गांधी के 'हरिजन'को लगी किसकी 'नज़र'
- 7 घंटे पहले
महाराष्ट्र का पुणे शहर जिन ऐतिहासिक स्थलों के लिए जाना जाता है, उनमें से एक है आर्यभूषण छापाखाना.
ये वो जगह है जहां महात्मा गांधी का अख़बार 'हरिजन'छपता था.लेकिन अब इस विरासत के भी व्यावसायिकता के हत्थे चढ़ जाने की आशंका व्यक्त की जा रही है.
(पढ़ेंः गांधी भक्तों के लिए जरूरी...)
महात्मा गांधी के राजनैतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले के पड़पोते सुनील गोखले ने आरोप लगाया है कि आर्यभूषण छापाखाने के निदेशक मंडल ने इसे बेचने की योजना बनाई है और यहां मॉल और होटल बनाने की कोशिशें चल रही हैं.
वर्तमान इमारत
पहले यह छापाखाना 'किबे वाडा'नामक इमारत में चलता था. उस समय इस छापाखाने में 200-250 लोग काम करते थे. लेकिन 1926 में किबे वाडा आग में ख़ाक़ हो गई.
इसके बाद यहां के कामगारों ने एक होकर अपने चंदे से वर्तमान इमारत बनाई. इस इमारत को 'हेरिटेज बिल्डिंग'का दर्जा प्राप्त है.
सुधारवादी क़दम!
बूढ़ों और विकलांगों के लिए काम करने वाली कई संस्थाओं से जुड़े लोगों को यहां काम दिया जाता था.
साल 1932 में जब गांधी येरवडा जेल में बंद थे, तब उन्होंने 'हरिजन'साप्ताहिक शुरू किया. उसकी छपाई यहीं की जाती थी.
आला दर्जे की छपाई
गोखले कहते है, "संस्था को जानबूझकर अक्षम बनाया गया है. जिस ज़मीन पर यह छापाखाना खड़ा है, वह मूलतः 'हिंद सेवक समाज'की है.
गोखले के वारिस
राज्य के सहकारिता मंत्री और मुख्यमंत्री तक से उन्होंने इसकी शिकायत की है.
इधर संस्था के निदेशक अंकुश काकडे का कहना है कि इस इमारत को कोई आंच नहीं आएगी.
उन्होंने कहा, "यह इमारत ग्रेड-2 हेरिटेज इमारत है. यहां किसी तरह का निर्माण कार्य नहीं हो सकता. मशीनरी लाने के लिए कुछ मरम्मत का काम किया गया है लेकिन इस ढांचे को कोई नुक़सान नहीं होगा. हमने जलगांव की संस्था से अनुबंध किया है ताकि प्रेस चलती रहे. इससे संस्था को ही फ़ायदा होगा."
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उन्होंने कहा, "यह इमारत ग्रेड-2 हेरिटेज इमारत है. यहां किसी तरह का निर्माण कार्य नहीं हो सकता. मशीनरी लाने के लिए कुछ मरम्मत का काम किया गया है लेकिन इस ढांचे को कोई नुक़सान नहीं होगा. हमने जलगांव की संस्था से अनुबंध किया है ताकि प्रेस चलती रहे. इससे संस्था को ही फ़ायदा होगा."
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