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Channel: पत्रकारिता / जनसंचार
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मेरा गांव अब तेजी से शहर होता जा रहा है.

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मेरा गांव अब तेजी से शहर होता जा रहा है...!


रात की वीरानियों को तोड़ती कहकहों की आवाजें।

दिन के दीवार पर टंगी चकल्लस की बदमाशियां

 मोहल्ले दर मोहल्ले, गांव -दर- गांव निरवता की

 चादर डाले शांति की अनंत आगोश में लिपटे नज़र आते हैं। जिन मोहल्लों की दलानों और चबूतरे से कभी किशोरों की आवाजें जेठ की दुपहरी की तन्द्रा तोड़ती थीं, जिन गांवों के झोंपड़े और मंडईयों से शैतानियों की योजनाएं जन्मती थीं, उन गांवों से अब मंड़ईंयां और मोहल्लों से दलाने -चबूतरे ही गायब हो चुके हैं। गांव और मोहल्लें अब अपना घर छोड़, शहरों की चाकरी में लग गयें है। अपनी हंसी और ठिठोलियों को गांव के सीवान में बूढ़े बरगद पर टांग गांव सूनेपन की आगोश में लिपटता जा रहा है।अपने  किशोरों और नौजवानों को बाहर भेजकर गांव के बगीचे, अब वीराने में बौरें और टिकोरे  ईंट भट्ठे की चिमनियों से आग सोखता हुआ दम तोड़ता जा रहा है। मेरा गांव अब तेजी से शहर होता जा रहा है...!

 - डॉ अरविन्द सिंह।


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