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व्यंगशाला टीका टिप्पणी -1

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  दोस्तो, मेरी रचना पर टिप्पणी करने वाले सभी मित्रों का आभार। उन मित्रों का भी, जो चाहते हुए भी टिप्पणी नहीं कर पाए। अंत में एक गुर देता हूँ। सही-गलत का विवेक और उसे रेखांकित करने का साहस यों तो सभी लेखकों के लिए आवश्यक है, पर व्यंग्यकार के लिए वह बहुत आवश्यक है। अपनी-अपनी निष्ठाएँ बरकरार रखते हुए भी, यह गुण व्यंग्यकार में होना ही चाहिए। तभी उसके लेखन में भी प्रखरता आती है, वरना सीली हुई लकड़ी की तरह धुआँ देते रहेंगे। और हाँ, मिट्टी के माधो को पूजने वाले मिट्टी के माधो ही होकर रह जाते हैं। अच्छा लिखने के लिए अपनी प्राथमिकताएँ तय करनी निहायत जरूरी हैं। आप सभी को मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ।

 श्री सुरेश जी ने बहुत ही सुन्दर शब्दों में अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है जो निश्चित ही बहुत अभिव्यक्ति है..आपकी विषय एवं लेख पर पकड़ आपके लेख की प्रासंगिकता को और अधिक उत्तम करती है... शुभकामनाएं ..!


आज का सत्र प्रारंभ हो रहा है।व्यंग्य लेखन गंभीर कर्म है, व्यंग्य शाला समूह सीखने सिखाने की पाठशाला है। व्यंग्य शाला में आज गुरुवार को सुबह 10 बजे से रात्रि आठ बजे तक 'रूबरू'कार्यक्रम में आपके सवालों के जवाब लखनऊ के वरिष्ठ व्यंंग्यकार श्री राजेन्द्र वर्मा जी देंगे। कृपया सत्र के दौरान अनुशासन बनाए रखियेगा, व्यंग्य विधा से संबंधित सवाल हमारे वाट्स अप नंबर 9977318765 पर ही भे


*जय प्रकाश पाण्डेय


: जाने-माने व्यंग्यकार श्री प्रभाशंकर उपाध्याय (राजस्थान) ने सवाल किया है___


राजेन्द्र वर्मा जी -

आप व्यंग्यकार, कवि और अच्छे गजलकार है। विकट अध्येता हैं।  हिन्दी और उर्दू भाषा पर आपका अधिकार है।

व्यंग्य विमर्श के वर्तमान दौर में यह देखा गया है कि लोग किसी रचना में केवल यह देखते हैं कि उसमें कितने पंच हैं।  रचना के विन्यास, शैली, कहन भंगिमा पर प्राय बात नहीं होती।

 मेरा प्रश्न है कि पठन/पाठन हेतु  प्रस्तुत व्यंग्य के आंकलन के लिए क्या प्रवृति मान्य है?


 उत्तरप्रदेश से सक्रिय व्यंंग्यकार श्रीमती वीना सिंह का सवाल____


        आदरणीय राजेन्द्र वर्मा जी से मेरा प्रश्न है कि कनिष्ठों को अपने वरिष्ठों की  रचनाओं पर टिप्पणी  करनी चाहिए या नहीं।

वरिष्ठों की अच्छी रचना पर प्रशंसा करने में तो कोई गुरेज नहीं पर खराब या कमजोर रचना  पर टिप्पड़ी करना असहज करता है।

रचनाएँ वरिष्ठों की भी कमजोर होती हैं। ऐसी स्थिति में क्या करें?


 धनबाद (झारखंड) से युवा व्यंंग्यकार श्री अभिजित दुबे का सवाल____


*मेरा प्रश्न राजेन्द्र वर्मा सर से*


एक बार कृष्णा सोबती ने कहा था- 'साहित्य पहले पार्ट टाइम जॉब नहीं था.'

इस प्रश्न को पृष्ठभूमि में रखकर राजेन्द्र वर्मा सर से यह पूछना चाहता हूँ, कि बैंक जैसी व्यस्तता वाली नौकरी करते हुए, आपने 24 पुस्तके  लिखीं.  कैसे मैनेज किया आपने साहित्य सृजन के इस    महायज्ञ को ?


अभिजित दख्यातिलब्ध व्यंंग्यकार श्री बुलाकी शर्मा जी (बीकानेर, राजस्थान)का सवाल--



            - किसानों, मजदूरों आदि द्वारा  अपने वाजिब अधिकारों के लिए किए जानेवाले आंदोलनों  के प्रति संवेदनशील लोगों की सहानुभूति रहती है किंतु हमारे कुछ 'अति संवेदनशील 'व्यंग्यकार साथियों का ध्यान ,  लंबे समय से धरने पर बैठे किसानों की मांगों पर नहीं, वरन उनके द्वारा  पिज्जा, बर्गर खाने, बादाम - पिस्ता युक्त दूध पीने को लेकर है और वे उन पर व्यंग्य बाण चलाने को विवश हो रहे हैं । उनकी नजर में 'खरा किसान 'तो गोदान के '  होरी '  ह  गरीब, कर्ज के बोझ से दबा, दीन - हीन हो सकता है, जो केवल व्यवस्था के हाथों पिसता रहे, विरोध का स्वर ही न निकाले !! ... ऐसी मनःस्थिति के  व्यंग्यकारों के प्रति आप क्या कहना चाहेंगे ?

 - बुलाकी शर्मा












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