प्रस्तुति- कृति शरण / सृष्टि शरण
न्यू मीडिया समाज में अभिव्यक्ति का एक ऐसा मंच है जहां पर बोलने को लेकर किसी भी व्यक्ति पर कोई भी पाबंदी लगा पाना लगभग असंभव है। कोई भी व्यक्ति जिसके पास किसी भी प्रकार की सूचना है वह उस सूचना को न्यू मीडिया के जरिये से दुनिया के सामने उजागर कर सकता है।
यह सूचना किसी तथ्यता पर ही आधारित हो यह जरूरी नहीं है। कोई भी व्यक्ति छद्म नाम से किसी को गैरप्रामाणिक सूचना दे सकता है जिससे कि उस सूचना की जवाबदेही व्यक्ति की नहीं रह जाती। कई बार ऐसा देखने में आता है कि कोई व्यक्ति जो न्यू मीडिया पर नहीं भी होता है उसका कोई फर्जी अकाउण्ट न्यू मीडिया पर खोल दिया जाता है और उस अकाउण्ट के जरिये से व्यक्ति की प्रतिष्ठा को हानि पहुंचाई जा सकती है साथ ही उस व्यक्ति की व्यावसायिक साख का फायदा अपना कार्य करने में भी उठाया जा सकता है। उदाहरणस्वरूप हाल ही में देखने आया कि जी न्यूज के राजनीतिक संपादक पुण्य प्रसून वाजपेयी का फेसबुक पर कोई अकाउण्ट चलता हुआ मिला, यह खाता पुण्य प्रसून के नाम से चलाया जा रहा था और पुण्य प्रसून जो भी पोस्ट अपने ब्लॉग पर करते थे उस पोस्ट की लिंक को इस खाते पर डाल दिया जाता था। मीडिया का प्रतिष्ठित नाम होने की वजह से कुछ ही समय में इस खाते के मित्र सदस्यों की संख्या पांच हजार को छू गई। मित्रों के द्वारा पुण्य प्रसून को पता चला तो उन्होंने खाते की गतिविधियों से अनभिज्ञता दिखाई। हालांकि इस खाते से कोई गलत कार्य नहीं किया गया किन्तु इस बात की संभावना से मना नहीं किया जा सकता कि उस खाते से किसी व्यक्ति की नौकरी आदि में अप्रोच भी लगाई जा सकती थी। इस प्रकार न्यू मीडिया के द्वारा फर्जी तरीके से व्यावसायिक हितों में उपयोग हो सकता है।
न्यू मीडिया के द्वारा रोज नए-नए तरीके से कोई ना कोई गैर कानूनी कार्य होने लगा है इसलिए यह जरूरी हो गया है कि न्यू मीडिया को कानून के घेरे में लाया जाए। कानून सिर्फ नकारात्मक नहीं होता। कानून के द्वारा अभिव्यक्ति को एक प्रखरता ही मिलती है। वर्तमान में यदि किसी वेब पोर्टल पर नजर दौड़ाई जाए जहां पर किसी भी ब्लॉग पर किसी को भी कमेण्ट करने की स्वतंत्रता है तो वहां पर बहुत से ऐसे कमेण्ट्स देखने को मिल जाते हैं जो किसी ना किसी दुर्भावना से बहुत ही अनर्गल भाषा में लिखे जाते हैं। ये कमेंट्स बताते हैं कि अभी न्यू मीडिया पर कार्य करने की हमारी शैली परिपक्वता के स्तर तक नहीं पहुंच पाई है। बच्चे हर किसी के घर में होते हैं और हर कोई जानता है कि उनमें परिपक्वता की कमी होती है इसीलिए उनको देखभाल की आवश्यकता होती है, कुछ नियमों की आवश्यकता होती है, कुछ बंधनों की आवश्यकता होती है। ठीक इसी प्रकार जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि न्यू मीडिया के हमारे समाज में दस्तक दिए हुए बहुत अधिक समय नहीं हुआ है। वह अभी अपरिपक्व अवस्था में है। उसे अभी जरूरत है देखभाल की, निगरानी की। जब प्रिंट मीडिया की शुरूआत हुई थी तब बहुत से नियम, कायदे-कानून उस पर लादे गए थे। लोगों ने इन कायदे-कानूनों के कारण सीखा कि कैसे प्रिंट मीडिया का सदुपयोग किया जा सकता है। इन निगरानी का सबसे बड़ा फायदा यह भी रहा कि शुरू से ही प्रिंट मीडिया अपने दुरुपयोग से दूर रही। जिस देश में पूर्ण स्वच्छंदता प्रिंट मीडिया को दी गई वहीं पर उसका दुरुपयोग किया गया। रूपर्ट मर्डोक का ‘न्यूज ऑफ द वर्ल्ड ऐसे ही अखबारों में गिना जाता था जिसने मीडिया के किसी कानून को नहीं माना और किसी आचार-संहिता का पालन नहीं किया। उसका परिणाम आज हम सबके सामने है कि आज वह अखबार इतिहास बनकर रह गया है।
आज का न्यू मीडिया किशोर एवं किशोरियों के जीवन का अहम हिस्सा बन चुका है। डेली अपडेट, चैटिंग और स्टेटस जांचने में वे अपना काफी समय लगाते हैं। न्यू मीडिया पर सक्रियता नुकसानदायक नहीं है लेकिन इससे जब दूसरों को नुकसान पहुंचने लगे, तब यह खतरनाक साबित हो सकती है। इनके बहाने बच्चों के ऊपर जिस तरह के हमले हो रहे हैं, उन्हें कई बच्चे घरवालों को बताते तक नहीं।
ग्लोबल मार्केट रिसर्च कम्पनी, इप्सोस द्वारा भारतीय बच्चों पर किए गए सर्वे के अनुसार दस में से तीन भारतीय अभिभावकों का मानना है कि उनका बच्चा सोशल नेटवर्किंग साइट्स जैसे फेसबुक और ऑर्कुट के जरिये साइबर बुलिंग का शिकार बना। सर्वे में पाया गया कि 45 प्रतिशत भारतीय पैरेंट्स मानते हैं कि उनके बच्चों का उनके साथियों द्वारा शोषण किया जाता है। 60 प्रतिशत लोगों का मानना है कि साइबर बुलिंग को पंख लगाने का काम सोशल नेटवर्किंग साइट्स जैसे फेसबुक आदि के द्वारा हुआ है।
हाल ही में उत्तराखण्ड के एक नामी गिरामी व्यवसायी की पत्नी का फेसबुक पर फेक अकाउण्ट बनाया गया और उस अकाउण्ट को ऐसे ऑपरेट किया गया कि वह असली अकाउण्ट हो, इस तरह शुरू में दोस्त बना लेने के बाद उस अकाउण्ट पर आपत्तिजनक कंटेंट बनाकर डाला जाने लगा। साइबर दुनिया से अनभिज्ञ उन महिला को जब दोस्तों के द्वारा इसका पता चला तो उन्होंने देहरादून में पुलिस से सम्पर्क किया। पुलिस ने इसको साइबर अपराध के प्रावधान के तहत माना और कार्यवाही करके वह फर्जी फेसबुक अकाउण्ट बन्द करवा दिया।
इसी तरह एक चार्टर्ड एकाउण्टेंट ने अपने तहत काम कर रहे एक कर्मचारी की तनख्वाह कुछ महीनों से रोक रखी थी जिससे तंग आकर उस कर्मचारी ने चुपके से सीए के व्यावसायिक कम्प्यूटर में एक वाइरस डाल दिया जिससे कि सभी ‘4’ अंक ‘3’ अंक में बदल गए। सीए का तो सारा काम ही चैपट हो गया। उसने पुलिस में शिकायत की। इसको भी साइबर अपराध की श्रेणी में रखा गया और पुलिस ने उस कर्मचारी के ऊपर अपना शिकंजा कसा।
उपरोक्त उदाहरणों से पता चलता है कि न्यू मीडिया के आ जाने और छा जाने से ही सब-कुछ नहीं हो जाता। न्यू मीडिया को एक सही दिशा में अग्रसरित करने के लिए कुछ कानूनों का होना अत्यंत आवश्यक है। कानूनों की बदौलत ही हम न्यू मीडिया के घातक दुरूपयोगों से बच सकते हैं। किसी के घर में चोरी हो जाए तो चोर को पकड़ कर चोरी गया माल तब भी पकड़ा जा सकता है लेकिन न्यू मीडिया के अपराधों में से ज्यादातर की भरपाई करना लगभग असम्भव होता है। ना तो किसी की प्रतिष्ठा में हुए क्षय को लौटाया जा सकता है और ना ही किसी सीए के कम्प्यूटर के क्षतिग्रस्त हुए आंकड़ों को दोबारा पाया जा सकता है। साइबर मीडिया को इस लाइलाज मर्ज से बचाने का एक यही उपाय है कि ऐसे अपराधों के खिलाफ कड़े से कड़े प्रावधान कानून में रखे जाएं। इन कड़े प्रावधानों के कारण ही ऐसे अपराधों में कमी लाई जा सकती है।
देखा गया है कि साइबर अपराधों का शिकार ज्यादातर किशोर हो रहे हैं। मसूरी में 13 वर्ष की मेगन मीयर नाम की लड़की थी। उसकी सोशल नेटर्किंग साइट माइस्पेस के जरिये ऑनलाइन दोस्ती हो गई। दोस्त के बारे में वह सोचती थी कि वह उसके जैसा ही है और कहीं आस-पास ही रहने वाला है। लेकिन उसका यह दोस्त एक ऐसे लोगों का ग्रुप था जिसमें वयस्क भी शामिल थे और जिसका मुख्य उद्देश्य इस लड़की को अपमानित करना था। मेगन की दोस्ती में जब खटास आने लगी तो वह बहुत दुखी हुई और उसने आत्महत्या कर ली।
एक और किशोर उम्र की लड़की ने फेसबुक पर फेक अकाउण्ट बनाकर उसमें ऐसी लड़की के खिलाफ प्रतियोगिता आयोजित की जो एक छात्र पर फिदा थी। अकाउण्ट बनाने वाली लड़की भी उसे चाहती थी। उसने यह अकाउण्ट इसलिए बनाया क्योंकि वह उस लड़के को खुद पाना चाहती थी। इस लड़की की चाल का शिकार होने वाली लड़की बुरी तरह तनाव में आ गई जिससे वह आत्महत्या करने को मजबूर हो गई।
फेसबुक और माईस्पेस अकाउण्ट के ये मात्र दो उदाहरण मात्र हैं जिसके जरिये किशोरों में उच्च स्तर का तनाव पैदा किया गया। यह दोनों ही साइबर अपराध के केस हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इस तरह की साइबर बुलिंग के केवल पांच प्रतिशत केस ही लिखित में दर्ज किए जाते हैं।
इन उदाहरणों से यह समझने में मदद मिलती है कि साइबर कानूनों की उपयोगिता मात्र कानूनों के अस्तित्व में आने भर से ही पूर्ण नहीं हो जाती। न्यू मीडिया के क्षेत्र में इन कानूनों की उपयोगिता तब है जब ये कानून लोगों की जानकारी में हों और वे जान सकें कि इन कानूनों का उपयोग वे किन-किन परिस्थितियों में कर सकते हैं। अर्थात सरल शब्दों में यह कह सकते हैं कि न्यू मीडिया में कानून की उपयोगिता तो है ही साथ ही सबसे ज्यादा आवश्यकता है कानूनों के बारे में जागरूकता की। कुछ क्षेत्रों में कानूनों को और व्यापक और व्यावहारिक बनाने की भी आवश्यकता है क्योंकि भारत के लिए साइबर क्षेत्र में तकनीकी स्तर पर बहुत ज्यादा काम हो ही नहीं सकता क्योंकि यहां काम करने वाली वेबसाइटों में से ज्यादातर के सर्वर देश से बाहर स्थित हैं जिन पर उन्हीं देशों का कानून चलता है। अगर उस देश के साथ भारत के अच्छे सम्बन्ध हैं तो उससे जानकारी मांगी जा सकती है जिसके भी मिलने की कोई गारंटी नहीं होती और वो जानकारी कितने समय में मिलेगी, इसका भी कोई हिसाब नहीं होता फिर भी न्यू मीडिया जो कि अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम बनता जा रहा है को और प्रामाणिक तरीके से उपयोग करने के लिए आवश्यक है कि उस पर कानून उचित रूप से लागू हों। किसी भी बात की प्रामाणिकता के लिए आज भी हम ब्रिटानिका जैसी किताबों पर ही ज्यादा भरोसा करना पसंद करते हैं बजाय कि किसी वेबसाइट पर लिखी जानकारी के क्योंकि प्रिंट माध्यम में उचित कानून बनाए जा चुके हैं। न्यू मीडिया पर आम आदमी का विश्वास बनाने के लिए आवश्यक है कि न्यू मीडिया में भी ऐसे कानून बनाए जाएं जिससे कि प्रामाणिक जानकारी लागों को मिल सके। न्यू मीडिया में कानून की सबसे बड़ी उपयोगिता यही होगी कि साइबर अपराधों में कमी आए और कंटेंट में प्रामाणिकता का अहसास हो सके।
यह सूचना किसी तथ्यता पर ही आधारित हो यह जरूरी नहीं है। कोई भी व्यक्ति छद्म नाम से किसी को गैरप्रामाणिक सूचना दे सकता है जिससे कि उस सूचना की जवाबदेही व्यक्ति की नहीं रह जाती। कई बार ऐसा देखने में आता है कि कोई व्यक्ति जो न्यू मीडिया पर नहीं भी होता है उसका कोई फर्जी अकाउण्ट न्यू मीडिया पर खोल दिया जाता है और उस अकाउण्ट के जरिये से व्यक्ति की प्रतिष्ठा को हानि पहुंचाई जा सकती है साथ ही उस व्यक्ति की व्यावसायिक साख का फायदा अपना कार्य करने में भी उठाया जा सकता है। उदाहरणस्वरूप हाल ही में देखने आया कि जी न्यूज के राजनीतिक संपादक पुण्य प्रसून वाजपेयी का फेसबुक पर कोई अकाउण्ट चलता हुआ मिला, यह खाता पुण्य प्रसून के नाम से चलाया जा रहा था और पुण्य प्रसून जो भी पोस्ट अपने ब्लॉग पर करते थे उस पोस्ट की लिंक को इस खाते पर डाल दिया जाता था। मीडिया का प्रतिष्ठित नाम होने की वजह से कुछ ही समय में इस खाते के मित्र सदस्यों की संख्या पांच हजार को छू गई। मित्रों के द्वारा पुण्य प्रसून को पता चला तो उन्होंने खाते की गतिविधियों से अनभिज्ञता दिखाई। हालांकि इस खाते से कोई गलत कार्य नहीं किया गया किन्तु इस बात की संभावना से मना नहीं किया जा सकता कि उस खाते से किसी व्यक्ति की नौकरी आदि में अप्रोच भी लगाई जा सकती थी। इस प्रकार न्यू मीडिया के द्वारा फर्जी तरीके से व्यावसायिक हितों में उपयोग हो सकता है।
न्यू मीडिया के द्वारा रोज नए-नए तरीके से कोई ना कोई गैर कानूनी कार्य होने लगा है इसलिए यह जरूरी हो गया है कि न्यू मीडिया को कानून के घेरे में लाया जाए। कानून सिर्फ नकारात्मक नहीं होता। कानून के द्वारा अभिव्यक्ति को एक प्रखरता ही मिलती है। वर्तमान में यदि किसी वेब पोर्टल पर नजर दौड़ाई जाए जहां पर किसी भी ब्लॉग पर किसी को भी कमेण्ट करने की स्वतंत्रता है तो वहां पर बहुत से ऐसे कमेण्ट्स देखने को मिल जाते हैं जो किसी ना किसी दुर्भावना से बहुत ही अनर्गल भाषा में लिखे जाते हैं। ये कमेंट्स बताते हैं कि अभी न्यू मीडिया पर कार्य करने की हमारी शैली परिपक्वता के स्तर तक नहीं पहुंच पाई है। बच्चे हर किसी के घर में होते हैं और हर कोई जानता है कि उनमें परिपक्वता की कमी होती है इसीलिए उनको देखभाल की आवश्यकता होती है, कुछ नियमों की आवश्यकता होती है, कुछ बंधनों की आवश्यकता होती है। ठीक इसी प्रकार जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि न्यू मीडिया के हमारे समाज में दस्तक दिए हुए बहुत अधिक समय नहीं हुआ है। वह अभी अपरिपक्व अवस्था में है। उसे अभी जरूरत है देखभाल की, निगरानी की। जब प्रिंट मीडिया की शुरूआत हुई थी तब बहुत से नियम, कायदे-कानून उस पर लादे गए थे। लोगों ने इन कायदे-कानूनों के कारण सीखा कि कैसे प्रिंट मीडिया का सदुपयोग किया जा सकता है। इन निगरानी का सबसे बड़ा फायदा यह भी रहा कि शुरू से ही प्रिंट मीडिया अपने दुरुपयोग से दूर रही। जिस देश में पूर्ण स्वच्छंदता प्रिंट मीडिया को दी गई वहीं पर उसका दुरुपयोग किया गया। रूपर्ट मर्डोक का ‘न्यूज ऑफ द वर्ल्ड ऐसे ही अखबारों में गिना जाता था जिसने मीडिया के किसी कानून को नहीं माना और किसी आचार-संहिता का पालन नहीं किया। उसका परिणाम आज हम सबके सामने है कि आज वह अखबार इतिहास बनकर रह गया है।
आज का न्यू मीडिया किशोर एवं किशोरियों के जीवन का अहम हिस्सा बन चुका है। डेली अपडेट, चैटिंग और स्टेटस जांचने में वे अपना काफी समय लगाते हैं। न्यू मीडिया पर सक्रियता नुकसानदायक नहीं है लेकिन इससे जब दूसरों को नुकसान पहुंचने लगे, तब यह खतरनाक साबित हो सकती है। इनके बहाने बच्चों के ऊपर जिस तरह के हमले हो रहे हैं, उन्हें कई बच्चे घरवालों को बताते तक नहीं।
ग्लोबल मार्केट रिसर्च कम्पनी, इप्सोस द्वारा भारतीय बच्चों पर किए गए सर्वे के अनुसार दस में से तीन भारतीय अभिभावकों का मानना है कि उनका बच्चा सोशल नेटवर्किंग साइट्स जैसे फेसबुक और ऑर्कुट के जरिये साइबर बुलिंग का शिकार बना। सर्वे में पाया गया कि 45 प्रतिशत भारतीय पैरेंट्स मानते हैं कि उनके बच्चों का उनके साथियों द्वारा शोषण किया जाता है। 60 प्रतिशत लोगों का मानना है कि साइबर बुलिंग को पंख लगाने का काम सोशल नेटवर्किंग साइट्स जैसे फेसबुक आदि के द्वारा हुआ है।
हाल ही में उत्तराखण्ड के एक नामी गिरामी व्यवसायी की पत्नी का फेसबुक पर फेक अकाउण्ट बनाया गया और उस अकाउण्ट को ऐसे ऑपरेट किया गया कि वह असली अकाउण्ट हो, इस तरह शुरू में दोस्त बना लेने के बाद उस अकाउण्ट पर आपत्तिजनक कंटेंट बनाकर डाला जाने लगा। साइबर दुनिया से अनभिज्ञ उन महिला को जब दोस्तों के द्वारा इसका पता चला तो उन्होंने देहरादून में पुलिस से सम्पर्क किया। पुलिस ने इसको साइबर अपराध के प्रावधान के तहत माना और कार्यवाही करके वह फर्जी फेसबुक अकाउण्ट बन्द करवा दिया।
इसी तरह एक चार्टर्ड एकाउण्टेंट ने अपने तहत काम कर रहे एक कर्मचारी की तनख्वाह कुछ महीनों से रोक रखी थी जिससे तंग आकर उस कर्मचारी ने चुपके से सीए के व्यावसायिक कम्प्यूटर में एक वाइरस डाल दिया जिससे कि सभी ‘4’ अंक ‘3’ अंक में बदल गए। सीए का तो सारा काम ही चैपट हो गया। उसने पुलिस में शिकायत की। इसको भी साइबर अपराध की श्रेणी में रखा गया और पुलिस ने उस कर्मचारी के ऊपर अपना शिकंजा कसा।
उपरोक्त उदाहरणों से पता चलता है कि न्यू मीडिया के आ जाने और छा जाने से ही सब-कुछ नहीं हो जाता। न्यू मीडिया को एक सही दिशा में अग्रसरित करने के लिए कुछ कानूनों का होना अत्यंत आवश्यक है। कानूनों की बदौलत ही हम न्यू मीडिया के घातक दुरूपयोगों से बच सकते हैं। किसी के घर में चोरी हो जाए तो चोर को पकड़ कर चोरी गया माल तब भी पकड़ा जा सकता है लेकिन न्यू मीडिया के अपराधों में से ज्यादातर की भरपाई करना लगभग असम्भव होता है। ना तो किसी की प्रतिष्ठा में हुए क्षय को लौटाया जा सकता है और ना ही किसी सीए के कम्प्यूटर के क्षतिग्रस्त हुए आंकड़ों को दोबारा पाया जा सकता है। साइबर मीडिया को इस लाइलाज मर्ज से बचाने का एक यही उपाय है कि ऐसे अपराधों के खिलाफ कड़े से कड़े प्रावधान कानून में रखे जाएं। इन कड़े प्रावधानों के कारण ही ऐसे अपराधों में कमी लाई जा सकती है।
देखा गया है कि साइबर अपराधों का शिकार ज्यादातर किशोर हो रहे हैं। मसूरी में 13 वर्ष की मेगन मीयर नाम की लड़की थी। उसकी सोशल नेटर्किंग साइट माइस्पेस के जरिये ऑनलाइन दोस्ती हो गई। दोस्त के बारे में वह सोचती थी कि वह उसके जैसा ही है और कहीं आस-पास ही रहने वाला है। लेकिन उसका यह दोस्त एक ऐसे लोगों का ग्रुप था जिसमें वयस्क भी शामिल थे और जिसका मुख्य उद्देश्य इस लड़की को अपमानित करना था। मेगन की दोस्ती में जब खटास आने लगी तो वह बहुत दुखी हुई और उसने आत्महत्या कर ली।
एक और किशोर उम्र की लड़की ने फेसबुक पर फेक अकाउण्ट बनाकर उसमें ऐसी लड़की के खिलाफ प्रतियोगिता आयोजित की जो एक छात्र पर फिदा थी। अकाउण्ट बनाने वाली लड़की भी उसे चाहती थी। उसने यह अकाउण्ट इसलिए बनाया क्योंकि वह उस लड़के को खुद पाना चाहती थी। इस लड़की की चाल का शिकार होने वाली लड़की बुरी तरह तनाव में आ गई जिससे वह आत्महत्या करने को मजबूर हो गई।
फेसबुक और माईस्पेस अकाउण्ट के ये मात्र दो उदाहरण मात्र हैं जिसके जरिये किशोरों में उच्च स्तर का तनाव पैदा किया गया। यह दोनों ही साइबर अपराध के केस हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इस तरह की साइबर बुलिंग के केवल पांच प्रतिशत केस ही लिखित में दर्ज किए जाते हैं।
इन उदाहरणों से यह समझने में मदद मिलती है कि साइबर कानूनों की उपयोगिता मात्र कानूनों के अस्तित्व में आने भर से ही पूर्ण नहीं हो जाती। न्यू मीडिया के क्षेत्र में इन कानूनों की उपयोगिता तब है जब ये कानून लोगों की जानकारी में हों और वे जान सकें कि इन कानूनों का उपयोग वे किन-किन परिस्थितियों में कर सकते हैं। अर्थात सरल शब्दों में यह कह सकते हैं कि न्यू मीडिया में कानून की उपयोगिता तो है ही साथ ही सबसे ज्यादा आवश्यकता है कानूनों के बारे में जागरूकता की। कुछ क्षेत्रों में कानूनों को और व्यापक और व्यावहारिक बनाने की भी आवश्यकता है क्योंकि भारत के लिए साइबर क्षेत्र में तकनीकी स्तर पर बहुत ज्यादा काम हो ही नहीं सकता क्योंकि यहां काम करने वाली वेबसाइटों में से ज्यादातर के सर्वर देश से बाहर स्थित हैं जिन पर उन्हीं देशों का कानून चलता है। अगर उस देश के साथ भारत के अच्छे सम्बन्ध हैं तो उससे जानकारी मांगी जा सकती है जिसके भी मिलने की कोई गारंटी नहीं होती और वो जानकारी कितने समय में मिलेगी, इसका भी कोई हिसाब नहीं होता फिर भी न्यू मीडिया जो कि अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम बनता जा रहा है को और प्रामाणिक तरीके से उपयोग करने के लिए आवश्यक है कि उस पर कानून उचित रूप से लागू हों। किसी भी बात की प्रामाणिकता के लिए आज भी हम ब्रिटानिका जैसी किताबों पर ही ज्यादा भरोसा करना पसंद करते हैं बजाय कि किसी वेबसाइट पर लिखी जानकारी के क्योंकि प्रिंट माध्यम में उचित कानून बनाए जा चुके हैं। न्यू मीडिया पर आम आदमी का विश्वास बनाने के लिए आवश्यक है कि न्यू मीडिया में भी ऐसे कानून बनाए जाएं जिससे कि प्रामाणिक जानकारी लागों को मिल सके। न्यू मीडिया में कानून की सबसे बड़ी उपयोगिता यही होगी कि साइबर अपराधों में कमी आए और कंटेंट में प्रामाणिकता का अहसास हो सके।
न्यू मीडिया क्या है?
मनुष्यमात्र की भाषायी अथवा कलात्मक अभिव्यक्ति को एक से अधिक व्यक्तियों तथा स्थानों तक पहुँचाने की व्यवस्था को ही मीडिया का नाम दिया गया है। पिछली कई सदियों से प्रिंट मीडिया इस संदर्भ में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती आ रही है, जहाँ हमारी लिखित अभिव्यक्ति पहले तो पाठ्य रूप में प्रसारित होती रही तथा बाद में छायाचित्रों का समावेश संभव होने पर दृश्य अभिव्यक्ति भी प्रिंट मीडिया के द्वारा संभव हो सकी। यह मीडिया बहुरंगी कलेवर में और भी प्रभावी हुई। बाद में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी साथ-साथ अपनी जगह बनाई, जहाँ पहले तो श्रव्य अभिव्यक्ति को रेडियो के माध्यम से प्रसारित करना संभव हुआ तथा बाद में टेलीविजन के माध्यम से श्रव्य-दृश्य दोनों ही अभिव्यक्तियों का प्रसारण संभव हो सका। प्रिंट मीडिया की अपेक्षा यहाँ की दृश्य अभिव्यक्ति अधिक प्रभावी हुई, क्योंकि यहाँ चलायमान दृश्य अभिव्यक्ति भी संभव हुई। बीसवीं सदी में कंप्यूटर के विकास के साथ-साथ एक नए माध्यम ने जन्म लिया, जो डिजिटल है। प्रारंभ में डाटा के सुविधाजनक आदान-प्रदान के लिए शुरू की गई कंप्यूटर आधारित सीमित इंटरनेट सेवा ने आज विश्वव्यापी रूप अख्तियार कर लिया है। इंटरनेट के प्रचार-प्रसार और निरंतर तकनीकी विकास ने एक ऐसी वेब मीडिया को जन्म दिया, जहाँ अभिव्यक्ति के पाठ्य, दृश्य, श्रव्य एवं दृश्य-श्रव्य सभी रूपों का एक साथ क्षणमात्र में प्रसारण संभव हुआ।
यह वेब मीडिया ही ‘न्यू मीडिया’ है, जो एक कंपोजिट मीडिया है, जहाँ संपूर्ण और तत्काल अभिव्यक्ति संभव है, जहाँ एक शीर्षक अथवा विषय पर उपलब्ध सभी अभिव्यक्यिों की एक साथ जानकारी प्राप्त करना संभव है, जहाँ किसी अभिव्यक्ति पर तत्काल प्रतिक्रिया देना ही संभव नहीं, बल्कि उस अभिव्यक्ति को उस पर प्राप्त सभी प्रतिक्रियाओं के साथ एक जगह साथ-साथ देख पाना भी संभव है। इतना ही नहीं, यह मीडिया लोकतंत्र में नागरिकों के वोट के अधिकार के समान ही हरेक व्यक्ति की भागीदारी के लिए हर क्षण उपलब्ध और खुली हुई है।
‘न्यू मीडिया’ पर अपनी अभिव्यक्ति के प्रकाशन-प्रसारण के अनेक रूप हैं। कोई अपनी स्वतंत्र ‘वेबसाइट’ निर्मित कर वेब मीडिया पर अपना एक निश्चित पता आौर स्थान निर्धारित कर अपनी अभिव्यक्तियों को प्रकाशित-प्रसारित कर सकता है। अन्यथा बहुत-सी ऐसी वेबसाइटें उपलब्ध हैं, जहाँ कोई भी अपने लिए पता और स्थान आरक्षित कर सकता है। अपने निर्धारित पते के माध्यम से कोई भी इन वेबसाइटों पर अपने लिए उपलब्ध स्थान का उपयोग करते हुए अपनी सूचनात्मक, रचनात्मक, कलात्मक अभिव्यक्ति के पाठ्य अथवा ऑडियो/वीडियो डिजिटल रूप को अपलोड कर सकता है, जो तत्क्षण दुनिया में कहीं भी देखे-सुने जाने के लिए उपलब्ध हो जाती है।
बहुत-सी वेबसाइटें संवाद के लिए समूह-निर्माण की सुविधा देती हैं, जहाँ समान विचारों अथवा उद्देश्यों वाले लोग एक-दूसरे से जुड़कर संवाद कायम कर सकें। ‘वेबग्रुप’ की इस अवधारणा से कई कदम आगे बढ़कर फेसबुक और ट्विटर जैसी ऐसी वेबसाइटें भी मौजूद हैं, जो प्रायः पूरी तरह समूह-संवाद केन्द्रित हैं। इनसे जुड़कर कोई भी अपनी मित्रता का दायरा दुनिया के किसी भी कोने तक बढ़ा सकता है और मित्रों के बीच जीवंत, विचारोत्तेजक, जरूरी विचार-विमर्श को अंजाम दे सकता है। इसे सोशल नेटवर्किंग का नाम दिया गया है।
‘न्यू मीडिया’ से जो एक अन्य सर्वाधिक लोकप्रिय उपक्रम जुड़ा है, वह है ‘ब्लॉगिंग’ का। कई वेबसाइटें ऐसी हैं, जहाँ कोई भी अपना पता और स्थान आरक्षित कर अपनी रुचि और अभिव्यक्ति के अनुरूप अपनी एक मिनी वेबसाइट का निर्माण बिना किसी शुल्क के कर सकता है। प्रारंभ में ‘वेब लॉग’ के नाम से जाना जानेवाला यह उपक्रम अब ‘ब्लॉग’ के नाम से सुपरिचित है। अभिव्यक्ति के अनुसार ही ब्लॉग पाठ्य ब्लॉग, फोटो ब्लॉग, वीडियो ब्लॉग (वोडकास्ट), म्यूजिक ब्लॉग, रेडियो ब्लॉग (पोडकास्ट), कार्टून ब्लॉग आदि किसी भी तरह के हो सकते हैं। यहाँ आप नियमित रूप से उपस्थित होकर अपनी अभिव्यक्ति अपलोड कर सकते हैं और उस पर प्राप्त प्रतिक्रियाओं को इंटरैक्ट कर सकते हैं। ‘ब्लॉग’ निजी और सामूहिक दोनों तरह के हो सकते हैं। यहाँ अपनी मौलिक अभिव्यक्ति के अलावा दूसरों की अभिव्यक्तियों को भी एक-दूसरे के साथ शेयर करने के लिए रखा जा सकता है।
बहुत से लोग ‘ब्लॉग’ को एक डायरी के रूप में देखते हैं, जो नियमित रूप से वेब पर लिखी जा रही है, एक ऐसी डायरी, जो लिखे जाने के साथ ही सार्वजनिक भी है, सबके लिए उपलब्ध है, सबकी प्रतिक्रिया के लिए भी। एक नजरिये से ‘ब्लॉग’ नियमित रूप से लिखी जानेवाली चिट्ठी है, जो हरेक वेबपाठक को संबोधित है, पढ़े जाने के लिए, देखे-सुने जाने के लिए और उचित हो तो समुचित प्रत्युत्तर के लिए भी।
वास्तव में ‘न्यू मीडिया’ मीडिया के क्षेत्र में एक नई चीज है। यह चीज यूं तो अब बहुत नई नहीं रह गई है लेकिन यह क्षेत्र पूर्णतः तकनीक पर आधारित होने के कारण इस क्षेत्र में प्रतिदिन कुछ ना कुछ नया जुड़ता ही जा रहा है। शुरुआत में जब टेलीविजन और रेडियो नए-नए आए थे तब इनको न्यू मीडिया कहा जाता था। बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब पत्रकारिता के विद्यार्थी न्यू मीडिया के रूप में टेलीविजन और रेडियो को पढ़ा और लिखा करते थे, तकनीक में धीरे-धीरे उन्नति हुई और न्यू मीडिया का स्वरूप भी बदलता चला गया और आज हम न्यू मीडिया के रूप में वह सभी चीजें देखते हैं जो कि डिजिटल रूप में हमारे आस-पास मौजूद हैं। न्यू मीडिया को समझाने की बहुत से लोगों ने अपने-अपने तरीके से कोशिश की है। न्यू मीडिया के क्षेत्र में जाने पहचाने नाम हैं प्रभासाक्षी डॉट कॉम के बालेन्दु शर्मा दाधीच। वे कहते हैं कि-
यूं तो दो-ढाई दशक की जीवनयात्रा के बाद शायद ‘न्यू मीडिया’ का नाम ‘न्यू मीडिया’ नहीं रह जाना चाहिए क्योंकि वह सुपरिचित, सुप्रचलित और परिपक्व सेक्टर का रूप ले चुका है। लेकिन शायद वह हमेशा ‘न्यू मीडिया’ ही बना रहे क्योंकि पुरानापन उसकी प्रवृत्ति ही नहीं है। वह जेट युग की रफ्तार के अनुरूप अचंभित कर देने वाली तेजी के साथ निरंतर विकसित भी हो रहा है और नए पहलुओं, नए स्वरूपों, नए माध्यमों, नए प्रयोगों और नई अभिव्यक्तियों से संपन्न भी होता जा रहा है। नवीनता और सृजनात्मकता नए जमाने के इस नए मीडिया की स्वाभाविक प्रवृत्तियां हैं। यह कल्पनाओं की गति से बढ़ने वाला मीडिया है जो संभवतः निरंतर बदलाव और नएपन से गुजरता रहेगा, और नया बना रहेगा। फिर भी न्यू मीडिया को लेकर भ्रम की स्थिति आज भी कायम है। अधिकांश लोग न्यू मीडिया का अर्थ इंटरनेट के जरिए होने वाली पत्रकारिता से लगाते हैं। लेकिन न्यू मीडिया समाचारों, लेखों, सृजनात्मक लेखन या पत्रकारिता तक सीमित नहीं है। वास्तव में न्यू मीडिया की परिभाषा पारंपरिक मीडिया की तर्ज पर दी ही नहीं जा सकती। न सिर्फ समाचार पत्रों की वेबसाइटें और पोर्टल न्यू मीडिया के दायरे में आते हैं बल्कि नौकरी ढूंढने वाली वेबसाइट, रिश्ते तलाशने वाले पोर्टल, ब्लॉग, स्ट्रीमिंग ऑडियो-वीडियो, ईमेल, चैटिंग, इंटरनेट-फोन, इंटरनेट पर होने वाली खरीददारी, नीलामी, फिल्मों की सीडी-डीवीडी, डिजिटल कैमरे से लिए फोटोग्राफ, इंटरनेट सर्वेक्षण, इंटरनेट आधारित चर्चा के मंच, दोस्त बनाने वाली वेबसाइटें और सॉफ्टवेयर तक न्यू मीडिया का हिस्सा हैं। न्यू मीडिया को पत्रकारिता का एक स्वरूप भर समझने वालों को अचंभित करने के लिए शायद इतना काफी है, लेकिन न्यू मीडिया इन तक भी सीमित नहीं है। ये तो उसके अनुप्रयोगों की एक छोटी सी सूची भर है और ये अनुप्रयोग निरंतर बढ़ रहे हैं। जब आप यह लेख पढ़ रहे होंगे, तब कहीं न कहीं, कोई न कोई व्यक्ति न्यू मीडिया का कोई और रचनात्मक अनुप्रयोग शुरू कर रहा होगा।
न्यू मीडिया अपने स्वरूप, आकार और संयोजन में मीडिया के पारंपरिक रूपों से भिन्न और उनकी तुलना में काफी व्यापक है। पारंपरिक रूप से मीडिया या मास मीडिया शब्दों का इस्तेमाल किसी एक माध्यम पर आश्रित मीडिया के लिए किया जाता है, जैसे कि कागज पर मुद्रित विषयवस्तु का प्रतिनिधित्व करने वाला प्रिंट मीडिया, टेलीविजन या रेडियो जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से दर्शक या श्रोता तक पहुंचने वाला इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। न्यू मीडिया इस सीमा से काफी हद तक मुक्त तो है ही, पारंपरिक मीडिया की तुलना में अधिक व्यापक भी है।
पत्रकारिता ही क्या, न्यू मीडिया तो इंटरनेट की सीमाओं में बंधकर रहने को भी तैयार नहीं है। और तो और, यह कंप्यूटर आधारित मीडिया भर भी नहीं रह गया है। न्यू मीडिया का दायरा इन सब सीमाओं से कहीं आगे तक है। हां, 1995 के बाद इंटरनेट के लोकप्रिय होने पर न्यू मीडिया को अपने विकास और प्रसार के लिए अभूतपूर्व क्षमताओं से युक्त एक स्वाभाविक माध्यम जरूर मिल गया।
न्यू मीडिया किसी भी आंकिक (डिजिटल) माध्यम से प्राप्त की, प्रसंस्कृत की या प्रदान की जाने वाली सेवाओं का समग्र रूप है। इस मीडिया की विषयवस्तु की रचना या प्रयोग के लिए किसी न किसी तरह के कंप्यूटिंग माध्यम की जरूरत पड़ती है। जरूरी नहीं कि वह माध्यम कंप्यूटर ही हो। वह किसी भी किस्म की इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल युक्ति हो सकती है जिसमें आंकिक गणनाओं या प्रोसेसिंग की क्षमता मौजूद हो, जैसे कि मोबाइल फोन, पर्सनल डिजिटल असिस्टेंट (पीडीए), आई-पॉड, सोनी पीएसपी, ई-बुक रीडर जैसी युक्तियां और यहां तक कि बैंक एटीएम मशीन तक। न्यू मीडिया के अधिकांश माध्यमों में उनके उपभोक्ताओं के साथ संदेशों या संकेतों के आदान-प्रदान की क्षमता होती है जिसे हम ‘इंटरएक्टिविटी’ के रूप में जानते हैं।
न्यू मीडिया के क्षेत्र में हिन्दी की पहली वेब पत्रिका भारत दर्शन को शुरु करने वाले न्यूजीलैण्ड के अप्रवासी भारतीय रोहित हैप्पी का कहना है किः-
‘न्यू मीडिया’ संचार का वह संवादात्मक स्वरूप है जिसमें इंटरनेट का उपयोग करते हुए हम पॉडकास्ट, आर एस एस फीड, सोशल नेटवर्क (फेसबुक, माई स्पेस, ट्विटर), ब्लाग्स, विक्किस, टैक्सट मैसेजिंग इत्यादि का उपयोग करते हुए पारस्परिक संवाद स्थापित करते हैं। यह संवाद माध्यम बहु-संचार संवाद का रूप धारण कर लेता है जिसमें पाठक/दर्शक/श्रोता तुरंत अपनी टिप्पणी न केवल लेखक/प्रकाशक से साझा कर सकते हैं, बल्कि अन्य लोग भी प्रकाशित/प्रसारित/संचारित विषय-वस्तु पर अपनी टिप्पणी दे सकते हैं। यह टिप्पणियां एक से अधिक भी हो सकती हैं। बहुधा सशक्त टिप्पणियां परिचर्चा में परिवर्तित हो जाती हैं।
वे फेसबुक का उदाहरण देकर समझाते हैं कि- यदि आप कोई संदेश प्रकाशित करते हैं और बहुत से लोग आपकी विषय-वस्तु पर टिप्पणी करते हैं तो कई बार पाठक वर्ग परस्पर परिचर्चा आरम्भ कर देते हैं और लेखक एक से अधिक टिप्पणियों का उत्तर देता है। वे कहते हैं कि न्यू मीडिया वास्तव में परम्परागत मीडिया का संशोधित रूप है जिसमें तकनीकी क्रांतिकारी परिवर्तन व इसका नया रूप सम्मिलित है। न्यू मीडिया का उपयोग करने हेतु कम्प्यूटर, मोबाइल जैसे उपकरण जिनमें इंटरनेट की सुविधा हो, की आवश्यकता होती है। न्यू मीडिया प्रत्येक व्यक्ति को विषय-वस्तु का सृजन, परिवर्धन, विषय-वस्तु का अन्य लोगों से साझा करने का अवसर समान रूप से प्रदान करता है। न्यू मीडिया के लिए उपयोग किए जाने वाले संसाधन अधिकतर निशुल्क या काफी सस्ते उपलब्ध हो जाते हैं।
संक्षेप में कह सकते हैं कि न्यू मीडिया एक ऐसा माध्यम है जिसमें लेखक ही संपादक है और वही प्रकाशक भी है। यह ऐसा माध्यम है जो भौगोलिक सीमाओं से पूरी तरह मुक्त, और राजनैतिक-सामाजिक नियंत्रण से लगभग स्वतंत्र है। जहां अभिव्यक्ति न कायदों में बंधने को मजबूर है, न अल कायदा से डरने को। इस माध्यम में न समय की कोई समस्या है, न सर्कुलेशन की कमी, न महीने भर तक पाठकीय प्रतिक्रियाओं का इंतजार करने की जरूरत। त्वरित अभिव्यक्ति, त्वरित प्रसारण, त्वरित प्रतिक्रिया और विश्वव्यापी प्रसार के चलते ही न्यू मीडिया का स्वरूप अद्वितीय रूप से लोकप्रिय हो गया है।
यह वेब मीडिया ही ‘न्यू मीडिया’ है, जो एक कंपोजिट मीडिया है, जहाँ संपूर्ण और तत्काल अभिव्यक्ति संभव है, जहाँ एक शीर्षक अथवा विषय पर उपलब्ध सभी अभिव्यक्यिों की एक साथ जानकारी प्राप्त करना संभव है, जहाँ किसी अभिव्यक्ति पर तत्काल प्रतिक्रिया देना ही संभव नहीं, बल्कि उस अभिव्यक्ति को उस पर प्राप्त सभी प्रतिक्रियाओं के साथ एक जगह साथ-साथ देख पाना भी संभव है। इतना ही नहीं, यह मीडिया लोकतंत्र में नागरिकों के वोट के अधिकार के समान ही हरेक व्यक्ति की भागीदारी के लिए हर क्षण उपलब्ध और खुली हुई है।
‘न्यू मीडिया’ पर अपनी अभिव्यक्ति के प्रकाशन-प्रसारण के अनेक रूप हैं। कोई अपनी स्वतंत्र ‘वेबसाइट’ निर्मित कर वेब मीडिया पर अपना एक निश्चित पता आौर स्थान निर्धारित कर अपनी अभिव्यक्तियों को प्रकाशित-प्रसारित कर सकता है। अन्यथा बहुत-सी ऐसी वेबसाइटें उपलब्ध हैं, जहाँ कोई भी अपने लिए पता और स्थान आरक्षित कर सकता है। अपने निर्धारित पते के माध्यम से कोई भी इन वेबसाइटों पर अपने लिए उपलब्ध स्थान का उपयोग करते हुए अपनी सूचनात्मक, रचनात्मक, कलात्मक अभिव्यक्ति के पाठ्य अथवा ऑडियो/वीडियो डिजिटल रूप को अपलोड कर सकता है, जो तत्क्षण दुनिया में कहीं भी देखे-सुने जाने के लिए उपलब्ध हो जाती है।
बहुत-सी वेबसाइटें संवाद के लिए समूह-निर्माण की सुविधा देती हैं, जहाँ समान विचारों अथवा उद्देश्यों वाले लोग एक-दूसरे से जुड़कर संवाद कायम कर सकें। ‘वेबग्रुप’ की इस अवधारणा से कई कदम आगे बढ़कर फेसबुक और ट्विटर जैसी ऐसी वेबसाइटें भी मौजूद हैं, जो प्रायः पूरी तरह समूह-संवाद केन्द्रित हैं। इनसे जुड़कर कोई भी अपनी मित्रता का दायरा दुनिया के किसी भी कोने तक बढ़ा सकता है और मित्रों के बीच जीवंत, विचारोत्तेजक, जरूरी विचार-विमर्श को अंजाम दे सकता है। इसे सोशल नेटवर्किंग का नाम दिया गया है।
‘न्यू मीडिया’ से जो एक अन्य सर्वाधिक लोकप्रिय उपक्रम जुड़ा है, वह है ‘ब्लॉगिंग’ का। कई वेबसाइटें ऐसी हैं, जहाँ कोई भी अपना पता और स्थान आरक्षित कर अपनी रुचि और अभिव्यक्ति के अनुरूप अपनी एक मिनी वेबसाइट का निर्माण बिना किसी शुल्क के कर सकता है। प्रारंभ में ‘वेब लॉग’ के नाम से जाना जानेवाला यह उपक्रम अब ‘ब्लॉग’ के नाम से सुपरिचित है। अभिव्यक्ति के अनुसार ही ब्लॉग पाठ्य ब्लॉग, फोटो ब्लॉग, वीडियो ब्लॉग (वोडकास्ट), म्यूजिक ब्लॉग, रेडियो ब्लॉग (पोडकास्ट), कार्टून ब्लॉग आदि किसी भी तरह के हो सकते हैं। यहाँ आप नियमित रूप से उपस्थित होकर अपनी अभिव्यक्ति अपलोड कर सकते हैं और उस पर प्राप्त प्रतिक्रियाओं को इंटरैक्ट कर सकते हैं। ‘ब्लॉग’ निजी और सामूहिक दोनों तरह के हो सकते हैं। यहाँ अपनी मौलिक अभिव्यक्ति के अलावा दूसरों की अभिव्यक्तियों को भी एक-दूसरे के साथ शेयर करने के लिए रखा जा सकता है।
बहुत से लोग ‘ब्लॉग’ को एक डायरी के रूप में देखते हैं, जो नियमित रूप से वेब पर लिखी जा रही है, एक ऐसी डायरी, जो लिखे जाने के साथ ही सार्वजनिक भी है, सबके लिए उपलब्ध है, सबकी प्रतिक्रिया के लिए भी। एक नजरिये से ‘ब्लॉग’ नियमित रूप से लिखी जानेवाली चिट्ठी है, जो हरेक वेबपाठक को संबोधित है, पढ़े जाने के लिए, देखे-सुने जाने के लिए और उचित हो तो समुचित प्रत्युत्तर के लिए भी।
वास्तव में ‘न्यू मीडिया’ मीडिया के क्षेत्र में एक नई चीज है। यह चीज यूं तो अब बहुत नई नहीं रह गई है लेकिन यह क्षेत्र पूर्णतः तकनीक पर आधारित होने के कारण इस क्षेत्र में प्रतिदिन कुछ ना कुछ नया जुड़ता ही जा रहा है। शुरुआत में जब टेलीविजन और रेडियो नए-नए आए थे तब इनको न्यू मीडिया कहा जाता था। बहुत ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब पत्रकारिता के विद्यार्थी न्यू मीडिया के रूप में टेलीविजन और रेडियो को पढ़ा और लिखा करते थे, तकनीक में धीरे-धीरे उन्नति हुई और न्यू मीडिया का स्वरूप भी बदलता चला गया और आज हम न्यू मीडिया के रूप में वह सभी चीजें देखते हैं जो कि डिजिटल रूप में हमारे आस-पास मौजूद हैं। न्यू मीडिया को समझाने की बहुत से लोगों ने अपने-अपने तरीके से कोशिश की है। न्यू मीडिया के क्षेत्र में जाने पहचाने नाम हैं प्रभासाक्षी डॉट कॉम के बालेन्दु शर्मा दाधीच। वे कहते हैं कि-
यूं तो दो-ढाई दशक की जीवनयात्रा के बाद शायद ‘न्यू मीडिया’ का नाम ‘न्यू मीडिया’ नहीं रह जाना चाहिए क्योंकि वह सुपरिचित, सुप्रचलित और परिपक्व सेक्टर का रूप ले चुका है। लेकिन शायद वह हमेशा ‘न्यू मीडिया’ ही बना रहे क्योंकि पुरानापन उसकी प्रवृत्ति ही नहीं है। वह जेट युग की रफ्तार के अनुरूप अचंभित कर देने वाली तेजी के साथ निरंतर विकसित भी हो रहा है और नए पहलुओं, नए स्वरूपों, नए माध्यमों, नए प्रयोगों और नई अभिव्यक्तियों से संपन्न भी होता जा रहा है। नवीनता और सृजनात्मकता नए जमाने के इस नए मीडिया की स्वाभाविक प्रवृत्तियां हैं। यह कल्पनाओं की गति से बढ़ने वाला मीडिया है जो संभवतः निरंतर बदलाव और नएपन से गुजरता रहेगा, और नया बना रहेगा। फिर भी न्यू मीडिया को लेकर भ्रम की स्थिति आज भी कायम है। अधिकांश लोग न्यू मीडिया का अर्थ इंटरनेट के जरिए होने वाली पत्रकारिता से लगाते हैं। लेकिन न्यू मीडिया समाचारों, लेखों, सृजनात्मक लेखन या पत्रकारिता तक सीमित नहीं है। वास्तव में न्यू मीडिया की परिभाषा पारंपरिक मीडिया की तर्ज पर दी ही नहीं जा सकती। न सिर्फ समाचार पत्रों की वेबसाइटें और पोर्टल न्यू मीडिया के दायरे में आते हैं बल्कि नौकरी ढूंढने वाली वेबसाइट, रिश्ते तलाशने वाले पोर्टल, ब्लॉग, स्ट्रीमिंग ऑडियो-वीडियो, ईमेल, चैटिंग, इंटरनेट-फोन, इंटरनेट पर होने वाली खरीददारी, नीलामी, फिल्मों की सीडी-डीवीडी, डिजिटल कैमरे से लिए फोटोग्राफ, इंटरनेट सर्वेक्षण, इंटरनेट आधारित चर्चा के मंच, दोस्त बनाने वाली वेबसाइटें और सॉफ्टवेयर तक न्यू मीडिया का हिस्सा हैं। न्यू मीडिया को पत्रकारिता का एक स्वरूप भर समझने वालों को अचंभित करने के लिए शायद इतना काफी है, लेकिन न्यू मीडिया इन तक भी सीमित नहीं है। ये तो उसके अनुप्रयोगों की एक छोटी सी सूची भर है और ये अनुप्रयोग निरंतर बढ़ रहे हैं। जब आप यह लेख पढ़ रहे होंगे, तब कहीं न कहीं, कोई न कोई व्यक्ति न्यू मीडिया का कोई और रचनात्मक अनुप्रयोग शुरू कर रहा होगा।
न्यू मीडिया अपने स्वरूप, आकार और संयोजन में मीडिया के पारंपरिक रूपों से भिन्न और उनकी तुलना में काफी व्यापक है। पारंपरिक रूप से मीडिया या मास मीडिया शब्दों का इस्तेमाल किसी एक माध्यम पर आश्रित मीडिया के लिए किया जाता है, जैसे कि कागज पर मुद्रित विषयवस्तु का प्रतिनिधित्व करने वाला प्रिंट मीडिया, टेलीविजन या रेडियो जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से दर्शक या श्रोता तक पहुंचने वाला इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। न्यू मीडिया इस सीमा से काफी हद तक मुक्त तो है ही, पारंपरिक मीडिया की तुलना में अधिक व्यापक भी है।
पत्रकारिता ही क्या, न्यू मीडिया तो इंटरनेट की सीमाओं में बंधकर रहने को भी तैयार नहीं है। और तो और, यह कंप्यूटर आधारित मीडिया भर भी नहीं रह गया है। न्यू मीडिया का दायरा इन सब सीमाओं से कहीं आगे तक है। हां, 1995 के बाद इंटरनेट के लोकप्रिय होने पर न्यू मीडिया को अपने विकास और प्रसार के लिए अभूतपूर्व क्षमताओं से युक्त एक स्वाभाविक माध्यम जरूर मिल गया।
न्यू मीडिया किसी भी आंकिक (डिजिटल) माध्यम से प्राप्त की, प्रसंस्कृत की या प्रदान की जाने वाली सेवाओं का समग्र रूप है। इस मीडिया की विषयवस्तु की रचना या प्रयोग के लिए किसी न किसी तरह के कंप्यूटिंग माध्यम की जरूरत पड़ती है। जरूरी नहीं कि वह माध्यम कंप्यूटर ही हो। वह किसी भी किस्म की इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल युक्ति हो सकती है जिसमें आंकिक गणनाओं या प्रोसेसिंग की क्षमता मौजूद हो, जैसे कि मोबाइल फोन, पर्सनल डिजिटल असिस्टेंट (पीडीए), आई-पॉड, सोनी पीएसपी, ई-बुक रीडर जैसी युक्तियां और यहां तक कि बैंक एटीएम मशीन तक। न्यू मीडिया के अधिकांश माध्यमों में उनके उपभोक्ताओं के साथ संदेशों या संकेतों के आदान-प्रदान की क्षमता होती है जिसे हम ‘इंटरएक्टिविटी’ के रूप में जानते हैं।
न्यू मीडिया के क्षेत्र में हिन्दी की पहली वेब पत्रिका भारत दर्शन को शुरु करने वाले न्यूजीलैण्ड के अप्रवासी भारतीय रोहित हैप्पी का कहना है किः-
‘न्यू मीडिया’ संचार का वह संवादात्मक स्वरूप है जिसमें इंटरनेट का उपयोग करते हुए हम पॉडकास्ट, आर एस एस फीड, सोशल नेटवर्क (फेसबुक, माई स्पेस, ट्विटर), ब्लाग्स, विक्किस, टैक्सट मैसेजिंग इत्यादि का उपयोग करते हुए पारस्परिक संवाद स्थापित करते हैं। यह संवाद माध्यम बहु-संचार संवाद का रूप धारण कर लेता है जिसमें पाठक/दर्शक/श्रोता तुरंत अपनी टिप्पणी न केवल लेखक/प्रकाशक से साझा कर सकते हैं, बल्कि अन्य लोग भी प्रकाशित/प्रसारित/संचारित विषय-वस्तु पर अपनी टिप्पणी दे सकते हैं। यह टिप्पणियां एक से अधिक भी हो सकती हैं। बहुधा सशक्त टिप्पणियां परिचर्चा में परिवर्तित हो जाती हैं।
वे फेसबुक का उदाहरण देकर समझाते हैं कि- यदि आप कोई संदेश प्रकाशित करते हैं और बहुत से लोग आपकी विषय-वस्तु पर टिप्पणी करते हैं तो कई बार पाठक वर्ग परस्पर परिचर्चा आरम्भ कर देते हैं और लेखक एक से अधिक टिप्पणियों का उत्तर देता है। वे कहते हैं कि न्यू मीडिया वास्तव में परम्परागत मीडिया का संशोधित रूप है जिसमें तकनीकी क्रांतिकारी परिवर्तन व इसका नया रूप सम्मिलित है। न्यू मीडिया का उपयोग करने हेतु कम्प्यूटर, मोबाइल जैसे उपकरण जिनमें इंटरनेट की सुविधा हो, की आवश्यकता होती है। न्यू मीडिया प्रत्येक व्यक्ति को विषय-वस्तु का सृजन, परिवर्धन, विषय-वस्तु का अन्य लोगों से साझा करने का अवसर समान रूप से प्रदान करता है। न्यू मीडिया के लिए उपयोग किए जाने वाले संसाधन अधिकतर निशुल्क या काफी सस्ते उपलब्ध हो जाते हैं।
संक्षेप में कह सकते हैं कि न्यू मीडिया एक ऐसा माध्यम है जिसमें लेखक ही संपादक है और वही प्रकाशक भी है। यह ऐसा माध्यम है जो भौगोलिक सीमाओं से पूरी तरह मुक्त, और राजनैतिक-सामाजिक नियंत्रण से लगभग स्वतंत्र है। जहां अभिव्यक्ति न कायदों में बंधने को मजबूर है, न अल कायदा से डरने को। इस माध्यम में न समय की कोई समस्या है, न सर्कुलेशन की कमी, न महीने भर तक पाठकीय प्रतिक्रियाओं का इंतजार करने की जरूरत। त्वरित अभिव्यक्ति, त्वरित प्रसारण, त्वरित प्रतिक्रिया और विश्वव्यापी प्रसार के चलते ही न्यू मीडिया का स्वरूप अद्वितीय रूप से लोकप्रिय हो गया है।