बीती शताब्दी में नब्बे के दशक की प्रमुख साहित्यिक पत्रिका 'कतार'के संपादक रहे प्रो. बीबी शर्मा के निधन की सूचना कल शाम अनन्य कवि-साथी अनवर शमीम ने धनबाद से फ़ोन पर दी ! अवसन्न रह गया.
बिहार के राजगीर में जन्मे शर्मा जी ने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा कोयलांचल में बिताया, वे यहां प्राध्यापक रहे. 'कतार'का संपादन-प्रकाशन उन्होंने यहीं से शुरू किया. पत्रिका में या उनके साथ वरिष्ठ कथाकारद्वय मनमोहन पाठक, नारायण सिंह और भाषाविद/आलोचक श्रीनारायण समीर भी जुड़े रहे. बृजबिहारी जी ने लगभग आठ दशक की लंबी आयु पाई. कुछ समय से वे मंगलूर में रह रहे थे, जहां शुक्रवार को उन्होंने अंतिम सांस ली.
मैं कहां इन दिनों किसी और ही समय का मन:यात्री ! बैठे-बैठे दौड़ लगाने वाला व्यक्ति. फिलहाल, भारतेंदु के युग का विचरक ! अदेखे को देखने और अदृश्य को दृश्य बनाने के उल्टे-पुल्टे काम में जुटा हुआ. इस बीच अचानक यह कैसा जोरदार भावनात्मक झटका !
शमीम जी के शब्दों ने एक ही झटके में जैसे सवा सौ साल नीचे ला पटका हो ! 'कवि वचन सुधा काल'से लुढ़ककर पल भर में धब्ब-से 'हंस-पहल-कतार युग'में !
बीबी शर्मा यानि बृजबिहारी शर्मा ! उनसे मेरा संपर्क बन तो गया था 1988 में ही, जब मैं अपने अखबारी जीवन की शुरुआत करने धनबाद पहुंचा. पहला योगदान दैनिक आज में और शुरुआत बतौर उप संपादक. मैं रहता था बड़े भाई शिव नारायण सिंह के साथ, चिरागोडा क्षेत्र स्थित आवास में. यहीं, पास में प्रो. शर्मा और इससे कुछ आगे प्रो. शिवेश के आवास थे. शिवेश जी मूलतः पलामू के थे, इसलिए उनसे मिलकर कुछ भिन्न अनुभव मिलता. नितांत घरेलू, पलमुआ अपनापन ! शर्मा जी वैचारिक ऊष्मा से भरे व्यक्ति, उनसे साहित्य से लेकर राजनीति और साहित्य में विशेषकर आलोचना पर लंबी चर्चाएं होती. अक्सर गरमागरम बहसें. असहमतियों के बावजूद शर्मा जी अपनापन का रंग कभी मद्धिम नहीं पड़ने देते. अचानक ठठा कर हंस पड़ते, परिदृश्य तुरंत नया !
अनेक खट्टी-मीठी यादें हैं. चाहता हूं, यह सब शब्दबद्ध करूं, क्योंकि इनके साथ कोयलांचल के तत्कालीन वैचारिक फलक और साहित्य समाज से संबंधित अनेक जरूरी संदर्भ संबद्ध हैं! लेकिन उपन्यास-लेखन का रोग भी तो पाल रखा है. खाना और सोना तक दूभर कर देने वाली व्याधि. बहरहाल, हालात कुछ भी षड्यंत्र करते रहें, हौसला कहता है, सब होगा !