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हिंदी शब्द बोध

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हिंदी शब्‍द-बोध (5)

हिंदी की बिंदी
(अनुस्‍वार और चंद्रबिंदु)

अध्यापक महोदय ने एक छात्रा के गृहकार्य की काॅपी जांचते हुए पूछा, ‘तुम लिखते समय बिंदी क्यों नहीं लगाती?’
अध्यापक महोदयका आशय ‘अनुस्वार’ से था।
छात्रा ने उत्तर दिया, ‘बिंदी लगाना तो दकियानूसी परंपरा है। आजकल बिंदी लगाने का फैशन नहीं रहा। अब हम एडवांस हो रहे हैं।
यह उत्तर सुनकर अर्धविराम आदि व्याकरण चिह्नों के बारे में पूछने का साहस ही नहीं हुआ।

यह संक्षिप्त वार्तालाप एक चुटकुला समझ कर नजरअंदाज भले ही कर दिया जाए, किंतु आज हिंदी में फटाफट लिखने या मोबाइल/कंप्यूटर आदि पर टाइप करने के चक्कर में बिंदी का छूट जाना आम बात हो गई है, जबकि हिंदी में बिंदी ‘आम’ नहीं ‘खास’ होती है। जरा विचार कीजिए, यदि ‘चिंता’ पर बिंदी न लगी हो तो उसे ‘चिता’ में बदलते कितनी देर लगेगी। इसी प्रकार ‘गोंद’ ‘गोद’ बन जाएगा और ‘गंदा’ ‘गदा’।

वस्तुतः सबसे सरल तथा छोटा लिपि-संकेत (ं ः) होने पर भी यह पूर्ण ध्वनि का प्रतिनिधित्व करता है। शब्दों के साथ प्रयोग एवं स्थानगत भिन्नता के कारण इसके ‘अनुस्वार’, ‘चंद्रबिंदु’, नुक्ता, ‘विसर्ग’, ‘बिंदी’ आदि कई नाम हैं। इनके अतिरिक्त विराम-चिह्न एवं पूर्णता सूचक चिह्न के रूप में भी इसका प्रयोग किया जाता है।

हिंदी वर्णमाला में यह लिपि-संकेत ग्यारह स्वरों के पश्चात दो रूपों में आता है ‘अं’ और ‘अः’। पहला रूप (अं) ‘अनुस्वार’ कहलाता है और दूसरा (अः) ‘विसर्ग’। अनुस्वार स्वर या व्यंजन के ऊपर एक बिंदी लगाकर और विसर्ग व्यंजन के अंत/सामने दो (ः) बिंदियां लगाकर प्रकट किया जाता है। व्यंजनों के समान अनुस्वार और विसर्ग के उच्चारण में भी स्वरों की सहायता ली जाती है, किंतु इनमें और दूसरे व्यंजनों में अंतर यह है कि स्वर इनके पहले आते हैं और दूसरे व्यंजनों के बाद, जैसे - अ+ं=अं, अ+: =अः, क्+अ=क, ख+अ=ख।

गौरतलब है कि विसर्ग का प्रयोग संस्कृत में अधिक होता रहा है, हिंदी में इसका प्रयोग सीमित अर्थात कुछ ही शब्दों के साथ किया जाता है, जैसे - अतः, स्वतः, अंतःकरण, प्रायः, अधिकांशतः आदि।

अनुस्वार के रूप में बिंदी
संस्कृत के विद्वानों ने अनुस्वार को वर्ण अर्थात वाक्ध्वनि माना है। ‘अनुस्वार’ शब्द ‘अनु’ उपसर्ग और ‘स्वर’ के योग से बना है। ‘अनु’ का अर्थ है ‘के पीछे’ या ‘के बाद’। इस प्रकार ‘अनुस्वार का अर्थ हुआ वह ध्वनि जो स्वर के बाद आए। इसी लिए अनुस्वार का प्रयोग सदैव स्वर के बाद ही किया जाता है।

अनुस्वार का लिपि/वर्ण-चिह्न बिंदु/बिंदी (ं) है, जो स्वर वर्ण-चिह्न और शिरोरेखा के ऊपर लगाया जाता है, जैसे - वंश’, ‘संरक्षक’, ‘संलाप’, ‘संयम’, ‘संवाद’, ‘अंश’, ‘दंश’ ‘हंस’, ‘अंग’, आदि में बिंदु/बिंदी अनुस्वार का ही पचिायक है।
अनुस्वार परवर्ती व्यंजन के स्थान-भेद के अनुरूप ही ध्वनि व्यक्त करता है, उससे भिन्न स्थान-भेद की ध्वनि नहीं।

यह स्वर के बाद बोला जानेवाला हलंत नासिक्य वर्ण है। अन्य वर्णों के समान यह एक अलग (स्वतंत्र) ध्वनि है, जिसका उच्चारण श्वास के साथ नासिका की सहायता से किया जाता है।

अनुस्वार जिस वर्ण के बाद बोला जाता, उसी वर्ण के ऊपर लगाया जाना चाहिए, किंतु सुविधा के लिए यह उस वर्ण के ठीक ऊपर लगाया जाता है, जैसे - अंग, ठंड, घंटा आदि।

हिंदी में अनुस्वार का प्रयोग प्रायः दो स्थानों पर किया जाता है -
1. शब्द के मध्य किसी व्यंजन के पूर्व, जैसे - हंस, मंद आदि।
2. शब्द के अंत में, जैसे - अहं, एवं, स्वयं आदि।

अनुस्वार और पंचमाक्षर
बीसवीं शताब्दी के आरंभ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल, बाबू श्यामसुंदर दास, पं. बालकृष्ण भट्ट, लाला भगवानदीन आदि ने ‘हिंदी शब्दसागर’ का संपादन करते समय यह अनुभव किया कि हिंदी वर्णमाला के पांचों वर्गों के पंचम वर्णों को ‘अनुस्वार’ से सूचित किया जा सकता है। पर्याप्त चिंतन-मनन और विचार-विमर्श के पश्चात वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि पंचम वर्ण के स्थान पर ‘अनुस्वार’ का प्रयोग किया जा सकता है, जैसे - ‘गड.्गा’ के स्थान पर ‘गंगा’, 'चचल’ के स्थान पर ‘चंचल’ आदि। (हमें खेद हे कि इस फांट में कवर्ग और चवर्ग के पंचमाक्षर टाइप नहीं हो पा रहे हैं।)

उनका दूसरा महत्वपूर्ण निष्कर्ष था कि अनुस्वार परवर्ती व्यंजन के स्थान-भेद के अनुरूप ही ध्वनि व्यक्त करता है, उससे भिन्न स्थान-भेद की नहीं। उदाहरणार्थ - यदि परवर्ती व्यंजन तालव्य ‘य्’ है, तो अनुस्वार तालव्य ध्वनि ‘×ा्’ (चवर्ग का पंचमाखर) ही सूचित करेगा, ‘ड.्’(कवर्ग का पंचमाक्षर) ‘ण्’, ‘न्’ या ‘म्’ ध्वनि नहीं। यदि ‘ड.्’((कवर्ग का पंचमाक्षर), ‘ण्’, ‘न्’ या ‘म्’ में से कोई ध्वनि सूचित करनी हो, तो पंचम वर्ण का ही प्रयोग किया जाना चाहिए, जैसे - नम्य, पण्य, रम्य आदि। इन्हें ‘नंय’, ‘पंय’, ‘रंय’ के रूप में नहीं लिखा जाना चाहिए।

यही बात अन्य परवर्ती अंतस्थ (य्, र्, ल् और व्) तथा ऊष्म (श्, ष्, स् और ह्) वर्णों पर भी लागू होती है। ‘संसार’, ‘संस्थान’, ‘संस्कार’ आदि इसलिए लिखे जाते हैं, क्योंकि ‘स्’ वर्त्‍स्‍य ध्वनि से पहले अनुस्वार वर्त्‍स्‍य ध्वनि (न्) का ही सूचक है, किंतु यदि परवर्ती व्यंजन वर्त्‍स्‍य ‘स्’ न होकर ओष्ठ्य ‘म्’ हो तो अनुस्वार वर्त्‍स्‍य ‘न्’ का अर्थात पंचम वर्ण का रूप ले लेगा, जैसे - सन्मार्ग।

ऐसा प्रतीत होता है कि ‘हिंदी शब्दसागर’ के संपादकों के मन में अनुस्वार संबंधी अपने इन निष्कर्षों को लेकर कुछ संदेह था कि हिंदी जगत में इन्हें स्वीकार भी किया जाएगा या नहीं, क्योंकि उन्होंने इन नियमों का प्रयोग केवल प्रविष्टियों तक ही सीमित रखा था और अर्थों में पंचम वर्ण का ही प्रयोग किया था। लेकिन संपादक मंडल की इस धारणा को धता बताकर संस्कृत के विद्वानों ने भी इन नियमों को सहर्ष अपनाया।

वर्ष 1924 में आर्थर एंथनी मैकडानल द्वारा संपादित ‘प्रैक्टिकल संस्कृत डिक्शनरी’ की अनेक प्रमुख प्रविष्टियों में पंचम वर्ण के स्थान पर अनुस्वार का ही प्रयोग किया गया था। उदाहरणार्थ - अलंकरण, अलंकार, अलंकृत, संजय, संदेह, संभव आदि, जबकि संस्कृत के परंपरागत नियम के अनुसार इन शब्दों के रूप इस प्रकार होने चाहिए थे - अलड.्करण, अलंड.्कार, अलड.्कृत (कवर्ग का पंचमाक्षर) , स...जय (चवर्ग का पंचमाक्षर), सन्देह, सम्भव आदि।

स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद हिंदी साहित्य सम्मेलन, भारत सरकार तथा अनेक विद्वानों आदि के प्रभाव एवं सहयोग से अनुस्वार का प्रचार-प्रसार खूब बढ़ा। यह बात अलग है कि मुट्ठीभर संस्कृत पृष्ठभूमि वाले भाषा-प्रेमी अनुस्वार के ये प्रयोग आज भी गले नहीं उतार पाए हैं।

वस्तुतः ‘अनुस्वार’ कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग और पवर्ग के पंचमाक्षर को लिखने की एक वैकल्पिक व्यवस्था है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार पहले जो शब्द गड.्गा, च×ा्चल, पण्डित, सन्त, कम्प के रूप में लिखे जाते थे, बाद में वे गंगा, चंचल, पंडित, संत, कंप के रूप में लिखे जाने लगे। इनके उच्चारण में कोई भेद नहीं है, भेद केवल लिखने में है। वह भी मुद्रण की सुविधा के लिए - यांत्रिक कारण से, व्याकरणिक कारण से नहीं। वैसे इसका एक लाभ यह भी है कि पंचमाक्षर की अपेक्षा इसके लेखन में कम समय लगता है और यह स्थान भी कम घेरता है।

अनुस्‍वार का पंचमाक्षर के रूप में बदलाव
यदि अनुस्वार को पंचमाक्षर में बदलना हो तो उसे अनुस्वार के बाद आने वाले वर्ण के अनुसार बदला जा सकता है अर्थात यदि अनुस्वार के बाद कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग और पवर्ग में से किसी वर्ग से संबंधित वर्ण होता है, तो अनुस्वार उसी वर्ग के पंचम वर्ण बदल जाएगा। उदाहरण के लिए संबंध=सम्बन्ध, मंत्र=मन्‍त्र, पंत=पन्त आदि।

यदि वर्ग के पंचमाक्षर के बाद किसी अन्य वर्ग का कोई वर्ण आए तो पंचमाक्षर अनुस्वार के रूप में परिवर्तित नहीं होगा, जैसे-वाड्.मय, अन्य, चिन्मय, उन्मुख आदि शब्द वांमय, अंय, चिंमय, उंमुख के रूप में नहीं लिखे जाते हैं।

पंचम वर्ण यदि द्वित्व रूप में दोबारा आए तो पंचम वर्ण अनुस्वार में परिवर्तित नहीं होगा, जैसे- प्रसन्न, अन्न, सम्मेलन आदि के प्रसंन, अंन, संमेलन रूप नहीं लिखे जाते हैं।

अनुस्वार और चंद्रबिंदु
हिंदी में अनुसवार और हिंदी की विकट समस्‍या रही है, क्‍योंकि हिंदी में बिंदी का प्रयोग चंद्रबिंदु (ँ) के रूप में भी किया जाता रहा है, जिसकी एक संज्ञा अनुनासिक भी है। अनुनासिक स्वरों के उच्चारण में मुँह से अधिक तथा नाक से बहुत कम साँस निकलती है। इन स्वरों पर चंद्रबिंदु (ँ) का प्रयोग होता है, जो शिरोरेखा के ऊपर लगता है, जैसे - आँख, माँ, गाँव आदि।

अनुस्वार और चंद्रबिंदु में अंतर
1. भाषाशास्त्रियों की दृष्टि में अनुनासिक स्वर है और अनुस्वार मूल रूप से व्यंजन है।
2. अनुनासिक (चंद्रबिंदु) को परिवर्तित नहीं किया जा सकता, जबकि अनुस्वार को वर्ण में बदला जा सकता है।
3. अनुनासिक का प्रयोग केवल उन शब्दों में ही किया जा सकता है, जिनकी मात्राएँ शिरोरेखा से ऊपर न लगीं हों, जैसे - अ , आ , उ और ऊ। उदाहरणार्थ - हँस, चाँद , पूँछ।
4. दोनों में एक महत्वपूर्ण अंतर उच्चारण में लगने वाले समय का भी है। अनुस्वार के उच्चारण में जितना समय लगता है उसका चौथाई समय चंद्रबिंदु के उच्चारण में लगता है।

एक संभ्रम
कुछ लोग भ्रमवश शिरोरेखा से ऊपर लगी मात्राओं वाले शब्दों में ‘में’, ‘मैं’, ‘बातें’, ‘बातों’, गोंद, कोंपल, आदि में प्रयुक्त बिंदी को लोग अनुस्वार समझ लेते हैं, किंतु इन शब्दों में प्रयुक्‍त बिंदी चंद्रबिंदु का लघुरूप है (अतः अनुनासिक है), जबकि गंगा, चंचल, पंडित, संत, कंप जैसे शब्दों में प्रयुक्‍त बिंदी अनुस्वार है, क्योंकि इन शब्दों में बिंदी कवर्ग और चवर्ग के पंचमाक्षर, ण्, न्, म् के स्थान पर प्रयुक्त हुई है।

समझने का भार पाठक पर
बीसवीं शताब्दी के मध्य से ही कुछ विद्वानों ने चंद्रबिंदु के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग शुरू कर दिया था। दिल्ली प्रेस की हिंदी पत्रिकाएं ‘सरिता’, ‘मुक्ता’ ‘गृहशोभा’, ‘चंपक’, ‘सुमन सौरभ’, ‘सरस सलिल’ आदि इस क्षेत्र में अग्रगण्य रही हैं। बाद में कुछ अन्य प्रकाशन समूहों ने भी इस प्रवृत्ति को अपना लिया।
यदि अनुस्वार और चंद्रबिदु के समयगत अंतर को नजरअंदाज कर भी दिया जाए, तो सबसे बड़ी समस्या है अर्थ की, जैसे - ‘हंस’ और ‘हँस’। ‘हंस’ का अर्थ है बत्तख जैसा सफेद रंग का एक सुंदर जलपक्षी, जिसके बारे में कहा जाता है कि यह मानसरोवर में रहता है और मोती खाता है, किंतु ‘हँस’ एक आदेशात्मक क्रिया है, जिसका अर्थ है हँसना। इस प्रकार अर्थ की दृष्टि से ‘हँस’ में चंद्रबिंदु के स्थान पर अनुस्वार का प्रयोग गलत है, किंतु आजकल ऐसे प्रयोग चल ही नहीं रहे, बल्कि दौड़ भी रहे हैं।
इस संदर्भ में कुछ अन्‍य शब्‍द भी अवलोकनीय हैं -
अंग - भाग, अवयव, हिस्‍सा आदि।
अँगना - नारी, जैसे वीरांगना यानी वीर+अँगना।

अंग-रक्षक - विशिष्‍ट व्‍यक्ति की रक्षा करने के लिए उसके साथ रहनेवाला सशस्‍त्र प्रहरी, बॉडीगार्ड।
अँगरखा - पुराने जमाने का एक मरदाना पहनावा।

आठवें-नौवें दशक में जब मैं ‘सरिता-मुक्ता के संपादकीय विभाग में उपसंपादक के रूप में कार्य करता था, तब एक दिन इस संदर्भ में प्रसंगवश मैंने संपादक विश्वनाथजी से चर्चा की। उनका जवाब था, ‘समझने-समझाने का सारा भार भाषा पर ही क्यों होना चाहिए? पाठकों को भी प्रसंगानुसार अर्थ समझना चाहिए।’



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