शुरू हुआ| दुनियां में कृत्रिम मेधा का सबसे पहले प्रयोग शीत युद्ध के समय संयुक्त राज्य अमेरिका ने किया था| एआई के जरिये अंग्रेजी भाषा को रूसी भाषा में और रूसी भाषा को अंग्रेजी भाषा में परिवर्तित किया गया था| यूएस का यह प्रयोग  सुरक्षा के दृष्टिकोण से एआई अनुवाद का पहला और अनूठा था| जापान ने 1981 में फिफ्थ जनरेशन नामक योजना के जरिये एआई की शुरुआत की थी। इसमें सुपर-कंप्यूटर के विकास के लिये 10-वर्षीय कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की गई थी। फिर ब्रिटेन ने एआई आधारित 'एल्वी'नाम का एक प्रोजेक्ट बनाया। यूरोपीय संघ के देशों ने भी 'एस्प्रिट'नाम से एक कार्यक्रम की शुरुआत की थी। 1983 में कुछ निजी संस्थाओं ने मिलकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर लागू होने वाली उन्नत तकनीकों के विकास के लिए ‘माइक्रो-इलेक्ट्रॉनिक्स एण्ड कंप्यूटर टेक्नोलॉजी’ संघ की स्थापना की।

अगर हम भारत की बात करें तो हमारा उन्नत तकनीक इतिहास है| कृत्रिम मेधा तकनीक के क्षेत्र में रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) ने कार्य किया है| फिरभी एआई अभी शैशवास्था में है| हालाँकि केंद्र की वर्तमान नरेन्द्र मोदी सरकार ने पहले ही कार्यकाल से डिजिटल युग की दिशा में कार्यरत है| फिर चाहें डिजिटल एक्ट की बात हो राष्ट्रीय शिक्सा नीति में कृत्रिम मेधा को पाठ्यक्रम में शामिल करने की बात हो,  हर दिशा में कार्य शुरू हुआ| इस समय सत सूत्रीय नीति पर कार्य चल रहा है जिसमें मानव मशीन की बातचीत के लिये विकासशील विधियाँ बनाने से लेकर शोध- अनुसंधान, एआई सिक्योरिटी, लॉ, नैतिक और सामाजिक प्रभाव का अध्ययन शामिल है| केंद्र सरकार का मानना है कि सुशासन के लिहाज़ से देश में जहां संभव हो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल किया जाए। ऊर्जा, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, परिवहन, कृषि, बैंकिंग, सुरक्ष जैसे प्राथमिक क्षेत्रों में कृत्रिम मेधा का तेजी से प्रसार किया भी जा रहा है| मनोरंजन के क्षेत्र में एआई पहले ही अपनी महत्वपूर्ण घुसपैठ कर चुका है| ऐसे में पत्रकारिता और जनसंचार के क्षेत्र में कृत्रिम मेधा को अछूता कैसे रखा जा सकता है | 

डिजिटल युग में सटीक और तथ्यपरक जनसंचार के लिए कृत्रिम मेधा एक महत्वपूर्ण अस्त्र हो सकता है| फिर खोजी पत्रकारिता हो, मौसम की जानकारी हो या फिर न्यूज रिपोर्टिंग और एंकरिंग| हाल में वर्ष 2023 में हमने देखा कि देश के एक एक भारतीय मीडिया समूह ने अपने पहले पूर्णकालिक कृत्रिम मेधा (एआई) समाचार एंकर का अनावरण किया| सना नाम के बॉट ने देश के जाने- माने न्यूज़ एंकर के साथ समाचार पढ़कर सभी को चौंका दिया| सना एक रोबोट थी| टेक्स्ट-टू-स्पीच तकनीक का इस्तेमाल करके सना को समाचार प्रस्तोता बनाया जा सका| भारत में यह अपनी तरह का पहला प्रयोग था जो स्थाई न बन सका लेकिन ख़बरों की दुनियां में एआई प्रेजेंटर का आगमन हो ही गया| दुनियां धीरे- धीरे पत्रकारिता रोबोट की ओर बढ़ रही है| इसके प्रभाव का भी आंकलन होगा लेकिन ये भविष्य की शुरुआत जरूर है|   

दुनिया भर के विभिन्न मीडिया संस्थानों और समाचार एजेंसियों में अब कंप्यूटर का विशेष रूप से प्रयोग हो रहा है| आज तकनीकी के जरिये संवाद और संचार को ज्यादा प्रभावी और सटीक बनाया जा सकता है| राजनीति, खेल, मौसम, स्टॉक एक्सचेंज की गतिविधियों, कॉरपोरेट जगत की ख़बरों के लिए तकनीकी का व्यापक उपयोग हो रहा है| आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिये अब ख़बरों की मनोवृत्ति को भी पहचाना जा सकता है| बदलावों का सटीक मूल्यांकन भी किया जा सकता है| ऐसे में इन क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकार व दूसरे तकनीकी से लैस संचारकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो रही है| शायद कुछ समय पहले तक ये संभव नहीं था|    

अगर एआई की भूमिका जीवन में समझनी हो तो हमें एकबार कोविड-19 के कालखंड को देखना होगा| देश और दुनियां की सुरक्ष में बड़ी भूमिका एआई ने निभाई है| फिर चाहे सार्वजनिक स्वास्थ्य डाटा का विश्लेषण करना हो या फिर आस-पड़ोस से लेकर दूर दराज में छिपे मरीज की तलाश हो| इस दौरान पत्रकारिता और जनसंचार में भी एआई के जरिये नए बदलाव दर्ज किये गए| निश्चित रूप से लोगों की नौकरी भी गई| ये बात अलग है कि  संक्रमण काल से निकलकर सभी की निगाहें भविष्य की ओर हैं|  

कृत्रिम मेधा कंप्यूटर बड़ी मात्रा में डाटा का विश्लेषण करके बेहद कम समय में परिणाम दे रहा है| विभिन्न स्रोत से आए तथ्यों की जांच करके उनकी विश्वसनीयता का पता लगाया जा रहा है| ये जारी भले ही मशीन कर रही है लेकिन इनका प्रयोग संसथान और पत्रकार जनसंचार के लिए कर रहे हैं| 

सिर्फ इतना ही नहीं विभिन्न जन संचार संस्थान और शिक्षविद भी ऑन लाइन तकनीकी और प्लेटफार्म की ओर बढ़ रहे हैं जिससे छात्र को मौजूदा समय की मांग पर आधारित शिक्ष प्रदान की जा सके| प्रोजेक्ट आधारित पढाई छात्रों को ज्यादा व्यवहारिक और तकनीकी रूप से सक्षम बना रही है| कृत्रिम मेधा का ज्ञान मौजूदा समय की मांग है| मीडिया संस्थान अब जरुरत के मुताबिक़ अपना पाठ्यक्रम तय कर रहे हैं| फिर चाहे न्यू मीडिया कोर्स हो या फिर डिजिटल मीडिया पाठ्यक्रम| ये प्रभाव आर्थिक रूप से भी महसूस किया जा रहा है क्योंकि आज प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (एनएलपी), रोबोटिक प्रोसेस ऑटोमेशन (आरपीए), और मशीन लर्निंग (एमएल) लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं। स्टेटिस्टा के आंकलन के अनुसार एआई-आधारित सॉफ्टवेयर का बाजार तेजी से बढ़ने और 2025 तक 126 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। वहीँ वर्ष 2029 तक 1,394.30 बिलियन अमरीकी डॉलर होने की उम्मीद है| खासकर जब ऑनलाइन शिक्षा मुख्यधारा में शामिल हो चुकी है। एआई भारत में एडटेक कंपनियों के लिए ढेर सारे नए अवसर दे रहा है। आज सिरी, Google Now, रिकमंडेशन इंजन और ड्रोन हमारी जिन्दगी को बेहतर बना रहे हैं| गूगल आज 2700 से ज्यादा कृत्रिम मेधा तकनीक का प्रयोग कर रहा है| कृत्रिम मेधा के निर्माता आज मशीन लर्निंग के प्रयोग को अनुभव की शिक्सा से जोड़ रहा हैं| जैसे पुराने समय में हमारे पूर्वज अनुव्हाव का आधार पर हमें ज्ञान देते थे| ये अजीब है लेकिन अनूठा और व्यवहारिक ज्ञान से भरा है| जिसका मूल मानवीय मूल्य हैं| यह सच है कि कृत्रिम मेधा के  शोध की दिशा में ये महज शुरुआत है| लेकिन भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है| अगर अपने आसपास ही नजर डालें तो सिंगापुर में लगभग 9,000 भारतीय कंपनियां पंजीकृत हैं और सिंगापुर से 440 से अधिक कंपनियां भारत में पंजीकृत हैं। ये सभी कंपनियां स्मार्ट शहरों, शहरी नियोजन, लॉजिस्टिक और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में भाग ले रही हैं| जिनका आधार कृत्रिम मेधा है| ग्रामीण भारत  भी अब ए आई के प्रभाव से अछूता नहीं है| राष्ट्रीय आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) पोर्टल के संचालित होने से रास्ता और भी आसन हो गया है| केंद्र सरकार का थिंकटैंक नीति आयोग राष्ट्रीय कृत्रिम मेधा कार्यक्रम के जरिये भविष्य का रास्ता तलाश रहा है| जिसपर चलकर भारत वर्ष 2030 तक आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में विश्व का अगुआ बन सके| निश्चित रूप में इसमं| पत्रकारों और जनसंचारकों की बड़ी भूमिका होने जा रही है|



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