Quantcast
Channel: पत्रकारिता / जनसंचार
Viewing all articles
Browse latest Browse all 3437

चलो दिलदार चलो चाँद के पार चलो ... / रत्न भूषण

$
0
0




चलते चलते....

पाकीज़ा के वे सदाबहार गाने.....

कमाल अमरोही निर्मित निर्देशित फिल्म पाकीज़ा के बारे में तमाम कहानियां किस्से आप सभी ने पढ़े सुने होंगे। जो मैं बताने जा रहा हूं, संभव है, उस बारे में भी आपको जानकारी हो, लेकिन बहुत कम लोगों को....

तमाम फिल्मों के लेखक के रूप में खूब ख्याति पाने वाले कमाल अमरोही ने बतौर निर्देशक कुल पांच फिल्मों में काम किया था। ये फ़िल्में थीं महल, दायरा, पाकीज़ा, मजनूं और रज़िया सुल्तान, लेकिन रिलीज हुई कुल चार फिल्में। मजनूं अधूरी रह गयी। वैसे तो पाकीज़ा के भी पूरे होने के आसार कम ही थे, पर फिल्मी दुनिया के कुछ लोगों की कोशिश से यह फ़िल्म मुक़म्मल हुई। तो पाकीज़ा उनकी तीसरी फिल्म थी और यह लगभग उन्नीस साल में पूरी हुई थी। फ़िल्म को बनने में हुई इतनी देरी ही उस बात के लिए ज़िम्मेदार है, जिस बारे में हम यहां बताने जा रहे हैं।
पहले यह अक्सर देखा जाता था कि निर्देशक अगर फलां हैं, तो संगीतकार उनकी ज्यादातर फिल्मों में वही होंगे, लेकिन कमाल अमरोही ने अपनी रिलीज चारों फ़िल्मों में संगीतकार अलग अलग रखा। उन्होंने महल में खेमचंद्र प्रकाश, दायरा में जमाल सेन, पाक़ीज़ा में गुलाम मोहम्मद और रज़िया सुल्तान में खय्याम को बतौर संगीतकार लिया।
अब बात गुलाम मोहम्मद की, तो वे राजस्थान के बीकानेर से थे और लोकधुनों और शास्त्रीय संगीत की उन्हें अच्छी समझ थी। इसी वज़ह से वे संगीतकार नौशाद के सानिध्य में आये और उनके शिष्य बन गए। कुछ समय बाद नौशाद साहब के कहने पर ही उन्होंने अलग काम करना शुरू किया। उन्होंने कुछ फिल्मों दिल ए नादान, परदेस, शायर, शमा, हूर ए अरब, रेल का डिब्बा, अजीब लड़की आदि में संगीत दिया। कमाल अमरोही ने पाक़ीज़ा के लिए गुलाम मोहम्मद को चुना तो उन्होंने फिल्म के सभी गीत चलते चलते यूं ही कोई मिल गया था..., ठारे रहियो वो बांके यार रे..., आज हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे..., इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा..., चलो दिलदार चलो चांद के पार चलो..., मौसम है आशिकाना ऐ दिल कहीं से उनको... सहित छह और गीतों की धुनें बनाईं और इन्हें सिंगरों से गवाया। इन गीतों की रिकार्डिंग पूरी हो गयी। जो भी गीतों को सुनता, मुग्ध हो जाता। गुलाम मोहम्मद को खूब तारीफ मिलती, पर होना कुछ और था।
हम पहले ही बता चुके हैं कि इस फ़िल्म यानी पाक़ीज़ा के निर्माण में बहुत वक़्त लगा था, कुल उन्नीस साल। यह फिल्म शुरू हुई थी 1953 में और पूरी हुई 1972 में। हां, पांच साल तैयारियों में और चौदह साल शूटिंग की शुरुआत से रिलीज तक। जाहिर है, फ़िल्म के रुकने की वजह थी मीना कुमारी के साथ पतिं, फ़िल्म के निर्माता निर्देशक कमाल अमरोही के रिश्ते का बेहद ख़राब हो जाना। इसी वक्त फ़िल्म के लिए कुल बारह गीत तैयार करने वाले गुलाम मोहम्मद की तबियत खराब हो गई, जो ठीक नहीं हुई और उनका इंतकाल  17 मार्च 1968 को हो गया।
किसी तरह पाक़ीज़ा की बात आगे बढ़ी। मीना कुमारी को नरगिस, सावन कुमार टाक, सुनील दत्त आदि ने समझाया, तब जाकर बात बनी। फ़िल्म किसी तरह पूरी हो गयी, लेकिन पार्श्व संगीत का क्या...? चूंकि नौशाद साहब के गुणी शिष्यों में से एक थे गुलाम मोहम्मद, तो वे इस काम को पूरा करने के लिए तैयार हो गए।
नौशाद साहब ने पूरी फिल्म कई बार देखी और संगीत तैयार कर दिया, लेकिन उन्हें कोठे वाले कई दृश्यों के लिए सही गीत की कमी दिख रही थी। कमाल के साथ की उनकी बैठकों ने आखिर रास्ता निकाला कि हम इन दृश्यों के बैकग्राउंड में कुछ गीतों को रखें। ऐसा ही किया गया। इन बैकग्राउंड वाले चारों गीतों के अधिकार लिए गए, जो अलग अलग सिंगरों की आवाज़ में थे। गीत ये धुंआ सा कहाँ से उठता है... प्रतिमा देवी, मोरा साजन सौतन के घर जाए... वाणी जयराम, कौन गली गयो श्याम.... परवीन सुल्ताना और राज कुमारी की आवाज वाला गीत नजरिया की मारी मरी मोरी गुइयाँ... को पार्श्व में डाला गया। इस तरह पाक़ीज़ा रिलीज के लिए तैयार हुई।
जब इसकी रिलीज से पहले कुछ खास लोगों के लिए एक शो रखा गया, तो कुछ लोगों का कहना हुआ कि आज फ़िल्म संगीत पूरी तरह से बदल चुका है। पियानो पर किशोर कुमार की आवाज़ को राजेश खन्ना पर्दे पर गा रहे हैं। अब गानों से शास्त्रीयता गायब हो चुकी है, ऐसे में पाकीज़ा के गाने नहीं चलेंगे। कुछ ने यह भी राय दी कि इन गीतों को शंकर-जयकिशन से दोबारा आज के हिसाब से तैयार कराया जाए, तो शायद बात बने। लेकिन कमाल अमरोही अड़ गए कि मैं मरे हुए आदमी का क्रेडिट नहीं छीनूंगा और मैं यह हरगिज़ नहीं करूंगा। फ़िल्म का हशर चाहे जो हो। फिर उन्होंने नौशाद साहब से इस बारे में राय ली और अंत में गुलाम मोहम्मद द्वारा तैयार बारह मुख्य गीतों में से छह गीतों के साथ पाकीज़ा 4 फरवरी 1972 को रिलीज़ हुई। फिल्म के म्यूज़िक ने इतिहास बनाया, इसमें कोई दोराय नहीं, लेकिन उस साल बेस्ट म्यूज़िक का फिल्मफेयर अवार्ड मिला बेईमान फिल्म के लिए शंकर-जयकिशन को। इस फैसले से बेईमान में विलेन का रोल करने वाले अभिनेता प्राण इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने ‘बेईमान’ के लिए मिला अपना अवॉर्ड वापस कर दिया। उनका मानना था कि बेस्ट म्यूजिशियन का अवार्ड पाक़ीज़ा के गीतों के लिए गुलाम मोहम्मद को मिलना चाहिए था। उनका संगीत लाजवाब है। ...यह सच भी था। हम आज भी इस फ़िल्म के गीतों को सुनते नहीं थकते हैं। पार्श्व में बजने वाले चारो गीत भी दृश्यों से अपना रिश्ता बखूबी बनाते हैं, जो हमें आनंदित करते हैं। देखते हुए भी, सुनते हुए भी....

Viewing all articles
Browse latest Browse all 3437

Trending Articles



<script src="https://jsc.adskeeper.com/r/s/rssing.com.1596347.js" async> </script>