Quantcast
Channel: पत्रकारिता / जनसंचार
Viewing all articles
Browse latest Browse all 3437

कोरोना योद्धाओ के जज्बे को सलाम / आलोक यात्री

$
0
0




📎📎

कोरोना योद्धाओं के जज्बे को सलाम

  कोरोना के कहर के खौफ से जहां हर कोई खौफजदा हो, वहां बहुत से लोग ऐसे हैं जिनका जज्बा पूरी मानव जाति के लिए मिसाल कायम कर रहा है। सैयद उज्मा परवीन हों या विजय अय्यर इनके जज्बे को आज दुनिया सलाम कर रही है। लखनऊ की उन तंग गलियों में जहां नगर निगम की टीम भी घुसते हुए कतराती है, वहां बुर्कानशीं उज्मा पीठ पर भारी भरकम मशीन लादे हर रोज सैनेटाइजेशन का काम कर रही हैैं। कुछ कर गुजरने के जज्बे से लबरेज़ उज्मा का कहना है कि सैनेटाइजेशन के काम में उसने जब निगम कर्मियों की लापरवाही और हील हुज्जत देखी तो इस काम का बीड़ा खुद ही उठा लिया। भोपाल के विजय अय्यर की भी कोरोना योद्धा के रूप में पेश की गई साहस की मिसाल किसी पहचान की मोहताज नहीं है। जिन्होंने साल भर की अपनी कुल कमाई पिछले ढाई महीने से शहर के निषिद्ध क्षेत्रों में सोडियम हाइपोक्लोराइड के छिड़काव में खर्च कर दी।
  चेहरे पर मास्क, शरीर पर बुर्का और पीठ पर सैनेटाइजर की भारी-भरकम मशीन लादे गली दर गली सैनेटाइजेशन करती इस महिला को देख कर लोग कौतूहल में पड़ जाते हैं। बीते 26 अप्रैल से उज्मा सआदतगंज, ठाकुरगंज, चौक, अमीनाबाद और बालागंज जैसे लखनऊ के कई मोहल्लों में अपने बल-बूते सैनेटाइजेशन का काम कर रही हैं। महज 29 साल की उज्मा सआदतगंज स्थित घर से निकलने से पहले अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को अंजाम देती हैं। उनके लिए हिंदु-मुस्लिम या मंदिर-मस्जिद का कोई भेद नहीं है। दो बच्चों की मां उज्मा का कहना है कि लाॅक डाउन के दौरान उन्हें लोगों की तक़लिफों की ज़मीनी हकीकत से रूबरू होने का मौका मिला। भोजन और राशन के तमाम सरकारी और गैर-सरकारी दावों और व्यवस्था के बावजूद बड़ी संख्या में लोग भोजन व राशन के लिए त्रस्त थे। सैनेटाइजेशन के काम के साथ-साथ उज्मा ने लोगों को भोजन और राशन भी मुहैया करवाना शुरू किया। भोजन वितरण और सैनेटाइजेशन के काम में उज्मा अब तक पांच लाख रुपए की धनराशि खर्च कर चुकी हैं।
  भोपाल शहर के टीला जमालपुरा इलाके के रहने वाले विजय अपने ही घर में पंक्चर की छोटी सी दुकान चलाते हैं। विजय का सपना अपने बाप दादा की तरह सेना में जाकर देश सेवा करने का था। लेकिन इकलौती संतान होने की वजह से उनकी मां इस निर्णय के खिलाफ थीं। 33 वर्षीय विजय का कहना है कि लाॅक डाउन के चलते 24 मार्च को उनकी पंक्चर की दुकान बंद हो गई। बेहतर इलेक्ट्रीशियन होने के बावजूद विजय को काम मिलना बंद हो गया। नई मोटर साइकिल के लिए विजय ने 70 हजार रुपए बचा कर रखे थे। लेकिन शहर के कुछ निषिद्ध क्षेत्रों को सैनेटाइजेशन में निगम कर्मियों द्वारा बरती जा रही लापरवाही व भेदभाव ने विजय के भीतर सोए सेवा के जज्बे को जागृत कर दिया। मोटर साइकिल के लिए पाई-पाई कर जोड़ी गई रकम विजय ने स्प्रे मशीन, पीपीई किट, सेनेटाइजेशन का सामान खरीदने में खर्च कर दी। बीते करीब तीन माह से विजय पीठ पर कैमिकल से भरी मशीन लाद कर हर सुबह अपने मिशन पर निकल जाते हैं। शहर के संक्रमण प्रभावित इलाकों में घर-घर जाकर निशुल्क छिड़काव करने में विजय का पूरा दिन व्यतीत हो जाता है।
  लाॅक डाउन खुलने के बावजूद उज्मा की दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं आया है। बल्कि अब उसे लोगों की छोटी-छोटी जरूरतों की पूर्ति का ख्याल भी रखना पड़ रहा है। किसी को चप्पल चाहिए तो किसी को दवाई, काॅपी या किताब। उज्मा के अनुसार बेटे की पढ़ाई के लिए उन्होंने दो लाख रुपए संभाल कर रखे थे। इस काम के लिए वह राशि तो निकाली ही बल्कि अलग से बचाए हुए तीन लाख रुपए भी इस नेक काम में खर्च कर दिए। उनके इस काम में उज्मा के व्यावसायिक पति भी अब मददगार हैं। काम के प्रति उज्मा का समर्पण देख कर कुछ रिश्तेदार भी मदद को आ जुटे हैं।
  सैनेटाइजेशन के लिए उज्मा ने स्प्रिइंग मशीनें खरीदी थीं। बाद में लोगों ने उन्हें दो मशीनें दान में और दीं। लोग पहले उन्हें हैरानी से देखते थे। कुछ लोग मज़ाक उड़ा कर हतोत्साहित करने की कोशिश भी करते रहते थे। लेकिन धीरे-धीरे लोगों की उनके और उनके काम के प्रति धारणा बदली। लोग अब उनके काम की प्रशंसा करते हैं। अब तो समस्या निवारण के लिए उनके पास विभिन्न इलाकों से फोन भी आते हैं। हैरान लोग अक्सर उनसे सवाल करते हैं कि एक महिला हो कर वह पुरुषों वाला काम क्यों करती हैं? या, इतनी भारी मशीन पीठ पर लाद कर कैसे चलती हैं? लोगों से बस वह इतना ही कहती हैं कि इस संक्रमण काल में हमें महिला पुरुष नहीं एक जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से काम करना ज्यादा जरूरी है।
  लाॅक डाउन खुलने के बाद विजय ने पंक्चर की दुकान पुनः खोली है लेकिन इक्का-दुक्का ग्राहक आने की वजह से उनकी दिनचर्या जारी है। पैसे की कमी के सवाल पर विजय का कहना है कि विदेश में रह रहे उसके कुछ समर्थ रिश्तेदारों ने उससे लोगों की यह सेवा जारी रखने के लिए कहा है और आर्थिक सहायता का आश्वासन भी दिया है। अपने काम के बूते विजय ने अपनी एक अलग पहचान कायम की है। लोग अब फोन पर ही उन्हें अपने इलाके की बदहाली बताते हैं। जिसे दूर करने विजय संकट हरण के रूप में निकल जाते हैं। अपने इस काम से मिले अनुभव को साझा करते हुए विजय कहते हैं कि लोगों को कोरोना वायरस से साहस और आत्मविश्वास के साथ लड़ना चाहिए। भय हमें मारता है। एक सैनिक की तरह जो अपने जीवन की परवाह किए बगैर ही तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी आगे बढ़ता रहता है, की भांति हमें हमें इस महामारी का सामना कर इसे हराना होगा।
__________________________

Viewing all articles
Browse latest Browse all 3437

Trending Articles



<script src="https://jsc.adskeeper.com/r/s/rssing.com.1596347.js" async> </script>