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पत्थरों के (में ) शिल्पकार शिल्पकारी / विवेक शुक्ला

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 -रिजर्व बैंक के
यक्ष-यक्षी


अगर आप मूर्तिशल्पी रामकिंकर बैज के  नाम से परिचित नहीं भी है, तब भी आपने उनकी संसद मार्ग पर स्थित रिजर्व बैंक आफ इंडिया की इमारत के बाहर लगी यक्ष और यक्षी की विशाल  प्रतिमाओं को अवश्य देखा होगा। ये नहीं हो सकता कि कोई पहली बार उन प्रतिमाओं को देखकर कुछ पलों के लिए ठहरा ना हो। सन 1970 में स्थापित यक्ष-य़क्षी की इन प्रतिमाओं ने आधी सदी की यात्रा पूरी कर ली है। इस दौरान लाखों लोगों ने इन्हें देखकर सराहा है।

आधुनिक भारतीय मूर्ति कला के जनक रामकिंकर बैज ने इन्हें बड़े ही  प्रेम से तैयार किया था। उन्होंने इनके निर्माण के लिए पत्थर लेने के कई हफ्ते हिमाचल प्रदेश के बैजनाथ नाम स्थान की खाक छानी थी। राम किंकर बैज ने यक्ष –यक्षी के अलावा और कोई प्रतिमा संभवत: दिल्ली में नहीं बनाई। क्यों नहीं बनाई, ये भी एक सवाल तो है। वे संत प्रवृति के इंसान थे। वे अपनी शर्तो पर काम करते थे। किसी का हस्तक्षेप उन्हें स्वीकार नहीं था। उनकी 14 फीट ऊंची यक्ष और यक्षी की प्रतिमाएं  कुषाण काल से प्रभावित मानी जाती हैं। ये असाधारण मूर्तियां हैं। इन्हें तैयार करने में राम किंकर बैज को दस वर्ष लगे थे।

इन्हें बनाने का जिम्मा तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने खुद राम किंकर बैज को दिया था। राम किंकर जी को इस बात की पूरी छूट दी गई थी कि वे इन्हें अपने मन से बनाएं। उन्हें कोई समय सीमा में भी बांधा नहीं गया था। इनके निर्माण पर आने वाले खर्च को सरकार को वहन करना था। नेहरु जी को पता था कि  राम किंकर जी से यह नहीं कहा जा सकता कि वे फलां-फलां तारीख तक अपना काम पूरा कर लें। जब सरकार ने रामकिंकर जी को इतनी सारी छूट दे दीं तो वे राजी हो गए। पहले वे देश के अनेक संग्रहालयों में स्थापित यक्ष और यक्षी की मूर्तियों का गहराई से अध्ययन करने के लिए निकल पड़े।
शांतिनिकेतन से मूर्तिकला का अध्ययन करने वाले राम किंकर बैज पहले भारतीय मूर्तिकारों में थे जिनहोंने सीमेंट में काम किया। उनसे पहले पत्थर, मिट्टी, लकड़ी और धातु ही मूर्तिकला के मुख्य रूप से माध्यम थे। उन्होंने मूर्ति कला के अलावा चित्र कला में भी नए प्रयोग किए। रामकिंकर जी की कृतियां सजीव प्रतीत होती और उनमें एक अजीब सी ऊर्जा होती है।
दरअसल रिजर्व बैंक के बाहर
यक्ष-यक्षी की मूर्तियां लगाने की सिफारिश  जेआरडी टाटा ने  नेहरु जी की थी। इस सलाह को देते हुए टाटा का कहना था चूंकि रिजर्व बैंक एक तरह से कुबेर का खजाना है, इसलिए इसके बाहर यक्ष और यक्षी की प्रतिमाएं स्थापित किया जाना सही रहेगा। वे तब रिजर्व बैंक के डायरेक्टर थे।  इस तरह की मान्यता है कि कुबेर के खजाने की रक्षा यक्ष-यक्षी करते हैं। नेहरु जी को ये बात जंच गई। हालांकि
रिज़र्व बैंक की बिल्डिंग 1956 में बन गई । इसका डिज़ाइन  एन.के. कोठारी ने  बनाया था। चोटी के आर्किटेक्ट कोठारी ने ही संसद मार्ग पर स्थित  बैंक ऑफ बड़ौदा बिल्डिंग का भी डिज़ाइन बनाया  था। समाप्त।


लेख 5 जून 2020 को छपा।




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