चलते चलते...
उसी नौटंकी में बेटा आ गया...
जब जब हिंदी सिनेमा की भव्यता का ज़िक्र होता है। जब कभी हिंदी सिनेमा में बड़ी फिल्में बनाने के पैमाने पर बात होती है। उन फिल्मों की ओर हमारी नज़र अपने चली जाती है, जिन्होंने न सिर्फ हिंदी सिनेमा की पहचान बदलकर रख दी। न सिर्फ हिंदुस्तान में बल्कि पूरी दुनिया में नाम कमाया। पर हमें यदि ऐसी एक फ़िल्म का नाम लेना हो, तो हमारा ध्यान सीधे उस फिल्म पर जाता है, जो एक ऐतिहासिक कहानी पर बनी लगभग साठ साल पुरानी है। जी हां, वह हमारी हिंदी फिल्मों का इतिहास भी है। उसके बगैर हम भारतीय सिनेमा की बात कर ही नहीं सकते। फ़िल्म है करिमुद्दीन आसिफ निर्देशित मुगल ए आज़म।
हम इसे दूसरी तरह से देखें, तो यह बात व्यंग्य जैसी भी लगती है कि हमने यह तरक्की की है और वह तरक्की की है। पर सच यही है कि आज मुग़ल ए आज़म को रिलीज हुये साठ साल होने को हैं, हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री ने कोई ऐसी फ़िल्म नहीं बनाई, जो मुगल ए आज़म से भव्य, दिव्य और आर्थिक आधार पर तब की तुलना में आज अधिक कमाई की हो। यह भी सच है कि जब तक हिंदी सिनेमा रहेगा, दुनिया रहेगी, तब तक मुगल ए आज़म का ज़िक्र होता रहेगा।
फ़िल्म में शकील बदायूंनी के लिखे गीत भी एक से बढ़कर एक थे, जिन्हें लोग आज भी गाते गुनगुनाते और उनके बारे में जिक्र करते हैं। मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे..., जब प्यार किया तो डरना क्या..., मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोये..., हमें काश तुमसे मुहब्बत न होती..., ऐ इश्क़ ये सब दुनियावाले..., ये दिल की लगी कम क्या होगी..., खुदा निगहबान..., बेकस पे करम कीजिए... सभी में आवाज़ लता मंगेशकर की, तेरी महफ़िल में किस्मत आजमा कर... लता-शमशाद बेगम, ऐ मुहब्बत जिंदाबाद... मोहम्मद रफ़ी, प्रेम जोगन बन के... और शुभ दिन आयो राजदुलारा... बड़े ग़ुलाम अली खान। फ़िल्म में संगीत नौशाद का है।
इस फ़िल्म का वैसे तो निर्माण लगभग चौदह वर्षों में खत्म हुआ। सोच से लेकर रिलीज तक, लेकिन कई बार कलाकारों का बदलाव हुआ, फिर कभी कुछ परेशानी आयी, तो कभी कुछ, लेकिन जो कलाकार फ़िल्म में दिखे, वे थे पृथ्वीराज कपूर, दुर्गा खोटे, मधुबाला, दिलीप कुमार, निग़ार सुल्ताना, अजीत, एम कुमार, जलाल आगा, मुराद, विजयलक्ष्मी, एस नज़ीर, सुरेन्द्र, जॉनी वाकर, तबस्सुम आदि।
फ़िल्म के लिए बहुत से कलाकारों का चुनाव हुआ, लेकिन हम अब बात उस एक कलाकार की करेंगे। बात फ़िल्म के निर्माण के दौरान की यानी 1956 की है। अब यह सबको पता है कि दिलीप कुमार ने फ़िल्म में सलीम की भूमिका निभाई है। उनके बचपन का एक दोस्त था, जिसका घर पेशावर में था और वह उनका पड़ोसी भी था। नाम था मीर ताज मोहम्मद खान। मीर बेहद खूबसूरत थे और वकालत करते थे। उन्होंने आज़ादी की लडाई में भी हिस्सा लिया था। जेल भी गए। उसके बाद मीर साहब दिल्ली में आकर बस गए। काफी समय बाद, एक बार मीर साहब दिलीप कुमार से मिलने के लिए बंबई, अब मुम्बई उनके घर पहुंचे। दिलीप साहब ने उन्हें अपने कुछ दोस्तों से मिलवाया जिसमें करीमुद्दीन आसिफ भी थे। तब आसिफ साहब अपनी फिल्म मुगल ए आज़म की कुछ कास्टिंग कर चुके थे और कुछ कर रहे थे। जब के आसिफ मीर ताज मोहम्मद खान से मिले, तो उनसे काफी प्रभावित हो गए। उन्होंने दिलीप कुमार से इस बारे में अलग जाकर बात की तो उन्होंने कहा, आप उनसे ही इस बारे में बात कर लें। फिर बातचीत के दौरान ही आसिफ साहब ने फिल्म मुगल ए आज़म में उन्हें राजा मान सिंह का रोल करने का ऑफर दिया और कहा, मीर साहब, अब आप दिल्ली इस फ़िल्म को खत्म करने के बाद ही जायेंगे।
मीर साहब दिल के साफ इंसान थे। उन्होने के आसिफ को साफ शब्दों में कहा, मुझे नौटंकी में काम करने का ज़रा सा भी शौक नहीं है।
मीर साहब द्वारा सिनेमा को नौटंकी कहे जाने वाली बात आसिफ साहब के दिल में तीर की तरह चुभ गई। चूंकि वे तब दिलीप साहब के दोस्त की हैसियत से साथ बैठे थे, इसलिए के आसिफ ने मीर ताज मोहम्मद खान को कुछ नहीं कहा। फिर उन्होंने राजा मान सिंह का रोल अभिनेता मुराद को दे दिया। मीर साहब भी कुछ दिनों बाद दिल्ली आ गए।
1981 में मीर ताज मोहम्मद खान ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन इत्तेफाक देखिए कि जिस सिनेमा में मिले रोल के ऑफर को मीर साहब ने नौटंकी कह कर ठुकरा दिया था, उनका बेटा आज उसी नौटंकी की दुनिया का बाज़ीगर और बादशाह बना हुआ है। वह इसी नौटंकी की बदौलत पूरी दुनिया में शोहरत, दाम और नाम कमा रहा है। लोगों के दिलों में मोहब्बत जगा रहा है। दुनिया उसकी दीवानी है, नाम है शाहरुख खान...।
-रतन