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नये साल में हैदराबाद के लिए नया संकट

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 शनिवार, 29 दिसंबर, 2012 को 20:55 IST तक के समाचार
चारमीनार, हैदराबाद
शहर से जंगल और झील जैसे प्राकृतिक साधनों को बेदर्दी से मिटाया गया.
कहते हैं कि हर नव वर्ष अपने साथ नई उम्मीदें लाता है, लेकिन साल 2013 ऐसा लगता है कि हैदराबाद शहर के लिए एक गंभीर संकट साथ ला रहा है.
अगर आप नवाबों और मीनारों के शहर हैदराबाद के रहने वाले हैं तो फिर आपको नए साल में और भी ज्यादा कठिन और चुनौतियों से भरे जीवन के लिए कमर कस लेनी चाहिए.
अगर आप किसी दूसरे नगर से हैदराबाद आना चाहते हैं तो भी अपना इरादा टाल देना चाहिए, क्योंकि लगभग 80 लाख की आबादी वाला हैदराबाद पीने के पानी और बिजली के बेहद गंभीर संकट की ओर बढ़ रहा है.
हालांकि यह दोनों ही समस्याएं नगरवासियों के लिए नई नहीं हैं, लेकिन अधिकारी कह रहे हैं कि अब जो स्थिति उत्पन्न होने वाली है वैसी शहर ने पहले कभी नहीं देखी है.

मांगी थी एक दुआ

साल 1591 में इस शहर को बसाने वाले रजा मुहम्मद क़ुतुब शाह ने एक दुआ मांगी थी, ''ऐ खुदा, मेरे इस शहर को लोगों से ऐसे आबाद कर जैसे कि समंदर मछलियों से भरा है.''
शायद वो दुआ कुबूल होने की घड़ी थी. इस नगर की आबादी में कुछ इस गति से बढोत्तरी हुई कि आज हैदराबाद देश का छठवां बड़ा नगर बन गया है और जनसंख्या तेज़ी से एक करोड़ के निशाने की ओर बढ़ रही है.
लेकिन जाहिर है कि नगर की बुनियादी सुविधाएं विशेषकर सड़क, पानी और बिजली इतना बोझ उठाने के काबिल नहीं हैं. सड़कों पर तिल धरने को जगह नहीं. हर साल एक लाख वाहनों की बढोत्तरी सड़कों को और भी तंग बना रही है.
जहाँ कभी लगातार 24 घंटे नलों से पानी आता था, अब दो दिन में एक बार एक या दो घंटे के लिए आता है, वह भी अगर आपका भाग्य अच्छा हो.

यादें गुज़रे ज़माने की

मुझे बचपन के वो दिन याद हैं जब इन्हीं नलों से सुबह-शाम भरपूर पानी आया करता था और गर्मी के कड़े मौसम में भी पानी के लिए तरसना नहीं पड़ता था.
अगर घर में नल न हों, तब भी गली के नुक्कड़ पर लगा पब्लिक-नल सबकी प्यास बुझाता था. लेकिन अब न तो पब्लिक-नल रहे और न ही तालाबों में इतना पानी कि रोज़ाना उसकी आपूर्ति हो सके.
पहले पानी हिमायत सागर और उस्मान सागर से आता था जो मुसी नदी पर बने हैं. फिर मंजीरा नदी से पानी आया, बाद में कृष्णा नदी का पानी हैदराबाद पहुंचा और अब गोदावरी नदी का पानी लाने की परियोजना पर काम हो रहा है.
लेकिन इतनी धीमी गति से कि 30 वर्ष बाद भी यह अधूरा पड़ा है. शहर में रोज़ाना 460 मिलियन गैलन पानी की जरूरत है और केवल 340 मिलियन गैलन पानी की आपूर्ति हो रही है.
बुरी खबर यह है की फ़रवरी से इसमें और भी कमी होगी क्योंकि हिमायत सागर और उस्मान सागर सूखने लगे हैं.

तैयारी संकट की


पानी की कमी हैदराबाद की बड़ी समस्या है जिसका कोई समाधान अबतक नहीं हो पाया है.
मार्च या अप्रैल में मंजीरा नदी भी सूख जाएगी. जो लोग यह सोचकर दिल बहलाना चाहते हैं कि बोरवेल या कुंओं से काम चला लेंगे, उनके लिए बुरी खबर है कि भूमिगत पानी का स्तर भी गिरता जा रहा है क्योंकि शहर कंक्रीट का जंगल बन गया है.
बहुमंजिला भवनों और कंक्रीट की सड़कों के कारण बारिश का पानी भी भूमि में नहीं जा रहा है. नगर के कुछ इलाकों में तो 18 मीटर की गहराई पर भी पानी नहीं मिल रहा है.
ऐसी हालत में पीने को फिर भी कुछ गिलास पानी मिल जाए, लेकिन नहाना-धोना हैदराबाद के लोगों के लिए किसी विलासता से कम नहीं होगा.
पर्यावरण में भी कुछ ऐसा परिवर्तन आया है कि हर वर्ष गर्मी में तापमान एक नया रिकॉर्ड स्थापित कर रहा है. जिस शहर में 30-40 वर्ष पहले 35 डिग्री सेल्सियस की हद पार होते ही बारिश हो जाती थी, अब तापमान 45 डिग्री पार कर जाना भी एक साधारण बात बन गई है.

मुश्किलें ही मुश्किलें

हैदराबादियों के लिए एक मुश्किल यह भी है कि वो इस झुलसाने वाली गर्मी से बचने के लिए एयर कंडिशन्ड कमरों या पंखों के नीचे भी शरण नहीं ले सकते. अगर 2012 में रोज़ाना चार घंटे बिजली की कटौती होती थी तो नए साल में यह बढ़कर छह घंटे हो सकती है.
अधिकारी कहते हैं कि बिजली का संकट जनवरी से ही गहराने लगेगा और अप्रैल तक राज्य में 4000 मेगावाट बिजली की अभूतपूर्व किल्लत होगी.
उद्योगों को तो सप्ताह में केवल तीन दिन बिजली मिलेगी और चार दिन छुट्टी करनी पड़ेगी. उद्योगपति नगर छोड़कर जाने की बात कर रहे हैं.
इसका राज्य की अर्थव्यवस्था पर जो असर पड़ेगा, वह तो स्पष्ट है ही, घरेलू उपभोक्ताओं पर जो बीतने वाली है, वह सोचकर अभी से पसीना आने लगा है.
किसी भी दूसरे बड़े नगर की तरह हैदराबाद में जंगल और झील जैसे प्राकृतिक साधनों को जिस बेदर्दी से मिटाया गया है, अब नगरवासियों को इसका भारी मूल्य चुकाना पड़ रहा है.

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