कल 27 दिसम्बर था और पूरे दिन सिर्फ और सिर्फ तुम याद आते रहे प्रिय आलोक।तुम्हें मेरी यादों में आना ही था।यह दिसम्बर है,साल का अंतिम महीना।उस महीने के भी आखिरी दिन।यह दिन इसलिए भी आते और रुलाते हैं कि जिंदगी के कठोरतम दिनों में जब 20 दिसम्बर ( मेरा जन्मदिन) आता तो तब तुम अकेले ही होते जो मेरी तन्हाई को मामूली से उत्सव में बदल देते।यह उत्सव मेरे सबलेटिंग वाले सरकारी घर में मनता या फिर जनसत्ता के दफ्तर के बगलवाले ढाबे में।उसमें एक और चेहरा जुड़ जाता वह था दिनेश तिवारी का।अब तुम दोनों ही नहीं हो।मेरे कातर क्षणों को सहलाने वाला कोई नहीं।
20 के बाद हम बेसब्री से 27 का इंतजार करते।यह तुम्हारा दिन था।तुम्हारा जन्मदिन।जो धीरे धीरे बड़ा होता रहा तुम्हारी बढ़ती हुई लोकप्रियता के सँग-साथ।
अब न 20 में रौनक बची है,न 27 में।तुम्हें गुजरे पूरे 13 साल हो गये।यह 13 साल मुझे तेरह सौ साल लग रहे हैं न जाने क्यों?खूब डराता है अकेलापन।ग्वालियर आज भी,अब भी तुम्हारी यादों से महकता है।मेरी नयी किताब 'मेरा आकाश,मेरे धूमकेतु'(प्रभात प्रकाशन) का लोकार्पण देव श्रीमाली के संयोजकत्व में ग्वालियर में था।यह संस्मरणों की किताब है।इसमें तुम पर भी 42 पेज हैं।किताब के इस उत्सव में तुम किताब से निकलकर सभागार में उतर आये।देर तक छाये रहे।मेरा,तुम्हारा अतीत अब दंत कथा सा बन गया है ।जगदीश तोमर हो या शैवाल सत्यार्थी।घनश्याम भारती हो या देव श्रीमाली या प्रमोद भार्गव।सभी के भाषणों का तुम हिस्सा थे।होना ही था।
तब मेरे पास आंसुओं के सिवा कुछ नहीं था।मैं मंच से उठकर कई बार कोने में जा कर आँसू पोछ आया था।अब मेरी नियति भी यही है।
उम्र का 64वां जन्मदिन तुम जहाँ भी हो,उसे मनाना उत्सव की ही तरह।यही हमारी पहचान है।
आलोक तोमर कभी अपनी पहचान नहीं खोते-हर वक्त इसे याद रखना।
नहीं कह सकता अलविदा क्योंकि तुम मुझ से विदा हो ही नहीं सकते।